- Jul 27, 2026
रत्नावली कुमारी शक्तिपीठ का एक और नाम आनंदमयी शक्तिपीठ भी है जो हिंदू धर्म के अनुसार बहुत प्रसिद्ध स्थान है। देवी दुर्गा के 51 शक्तिपीठों में से एक यह तीर्थस्थल पश्चिम बंगाल के हुगली शहर में अवथित है जो शक्तिपीठों के लिए बेहद विशेष राज्य है, जहां भारत के सर्वाधिक 14 शक्तिपीठ स्थित हैं। यहां की समृद्धि, संपन्नता और सांस्कृतिक विविधता पर्यटकों को बहुत आकर्षित करती है, जिस पर मां सती के इन शक्तिपीठों की छाप काफी हद तक देखने को मिलती है। इन शक्तिपीठों की उत्पत्ति से जुड़े पौराणिक इतिहास और दिव्य कथाएं अपने भक्तों को हमेशा ही प्रिय लगती हैं, इन्हीं में से एक है रत्नावली शक्तिपीठ, आइए इसके बारें में और भी नजदीक से जानते हैं।
शक्तिपीठों से जुड़ी कहानी
एक बार राजा दक्ष ने विशाल यज्ञ समारोह का आयोजन किया जिसमें संसार के सभी देवी देवताओं को बुलाया लेकिन अपनी पुत्री सती और उनके पति भगवान शिव को न्यौता नही दिया। इसके बारें में जब देवी सती को पता चला तो वे अत्यंत दुखी हुई और कारण जानने के उद्देश्य से अकेले ही यज्ञ समारोह में चली गईं। जहां उन्हें तिरस्कृत और अपमान भरे व्यवहार का सामना करना पड़ा और अपने पति भगवान शिव के लिए बहुत कुछ अपशब्द सुनने पड़े इससे आहत होकर उन्होने यज्ञ कुंड में बैठकर अपनी जान दे दी।
इस पूरी घटना के बारें में जब भगवान शिव को पता चला तो उन्हें अत्यधिक क्रोध आया जिस वजह से उन्होंनें देवी सती का मृत शव लेकर समस्त लोकों में विचरण करना शुरू कर दिया। उनकी इस हालत को देखकर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शव को 51 भागों में विभक्त कर भारतीय उपमहाद्वीप में गिरा दिया, जहां भी ये शक्ति अंग या आभूषण गिरे वहां शक्तिपीठों की स्थापना हो गई। इन शक्तिपीठों की स्थापना का श्रेय भगवान शिव को जाता है इसके साथ ही प्रत्येक शक्तिपीठ में भगवान शिव स्वयं भैरव रूप में विराजमान है।
रत्नावली शक्तिपीठ की उत्पत्ति एवं इतिहास
इस स्थान पर रत्नावली शक्तिपीठ में देवी सती का दायां कंधा गिरा था इस वजह से यह शक्तिपीठ रत्नावली कुमारी या आनंदमयी शक्तिपीठ नाम से जाना जाता है। रत्नावली का शाब्दिक अर्थ तो कीमती पत्थरों की माला है जिसे सती मां धारण करती थीं। यह शक्तिपीठ हुगली जिले खानकुल गांव में स्थित है जिसकी उत्पत्ति के बारे में कोई पक्की जानकारी नहीं है। वैसे इसके स्थान को लेकर भी कई मतभेद सुनने में आते हैं, कुछ लोग इसकी अवस्थिति चेन्नई में भी बताते हैं। फिर भी कुछ लोगों का मानना है कि इस शक्तिपीठ का सटीक स्थान अभी भी किसी को नहीं पता है।
इस मंदिर का नाम यहां बहने वाली रत्नावली नदी के होने के कारण से रत्नावली शक्तिपीठ है जो अपने भक्तो का सदैव कल्याण करता है।
रत्नावली मंदिर की वास्तुकला एवं संस्कृति
रत्नावली या आनंदमयी शक्तिपीठ पारंपरिक बंगाली संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता अति सुदंर स्थान है जिसकी शैली बंगाली ही है। मंदिर की छत समतल और मोड़दार कंगनी से बनी हुई हैं जो पक्की मिट्टी की टाइलों से सुशोभित करती हैं। प्रवेश द्वार मंदिर के अग्र भाग की तरफ है जहां विशेष अंलकृत डिजाइन और भी ज्यादा आकर्षित करते हैं। प्रवेश द्वार की ऊंचाई भव्य और आकर्षक है जिसका एक गेट प्रांगण की तरफ जाता है। प्रांगण के बीचों बीच मां रत्नावली का मंदिर है और इसके चारों ओर विभिन्न देवी देवताओं के पूजित छोटे छोटे मंदिर हैं।
मुख्य मंदिर यानी गर्भग्रह ईंट और गारे से बनी एक चौकोर आकार की संरचना है जिसमें मां रत्नावली की प्रतिमा स्थापित है। मां रत्नावली चतुर्भुजी स्वरूप में विराजित हैं जहां इनके हाथों में त्रिशूल, घंटी, तलवार और कमल का फूल है। मां की प्रतिमा रेशमी वस्त्रों और शानदार आभूषणों से सुशोभित है जो चांदी के सिंहासन में विराजमान है। मंदिर का गर्भग्र्रह में हिदू धर्म ग्रंथों की पौराणिक कथाओं के चित्रण और अलंकृत नक्काशियों से सुसज्जित विशेष आकर्षण उत्पन्न करता है।
