- Dec 13, 2025
भारत बौद्ध धर्म की पावन धरती है। भगवान गौतम बुद्ध जिनके आने से बौद्ध धर्म का उदय हुआ, उनका संपूर्ण जीवन इसी पवित्र धरा पर बीता - जन्म, ज्ञान से लेकर उपेदश देने तक का जीवन सफर और देह त्याग। इन सभी जीवन घटनाक्रमों से जुड़े मंदिर व मठ भारतवर्ष के लगभग हर कोने मे स्थित हैं जो आध्यात्मिक शक्तियों और आत्मजागरण का केंद्र होने के साथ ही ऐतिहासिक दिलचस्पी और भव्य वास्तुकला की छाप छोड़ते हैं। आइए आज हम इन प्रसिद्ध बौद्ध स्थलां पर सैर करते हैं जो विश्वस्तर पर अपनी कलात्मक प्रसिद्धि के साथ ही धार्मिक पुर्नजागरण का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं।
1. तवांग मठ, तवांग, अरूणाचल प्रदेश
तवांग, अरूणाचल प्रदेश का एक प्रसिद्ध गांव है जहां इसी नाम से बौद्ध मठ की स्थापना श्रद्धालुओ को आकर्षित करती है। विश्व के कुछ सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण मठ इसी क्षेत्र में स्थापित है, जिनमे ंसे तवांग मठ एक है जो तिब्बत के बाहर सबसे बड़े बौद्ध मठो में से एक इस क्षेत्र का प्रभावशाली रत्न है। 17वीं शताब्दी में बना यह मठ आध्यात्मिक आभा का संचार करता है, इसकी भव्य संरचना में अनमोल कलाकृतियां, थांगका, पांडुलिपियां और प्राचीन ग्रंथ शामिल हैं। आनंद और पूर्ण विजय के स्वर्गीय निवास के शिखर में तवांग मठ का नाम लिया जाता है, जिसकी स्थापना सन् 1680-81 में मेराक लामा ग्यात्सो ने समुद्र तल से करीब 10,000 फीट ऊपर एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। दक्षिण और पश्चिम दिशा में खड्ड, उत्तर में संकरी पहाड़ी और पूर्व में एक धीमी ढलान है। आध्यात्मिक स्थल होने के साथ ही सांस्कृतिक सामाजिक केंद्र भी है, जिसका असर यहां के स्थानीय निवासियों और उनकी जीवन शैली पर दिखाई पड़ता है।
मठ तक पहुंचने का रास्ता उत्तर दिशा से पहाड़ी के किनारे से है। प्रवेश द्वार के पास एक इमारत है जिस पर डुंग्युर मणि रखी है, यही से मठ में इस्तेमाल करने हेतु पानी लाया जाता है। दक्षिण में काकलिंग है जो झोंपड़ीनुमा संरचना है और यही मंदिर का प्रवेश द्वार है। मठ मुख्य द्वार दक्षिण दिशा में है जिसमें विशाल द्वार लगे है। भगवान बुद्ध की विशाल संपन्न वैभवशाली स्वर्ण से मड़ी हुई प्रतिमा उत्तरी भाग में स्थित हैं, जो कमल सिंहासन पर विराजमान है। मठ की सबसे बड़ी यह प्रतिमा करीब 25 फुट लंबी है।
प्रमुख आकर्षणः साहसिक गतिविधियांं के शौकीन लोगों के लिए स्वर्ग, फोटोग्राफी अवसर के लिए शानदार पृष्ठभूमि और मानसिक शांति व सुकून पाने का सबसे उत्तम योग्य स्थान। सूर्योदय, सूर्यास्त के मनोरम नजारें और तवांग चू नदी के शीतल जल की झलक अनोखी लगती है। होम स्टे कर यहां की स्थानीय संस्कृति को समझने के साथ ही मठ में दिसम्बर में होने वाले लोसर महोत्सव की धूम का आनंद लें।
कैसे पहुंचे
हवाई मार्ग से
- नजदीकी हवाई अड्डा तेजपुर है जो भारत के प्रमुख शहरों से अच्छी तरह जुड़़ा है।
रेल मार्ग से
- असम का तेजपुर रेलवे स्टेशन नजदीक है जहां से सड़क मार्ग से तवांग मठ की यात्रा कर सकते हैं।
सड़क मार्ग से
- असम के रास्ते आप सड़क मार्ग से अरूणाचल प्रदेश की यात्रा संपन्न करते हुए तवांग मठ के दर्शन करने जा सकते हैं।
2. रूमटेक मठ, गंगटोक, सिक्किम
