• Jul 22, 2026

पापरा नदी के तट पर स्थित देवी शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में सिउरी शहर से लगभग 24 किमी दूरी पर है। स्त्री शक्ति का प्रतिनिधित्व करते 51 शक्तिपीठों में से एक यह शक्तिपीठ आध्यात्मिक रूप से देवी दुर्गा के महिषमर्दिनी अवतार की झलक प्रदान करता है। पौराणिक गहराइयों और आसपास के दिव्य वातावरण से इस शक्तिपीठ की दिव्यता इसे केवल दर्शनीय स्थल ही नहीं बल्कि आत्मोन्नति का प्रमुख स्थान भी बनाते हैं। इन्हीं प्रमुख विशेषताओं, ऐतिहासिक प्रमुखताओं को और भी करीब से जानते हैं, इस आर्टिकल में।

शक्तिपीठों से जुड़ी पौराणिक कथा

भगवान शिव और देवी सती का विवाह उनके पिता राजा दक्ष की मर्जी के बिना होने से वह अपने जामाता भगवान शिव को नापंसद करते थे, क्योंकि भगवान शिव राजसी सुख से विरक्त रहते थे। एक बार राजा दक्ष ने भगवान शिव और देवी सती को लज्जित करने के उद्देश्य से उन दोनों को न बुलाकर विशाल यज्ञ का आयोजन कराया जिसमें उन्होंने संसार के सभी देवी देवताओं को न्यौता दिया। इस कारण देवी सती ने बिना बुलाए ही अकेले जाने का निश्चय किया, जहां उन्हें तिरस्कृत और अपमानित होने के साथ ही भगवान शिव के प्रति कठोर शब्द सुनने पड़े। इतना सब हो जाने से उन्होंने उसी यज्ञ कुंड की अग्नि में अपनी तिलांजलि दे दी।

देवी सती की मृत्यु की खबर पाकर महादेव का क्रोध अत्यधिक भयानक और रौद्र हो गया। ऐसे में उन्होंने राजा दक्ष को दंडित किया और माफी मांगने के बाद क्षमा भी कर दिया। लेकिन पत्नी वियोग में व्याकुल होकर समस्त लोकों में देवी सती के मृत शव को कंधे पर लेकर विचरण करने लगे। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के मृत शरीर के 51 टुकड़े कर भारतीय उपमहाद्वीप में बिखेर दिया। जहां भी मां सती के अंग, आभूषण या वस्त्र गिरे, वहां पर शक्तिपीठों की स्थापना हुई। शक्तिपीठों की प्राण प्रतिष्ठा स्वयं भगवान शिव द्वारा की गई है जिसमे हर शक्तिपीठ में उनकी दिव्य उपस्थिति उनके भैरव अवतार में देखने को मिलती है।

बकरेश्वर महिषमर्दिनी शक्तिपीठ की उत्पत्ति से जुड़ा इतिहास

भगवान विष्णु द्वारा विखंडित किये जाने पर माता सती के मृत शरीर से इस जगह पर उनकी भौहों के बीच का भाग या उनके मस्तिष्क का एक हिस्सा गिरा था, इस वजह से यह स्थान असीमित ऊर्जा, दिव्य चेतना और ज्ञान की ज्योति जगाता दिव्य स्थल है जहां देवी महिषमर्दिनी मन को शांति और सुकून देने के साथ ही जीवन में स्पष्टता और हौसला प्रदान करती है।

बकरेश्वर महिषमर्दिनी शक्तिपीठ और ऋषि अष्टावक्र से जुड़ी कहानी

बकरेश्वर या वक्रेश्वर का नाम मुख्यतया ऋषि अष्टावक्र से जुड़ा हुआ है। एक समय जब भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी का विवाह कार्यक्रम संपन्न हो रहा था। तब एक युवा ़ऋषि सुब्रत का देवराज इंद्र द्वारा उपहास किया गया, इस वजह से क्रोधित ऋषि सुब्रत का शरीर आठ जगहों से मुड़ गया, इस वजह से इन्हें अष्टावक्र कहा जाने लगा। अपनी इस स्थिति से दुखी होकर उन्होंने अपने गुरू से सानिध्य कर इसका उपाय पूछा, जिसमें इन्हें पता चला कि भगवान शिव की आराधना करनी चाहिए। गुरू का परामर्श मानकर इन्होंने इसी बकरेश्वर की भूमि पर जब यह घनघोर जंगल था, यहां हजारों सालों तक कठोर तप किया, इनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें न सिर्फ दर्शन दिए बल्कि उनकी विकृति भी दूर की साथ ही यह आशीर्वाद दिया कि कोई भी व्यक्ति उनकी पूजा से पहले अष्टावक्र मुनि की पूजा करेगा तो उसे भगवान शिव का सहज आशीर्वाद प्राप्त हो जाएगा। इसीलिए यहां मौजूद शिवलिंग को वक्रनाथ नाम से जाना जाता है और फलस्वरूप इस स्थान का नाम वक्रेश्वर या बकरेश्वर पड़ा है। भगवान शिव के दिव्य आशीर्वाद के कारण ही भक्त जन पहले अष्टावक्र मुनि के मंदिर में प्रसाद चढाते हैं फिर शिव मंदिर में भगवान शिव का अभिषेक करते हैं।