रत्नावली मंदिर में दर्शन समय
- मंदिर खुलने का समयः सुबह 5ः30 बजे
- मंदिर बंद होने का समयः रात 10 बजे
रत्नावली शक्तिपीठ में मनाए जाने वाले त्यौहार, अनुष्ठान एवं उत्सव
नवरात्रिः चैत्र माह में आने वाला यह पर्व नौ दिनों का देवी का मुख्य त्यौहार होता है जब इन नौ दिनों मे ंसारा संसार मां की आराधना, पूजा अर्चना संपन्न करता है। इस दौरान यहां लगने वाला विशाल मेला और भव्य उत्सव हर किसी का मन मोह लेते हैं। रत्नावली शक्तिपीठ को फूलों से सजाया जाता है। रंग बिरंगी रोशनी से सराबोर करते नज़ारें और मां का दिव्य आशीर्वाद लेने के लिए भक्तों की भारी भीड़ जुटती है।
दुर्गापूजाः आश्विन मास यानी सितम्बर अक्टूबर में आने वाला यह नवरात्रि पर्व बंगाल की दुर्गा पूजा के लिए विश्व प्रसिद्ध है जहां मां दुर्गा की विशेष पूजा अर्चना और अनुष्ठानों को संपन्न किया जाता है। पंचमी से लेकर नवमी तिथि तक यहां मां कुमारी के दर्शनों के लिए श्रद्धालु आस्था और विश्वास के साथ यहां आते हैं।
दीवाली पर्वः पश्चिम बंगाल में दीपावली की रात में काली पूजा करने का विधान है इसीलिए दीवाली की रात पर यहां मां रत्नावली की पूजा अर्चना और रात्रि जागरण का आयोजन किया जाता है।
महाशिवरात्रिः फरवरी या मार्च के महीने मे आने वाला महाशिवरात्रि पर्व भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ा प्रमुख त्यौहार है। इस दिन सभी मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ होती है। रत्नावली मंदिर में महाशिवरात्रि पर भगवान भैरव का जलाभिषेक और पंचोपचार पूजन किया जाता है।
सोमवती अमावस्या : सोमवार के दिन होने वाली अमावस्या श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण दिन होता है। इस दिन रत्नावली मां की परिक्रमा और पूजा संपन्न की जाती है।
रत्नावली शक्तिपीठ से जुड़े रोचक तथ्य
रत्नावली शक्तिपीठ में मा की आराधना कुमारी रूप में की जाती है। यहां इन्हें विभिन्न तरह के फल मिठाई और पसंदीदा हलवा चने का भोग अर्पित किया जाता है, इसके अलावा यहां भोग के रूप में मांसाहारी प्रसाद भी चढाया जाता है।
यहां भगवान शिव को भैरव रूप में ही पूजा जाता है, जिनका शिवलिंग मंदिर के अंदर स्थापित है।
रत्नावली शक्तिपीठ का सही स्थान अभी भी अज्ञात है जिसके बारें में अभी तक कोई निश्चितता प्राप्त नहीं हुई है।
हुगली गांव मेंं यह शक्तिपीठ रत्नावली नदी के किनारे स्थित होने के कारण रत्नावली शक्तिपीठ नाम से जाना जाता है जिसे मां सती के गले के हार की भी संज्ञा दी जाती है।
रत्नावली शक्तिपीठ के आसपास घूमने योग्य स्थान
चंदनगर संग्रहालयः यह संग्रहालय पश्चिम बंगाल के प्राचीन और सर्वश्रेष्ठ संग्रहालयों में से एक है जहां आप फ्रांसीसियों के संपन्न और औपनिवेशक इतिहास की झलक को देख सकते हैं। इसकी स्थापना 1952 में डुप्लेक्स हाउस में की गई थी। यहां उस समय के फर्नीचर, उपहार संग्रह, युद्ध के सामानों और गर्वनर जनरलों के व्यक्तिगत चीजों के संग्रह को देख सकते हैं।
तारकेश्वर मंदिरः हुगली जिले के तारकेश्वर गांव में तारकेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित प्रसिद्ध मंदिर है जिसका निर्माण 16वीं शताब्दी के समय कराया गया है। इसे राजा भारमल्ला द्वारा बनवाया गया जिसकी वास्तुकला वास्तव में अद्भुत है जो अचला या नट मंदिर शैली में निर्माणित है। मां काली और लक्ष्मी नारायण मंदिर भी इसी मंदिर परिसर में अवस्थित है। तारकेश्वर मंदिर के पास में ही दुग्ध पुकुर नाम से पवित्र तालाब है जहां भक्त स्नान कर भगवान शिव के शिवलिंग पर जलाभिषेक और पूजा अर्चना करते हैं।