सिक्किम की राजधानी गंगटोक से लगभग 23 किमी दूर एक पहाड़ी पर स्थित रूमटेक शांतिपूर्ण जगह पर बना हुआ तिब्बती बौद्ध धर्म के कार्ग्यू संप्रदाय के परम पुनीत ग्यालवा करमापा का निवास स्थान है। यहां जाने के लिए आपको सिक्किमी गांवों और कई धान के खेतो के रास्तों से होकर गुजरना होता है। हरी भरी हरियाली, मंत्रमुग्ध करती प्राकृतिक आकृतियां और कोहरे से सराबोर पहाड़ियों के नजारें रूमटेक को शांत और कुछ पल रूकने हेतु आदर्श स्थान बनाते हैं। रूमटेक मठ सिक्किम का सबसे बड़ा मठ है जो तिब्बती वास्तुकला का सर्वोत्तम उदाहरण हैं, इसकी तुलना तिब्बत के त्सुरपु स्थित मूल मठ से की जाती है जो इसकी प्रतिकृति लगता है। इस मठ में विश्वस्तरीय दुर्लभ बौद्ध धार्मिक कलाकृतियो के नमूने देखने को मिलते हैं।
प्रमुख आकर्षणः रूमटेक के आसपास स्थानीय दर्शनीय स्थलों की यात्रा करने के साथ ही व्हाइट वाटर राफि्ंटग और ट्रैकिंग भी कर सकते हैं। रूमटेक मठ के ठीक आगे नेहरू बॉटनिकल गॉर्डन है जिसमें उष्णकटिबंधीय और शीतोष्ण जलवायु के पौधों और पेड़ो की उपस्थिति से लेकर विदेशी आर्किड का एक बड़ा ग्रीनहाउस भी है। यहां बच्चों के लिए छोटा सा खेल का मैदान जिसमें झूले और सी सॉ है।
कैसे पहुंचे
हवाई मार्ग से
- सबसे नजदीकी हवाई अड्डा पाक्योंग सिक्किम है जहां से गंगटोक की दूरी लगभग 32 किमी है। टैक्सी या बस के माध्यम से आप गंगटोक का सफर कर सकते हैं।
रेल मार्ग से
- गंगटोक का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन सिलीगुड़ी दूरी करीब 113 किमी और न्यू जलपाईगुड़ी दूरी करीब 125 किमी है। आप यहां से बस या टैक्सी की मदद ले कर पहुंच सकते हैं।
सड़क मार्ग से
- गंगटोक तक जाने का एकमात्र साधन सड़क माध्यम ही हैं। चाहे आप हवाई जहाज से आए या ट्रेन से, यहां तक पहुचने के लिए आपको बस या टैक्सी की जरूरत होती ही है। आप कोलकाता, असम या किसी मुख्य शहर से आसानी से सड़क माध्यम से सिक्किम गंगटोक की सैर करने जा सकते हैं।
3. महाबोधि मंदिर, बोधगया, बिहार
महाबोधि का शाब्दिक अर्थ महान जाग्रति मंदिर है जो एक यूनेस्को वैश्विक धरोहर स्थल के रूप मे बोधगया के प्राचीन मंदिर के रूप में जाना जाता ह, वही स्थान है जहां महात्मा बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। यहां का मुख्य आकर्षण शानदार बोधि वृक्ष और मंदिर है जो वृक्ष के पूर्व में स्थित है। आकर्षक वास्तुकला और स्थापत्य प्रभाव बेहद खास है जिसका तहखाना ही 48 वर्ग फुट है जो बेलनाकार पिरामिड के आकार में अपनी गर्दन तक पहुंचता है। मंदिर की कुल ऊंचाई लगभग 170 फुट है और मंदिर के शीर्ष पर छत्र है, जो धर्म की एकरूपता और सत्तामक प्रवृति को प्रदर्शित करता है। बोधगया में महाबोधि मंदिर विश्व भर के बौद्ध तीर्थ स्थलों में सबसे महानतम और पूजनीय तीर्थ स्थल है जो लगभग दो हजार सालों से बौद्धो का एक प्रमुख तीर्थ स्थल रहा है।
कहा जाता है कि बोधगया स्थित बोधि वृक्ष उसी मूल वृक्ष का प्रत्यक्ष प्रमाण है जिसके नीचे गौतम बुद्ध महात्मा बुद्ध कहलाये। बौद्ध पौराणिक कहानियों के अनुसार यदि उस स्थान पर कोई बोधि वृक्ष नहीं उगता तो बोधि वृक्ष के चारों ओर की भूमि एक शाही करीसा की दूरी तक सभी पौधों से विहीन हो जाती है। बोधि वृक्ष के चारों ओर की भूमि से कोई भी प्राणी यहां तक कि कोई बड़ा जानवर भी नहीं गुजर सकता। कहते हैं इसी स्थान पर पृथ्वी की नाभि स्थित है क्योंकि अन्य कोई स्थान बुद्ध की प्राप्ति के भार को सहन नहीं कर सकता।