बकरेश्वर महिषमर्दिनी शक्तिपीठ की वास्तुकला एवं संस्कृति

बकरेश्वर महिषमर्दिनी शक्तिपीठ भले ही पश्चिम बंगाल में अवस्थित हो लेकिन यह मंदिर ओडिसी शैली से प्रभावित है। महिषमर्दिनी देवी की मूर्ति मुख्य गर्भग्रह मे दर्शनीय है जो काले पत्थर से बनी है और इस प्रतिमा को सुदंर नए वस्त्रों, आभूघणों से सुसज्जित किया जाता है। मुख्य प्रतिमा के दोनों तरफ भगवान शिव और भगवान श्री हरि विष्णु की मूर्तियां स्थापित हैं।

महिषमर्दिनी मंदिर और विक्रांत मंदिर दोनो ंप्रमुख मंदिर दोनों इसी मंदिर परिसर में स्थित हैं, इसके अलावा भगवान गणेश, कार्तिकेय और श्री हनुमान जी सहित कई अन्य छोटे छोटे मंदिर भी मौजूद हैं। पारंपरिक बंगाली और उडिया शैली को जीवंत करता यह मंदिर अपनी लाजवाब भव्य सजावट, विशाल गुबंदों और उच्च शिखरों द्वारा प्रतिष्ठित है। इस मंदिर के पास एक छोटा सा पुकुर यानी तालाब भी है, जहां धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करना उत्तम माना जाता है।

बकरेश्वर महिषमर्दिनी शक्तिपीठ का दर्शन समय

  • प्रातःकालीन समय मंदिर दर्शनः सुबह 6 बजे से दोपहर 12 बजे तक
  • संध्याकालीन समय मंदिर दर्शनः शाम 4 बजे से रात 8 बजे तक

इस मंदिर में मंगला आरती, दिन की आरती, सध्याकालीन आरती और शयन आरती अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं।

बकरेश्वर महिषमर्दिनी शक्तिपीठ में मनाए जाने वाले उत्सव, अनुष्ठान एवं त्यौहार

नवरात्रि पूजाः इस मंदिर में साल में दो बार आने वाली नवरात्रि पर्व की धूम देखने लायक होती है। जब मां के इन नौ दिनों में उन्हें नौ रूपों की साधना की जाती है। चैत्र और आश्विन मास में आने वाला यह पर्व मुख्यतः देवी दुर्गा को ही समर्पित है। इस दौरान यहां होने वाली दुर्गा पूजा बहुत ही भव्य तरह से संपन्न की जाती है। यह समय इतना महत्वपूर्ण होता है कि इसकी तुलना साल के अन्य दिनों से नहीं की जा सकती है, ऊर्जा की सर्वोच्चता को प्रदर्शित करते इन दिनों मां महिषमर्दिनी सभी भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करती हैं।

महाशिवरात्रिः महिषमर्दिनी शक्तिपीठ में महाशिवरात्रि का पर्व भी बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। इस शक्तिपीठ में वक्रनाथ भैरव प्रतिष्ठित है जो भगवान शिव का ही रूप है। आज के दिन यहां विशाल मेले का भव्य आयोजन होने के साथ ही नमः शिवाय के मंत्रों से वातावरण गुजांएंमान रहता है। सुबह से ही शिव भक्तों की कतारें यहां जलाभिषेक करने को प्रतीक्षा में अपनी बारी का इंतजार करते हैं।

बकरेश्वर महिषमर्दिनी शक्तिपीठ से जुड़े रोचक तथ्य

बकरेश्वर महिषमर्दिनी शक्तिपीठ के पास अद्भुत गर्म झरनों की पावन श्रृंखला है जो उपचारात्मक शक्तियों से संपन्न भी हैं। यहां उपस्थित अग्नि कुंड, भैरव कुंड और सूर्य कुंड का जल औषधि का कार्य करता है। इन कुंडो के पानी में कई रोगों को ठीक करने की क्षमता है जिसमें त्वचा संबधित रोग  और अन्य कई लंबे समय से चली आ रही बीमारियों से ठीक करने की क्षमता है। यहां के अग्नि कुंड के पानी का तापमान लगभग 80 डिग्री सेल्सियस रहता है जो बहुत आश्चर्यजनक और कारगर भी है।

यह मंदिर पापहारा नदी के तट पर मौजूद है जिसको लेकर मान्यता है कि इस नदी में स्नान करने से पापों का नाश हो जाता है। तीर्थयात्री इस मंदिर में दर्शन करने से पहले पापहारा नदी में डुबकी लगाना सौभाग्य का प्रतीक मानते हैं। इसके जल की शीतल प्रवृति श्रद्धालुओं को पवित्र करने के साथ ही शांति सुकून प्रदान करता है।