सेरामपुर राजबाड़ीः हुगली जिले में गोस्वामी परिवार की यह बाड़ी सन् 1815 से लेकर 1820 में बनाई गई जो एक शानदार महल है। इसका निर्माण रघुराम गोस्वामी द्वारा कराया गया। बंगाली संस्कृति का पारंपरिक रूप प्रदर्शित करती यह बाड़ी अपनी अनूठी वास्तुकला प्रदर्शित करती है। यहां ऊंचे स्तंभ, आपसी जुड़े गलियारे और अलंकृत नक्काशी आपको यादगार पल प्रदान करेगी। यहां का ठाकुरदलन पूजा स्थान अपनी बोनेडी बाड़ी के लिए पूरे पश्चिम बंगाल में मशहूर है, जो तीन पुराणों देवी पुराण, बृहत नंदिकेश्वर पुराण और कालिकाह पुराण के सिद्धांतो पर संपन्न कराई जाती है। राजबाड़ी में मौजूद राधारानी की मूर्ति अष्टधातु की है जो बहुत प्रसिद्ध है।
हंगेश्वरी मंदिरः हुगली नदी के तट पर त्रिवेणी और बंदेल के बीच बांसबेरिया में स्थित यह मंदिर अपने अनोखे नाम के साथ साथ असाधारण वास्तुकला और इतिहास के कारण प्रसिद्ध है। कमल पंखुड़ी आकार में बने इसकी 13 मीनारें रूसी वास्तुकला की तरह दिखाई पड़ता है। यहां देवी काली की पूजा हंगेश्वरी रूप में होती है, मंदिर की आंतरिक संरचना मानव शरीर की भीतरी भाग की तरह ही है, जिसमें पकी हुई मिट्टी टेराकोटा की सजावट की गई है। आश्चर्यजनक बात है कि यहां देवी की प्रतिमा नीले रंग की नीम की मूर्ति हे जिसके चार हाथ हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत इस मंदिर को एक विरासत स्थल के रूप में सहेजा जाता है।
इटाचुना राजबाड़ीः हुगली जिले का अनूठा महल जिसे बरंगी डांगा के नाम से भी जाना जाता है। पश्चिम बंगाल की प्रसिद्ध राजबाड़ियों में से एक यह महल कुंदन परिवार द्वारा सन् 1766 में बनाया गया था। आश्चर्य की बात है कि कुंदन परिवार मराठा बर्गी योद्धा समूहों में से जाने जाते थे, जो बंगाल में आकर बस गए थे। यही कुंदन कुछ वर्षों बाद कुंडू कहलाने लगे। इस राजबाड़ी में आज भी इतिहास की झलक दिखाई देती है जो इनकी दीवारों पर अंकित है। शक्तिशाली और प्रशंसनीय इस परिवार की यह निशानी बेहद आकर्षक और भव्य है। इस राजबाड़ी मे तीन महल मुख्य है जैसे अंदरमहल, ठाकुरदलन और बैठकखाना है। इनमें से ठाकुरदलन एक पारिवारिक मंदिर है जो अन्य राजबाड़ियों में मौजूद मंदिरों मे ंसबसे बड़ा है। कमरे और इसके शाही अंदाज में और ज्यादा सुदंरता बढाते यहां के सुदर बाग बगीचो की शोभा देखते बनती है।
रत्नावली शक्तिपीठ कैसे पहुंचे
हवाई मार्ग से
- हवाई यात्रा से रत्नावली मंदिर पहुंचने के लिए निकटतम हवाई अड्डा नेताजी सुभाष चंद्र बोस इंटरनेशनल एयरपोर्ट है। जहां से टैक्सी या बस के माध्यम से मंदिर यात्रा संपन्न की जा सकती है।
रेल मार्ग से
- रत्नावली शक्तिपीठ का नजदीकी रेलवे स्टेशन आरामबाग है जहां से मंदिर की दूरी लगभग 10 किमी है। इसे आप स्थानीय वाहनों से पूरी कर सकते हैं।
सड़क मार्ग से
- रत्नावली शक्तिपीठ पहुंचने के लिए यातायात की बेहतर सुविधा है जहां आप देश के प्रमुख शहरों से राज्य परिवहन की या प्राइवेट बसों से यात्रा कर सकते हैं या फिर स्वयं की कार से यहां ड्राइव कर पहुंच सकते हैं।
निष्कर्ष
अंत में, रत्नावली शक्तिपीठ पारंपरिक बंगाली संस्कृतियों और धार्मिक रीति रिवाजों को पालन करता हुआ दिव्य तीर्थ स्थान है जहां मंदिर की अनोखी वास्तुकला और सुदंरता इसकी धार्मिकता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। भव्य प्रवेशद्वार और पौराणिक कथाओं के जीवंत चित्रण यहां के बारें में और भी ज्यादा उत्सुकता बढाते हैं। मां दुर्गा के इन शक्तिपीठों में सामाजिक सौहार्द और समरसता की भावना देखने को मिलती है, जहां भक्त आशीर्वाद की पवित्र वर्षा से खुद को अभिसिंचित महसूस करते हैं।
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