प्रमुख आकर्षणः बोधगया से थोड़ी दूरी पर गया स्थित है जहां हिंदू धर्म के लोंगो के लिए पवित्र तीर्थ स्थान है जहां भगवान विष्णु के चरण बिन्दु के दर्शन करने का अवसर प्राप्त होता है। फल्गु नदी और अन्य मुख्य मंदिरों के दिव्य आकर्षण आमंत्रित करते हैं। तिब्बती शरणार्थी बाजार में खरीदारी कर सकते हैं। इसके अलावा थाई मंदिर, मुचालिंदा झील, रॉयल भूटान मठ, ब्रह्म्योनी मंदिर, जापानी और वियतनामी मंदिरो के दर्शन कर सकते हैं।
कैसे पहुंचे
हवाई मार्ग से
- बोधगया में बोधगया या गया हवाई अड्डा भी कहते हैं। यहां से आप आराम से बोधगया की सैर कर सकते हैं।
रेल मार्ग से
- रेल मार्ग के माध्यम से जाने के लिए गया जंक्शन रेलवे स्टेशन बिहार का प्रसिद्ध स्टेशन है जो गया जाने का सर्वाधिक सुलभ साधन है।
सड़क मार्ग से
- देश के मुख्य शहरो से बिहार के गया जाने के लिए सड़क सुविधा बेहतर है जहां आप बस, टैक्सी या अपने वाहन से गया की सैर आराम से कर सकते हैं।
4. सारनाथ, वाराणसी, उत्तर प्रदेश
सारनाथ बौद्ध मंदिर वाराणसी, विश्व भर के बौद्ध धर्म के लोगों के लिए बेहद पवित्र पावन तीर्थस्थल है जहां भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद पहली बार अपने पांच शिष्यों को उपदेश दिए थे। कहा जाए तो यह पहला बौद्ध संघ था जो इस स्थान पर सबसे पहले बना था। इस स्थान पर महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं में चार आर्य सत्य और मोक्ष प्राप्ति के अष्टांगिक मार्ग के सिद्धांत शामिल है, इस घटना को धर्मचक्र प्रवर्तन के नाम से जाना जाता है। इस घटना के बारें मे बौद्ध धर्म ग्रंथ ललितविस्तर सूत्र में भी बताया गया है।
सारनाथ बौद्ध मंदिर का इतिहास लगभग 528 ईसा पूर्व का है। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में अशोक के शासनकाल के दौरान यहां करीब 15.24 मीटर ऊंचा स्तंभ अशोक स्तंभ बनाया गया है जो शीर्ष पर चार सिंह हैं जो भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है। छठी शताब्दी में निर्मित धमेक स्तूप स्थापत्य चमत्कारों में से एक है।
प्रमुख आकर्षणः चौखंडी स्तूप, सारनाथ पुरातत्व संग्रहालय, मूलगंध कुटी विहार- बुद्ध के जीवन को दर्शाता आधुनिक मठ, थाई मंदिर-हरी भरी हरियाली और जटिल वास्तुकला लिए बौद्ध मंदिर जहां अनुपम शांति का अनुभव होता है और हिरण पार्क में चिंतन कर सकते हैं। सारनाथ वाराणसी के पास ही स्थित है जहां कई प्रसिद्ध मंदिर और घाट हैं। इसके अलावा बनारस के प्रमुख बाजारों से मनपसंद खरीदारी कर सकते हैं।
कैसे पहुंचे
हवाई मार्ग से
- लाल बहादुर शास्त्री एयरपोर्ट, बनारस के माध्यम से करीब 25 किमी दूरी तय कर सारनाथ वाराणसी की सैर कर सकते हैं।
रेल मार्ग से
- नजदीकी रेलवे स्टेशन वाराणसी जंक्शन लगभग 10 किमी की दूरी पर है जहां से आप स्थानीय साधनों के माध्यम से यहां की सैर के लिए जा सकते हैं।
सड़क मार्ग से
- उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर की कनेक्टिविटी सड़क मार्ग राष्ट्रीय राजमार्गो से बेहतर है। यहां आप देश के प्रमुख शहरो से बस या अपनी कार के माध्यम से पहुंच सकते हैं।