बकरेश्वर महिषमर्दिनी शक्तिपीठ में दर्शन करने से पहले यहां अवस्थित अष्टावक्र मंदिर मे दर्शन करने की प्रथा है जिसका नियमन स्वयं भगवान शिव द्वारा ही कहा गया है।

बकरेश्वर महिषमर्दिनी शक्तिपीठ के आसपास घूमने वाले स्थान

तारापीठ मंदिर : पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले मे अवस्थित यह मंदिर बकरेश्वर से ज्यादा दूर नहीं हैं। तारापीठ मदिर देवी सती से जुड़े 51 शक्तिपीठों में से एक है जिसका जिक्र हिंदू धर्म ग्रंथों के कई पुराणों में पढने को मिलता है। कहते हैं देवी सती की तीसरी आंख इसी स्थान पर गिरी थी। तंत्र विद्या के अनुसार यह देवी दुर्गा की दस महाविद्याओं में से एक है, जो इसे तांत्रिक शक्तिपीठ के रूप में स्थापित करती हैं। 

शांति निकेतनः पश्चिम बंगाल के बोलपुर जगह जो बकरेश्वर से करीब ही है, यहां रवींद्रनाथ टैगोर जी का आश्रम है। महर्षि देवेद्रनाथ टैगोर ने इस आश्रम की नींव रखी थी, जो इनके पिता थे। मशहूर साहित्यकार रवींद्रनाथ टैगोर जी का संपूर्ण जीवन उपन्यास और लेखन को समर्पित था, साथ ही भारतीय स्वंतत्रता आंदोलन में भी इन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इनके इस आश्रम को साल 2023 में ही यूनेस्को की वैश्विक धरोहरों में स्थान मिला है। 

कंकालीताला मंदिरः शांतिनिकेतन आश्रम के पास ही यह देवी सती से जुड़ा ऐसा शक्तिपीठ है जहां उनकी कमर या शारीरिक ढांचा कंकाल रूप में गिरा था। इस कारण इस स्थान को कंकालीताला नाम से जाना जाता है। जहां देवी की मूर्ति इसके कंकाल स्वरूप को प्रदर्शित करती है। कंकालीताला मंदिर परिसर में कई अन्य महत्वपूर्ण मंदिर अवस्थित हैं जहां दर्शन करने को श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिलती है। 

तांतीपाराः बकरेश्वर स्थान से थोड़ी दूरी पर बीरभूम जिले के अन्तर्गत यह गांव पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाता है। यहां आप बंगाल की स्थानीय रीति रिवाजो और परंपराओ को करीब से जान सकते हैं। आप यहां स्थानीय स्वाद का आनंद चखते हुए ग्रामीण जीवन शैली का आनंद ले सकते हैं। 

बकरेश्वर महिषमर्दिनी शक्तिपीठ कैसे पहुंचे ?

हवाई मार्ग से 

  • कोलकाता यहां से करीब 240 किमी दूरी पर स्थित है जहां आप नेताजी सुभाष चंद्र बोस इंटरनेशनल एयरपोर्ट नजदीकी हवाई अड्डा है जहां से मंदिर पहुंचने के लिए सड़क माध्यम पहुंचा जा सकता है। 

रेल मार्ग से

  • इस शक्तिपीठ का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन सिउरी और दुबराजपुर है जहां से आप स्थानीय वाहनों की मदद से कम समय में ही मंदिर दर्शन को जा सकते हैं।

सड़क मार्ग से

  • बकरेश्वर स्थान सड़क मार्ग से पश्चिम बंगाल के प्रमुख स्थानों से जुड़ा हुआ है जहां आप परिवहन के साधनो से पहुंच सकते हैं। आप अपनी स्वयं की कार ड्राइव कर भी यहां पहुंच सकते हैं।

निष्कर्ष

अंत में, बकरेश्वर महिषमर्दिनी शक्तिपीठ सिर्फ एक दिव्य शक्तिपीठ ही नहीं वरन् आध्यात्मिक आस्था और भक्ति का संपूर्ण केंद्र है। यह सिर्फ एक मंदिर ही नहीं वरन् यह पूरा स्थान ही अष्टावक्र ऋषि की तपस्या के परिणामस्वरूप तीर्थस्थल कहा जाता है। चिकित्सीय गुणों से मशहूर कुंडों की उपचारात्मक शक्तियां  अद्वितीय गुणों से भरपूर व रोगों और दोषों से मुक्ति देने वाला अद्भुत और अकल्पनीय स्थान है। देवी सती से जुड़ा यह प्रतिष्ठित शक्तिपीठ भगवान शिव और माता भगवती दोनों की उपस्थिति को प्रदर्शित करता उनका प्रिय स्थान है, जहां न जाने कितने ही दर्शनार्थियांं की मनोकामना फलीभूत होती है। यहां आने वाले प्रत्येक भक्त को महादेव और देवी की उपस्थिति का सूक्ष्म अनुभव प्राप्त होता है।