5. नालंदा महाविहार, राजगीर, बिहार
बौद्ध धर्म के इस शिक्षा केंद्र में अन्य देशों के छात्र भी पढा करते थे। बिहार के पटना से करीब 86 किमी दक्षिण पूर्व और राजगीर से 12 किमी लगभग उत्तर में बौद्ध विश्वविद्यालय के अवशेष प्राचीन संपन्नता और समृद्धि को प्रदर्शित करते हैं। यहां अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा खोज की गई थी, यहां हेनसांग और इत्सिंग के यात्रा विवरणों से पता चलता है कि वे यहां अध्ययन हेतु आये थे। इस विश्व विद्यालय की स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त ने की थी।
नालंदा एक विशाल बौद्ध मठ के रूप में प्रचलित है जो वर्तमान में अब खंडहर में है। 7वीं शताब्दी से लेकर 1200 ईसवी तक यह शिक्षण केंद्र के रूप मे प्रसिद्ध था, जिसे भारत के प्रांरभिक विश्वविद्यालयों में से एक माना जाता है। प्राचीन काल में विशाल क्षेत्र पर फैला यह आकर्षण वास्तुकला का एक उत्कृष्ट नमूना था जो लगभग 12 हेक्टेयर क्षेत्रफल पर फैला था। आज भी यहां इन अवशेषो की छवि पर्यटकों को आकर्षित करती है।
प्रमुख आकर्षणः नालंदा से थोड़ी दूरी पर स्थित राजगीर में बौद्ध मंदिरा के दर्शन कर सकते हैं। पटना में श्री पटना साहिब मंदिर, महाबोधि मंदिर, जानकी मंदिर, मंगला गौरी मंदिर और अन्य स्मारकों को घूम सकते हैं।
कैसे पहुंचे
हवाई मार्ग से
- नालंदा में निकटतम एयरपोर्ट पटना में है जो यहां से करीब 89 किमी है।
रेल मार्ग से
- नजदीकी रेलवे स्टेशन राजगीर है। मुख्य रेलवे स्टेशन गया से सुविधाजनक ज्यादा है क्योंकि यहां से ट्रेनों की आवाजाही ज्यादा है।
सड़क मार्ग से
- नालंदा सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है जो राजगीर से 12 किमी, बोधगया 110 किमी, गया 95 किमी, पटना 90 किमी दूरी पर है।
6. हेमिस मठ, लेह, लद्दाख
हेमिस गोम्पा लद्दाख का सबसे प्रभावशाली मठ है जिसे यहा का सबसे संपन्न और वैभवशाली मठ भी कहा जाता है। राजधानी लेह से करीब 45 किमी दूरी पर स्थित हेमिस मठ अपने हेमिस महोत्सव के लिए बेहद प्रसिद्ध है जो हर 12 साल मे मनाया जाता है। इस महोत्सव का मुख्य आकर्षण विशाल थांगका यानी धार्मिक चित्रकला का अनावरण है। 11वीं शताब्दी में बना यह मठ 1672 में पुर्नस्थापित किया गया था। द्रुकपा वंश का शानदार मठ है जो लेह में स्थित है। इसके पास एक बौद्ध संग्रहालय भी है जिसमें तिब्बती पुस्तकें, थंगकाओं, सोने की मूर्तियां और कीमती पत्थरों से जड़े स्तूपों, हथियारों वाहकों और एक भरवां गिद्ध बच्चे का का विस्तृत संग्रह देखने को मिलता है।
तिब्बती शैली में बना हेमिस मठ की दीवारें सफेद रंग की है जहां प्रवेश एक विशाल द्वार से होता है। उत्तर दिशा में दो सभा भवन है जिसमें संरक्षक देवता और जीवनचक्र विद्यमान है।
प्रमुख आकर्षणः हेमिस मठ से करीब 3 किमी दूरी पर स्थित पवित्र आश्रम स्थित है जिसकी स्थापना महान ग्याल्वा कोत्संग ने की थी, जिनके पदचिन्ह और हस्तचिहन आश्रम के अंदर मौजूद शिला पर पाए जाते हैं। हेमिस मठ के पास राष्ट्रीय उद्यान भी है जहां आप हिम तेंदुए और आश्चर्यजनक जानवरों को देख सकते हैं। हेमिस मठ में गुरू रिम्पोछे की प्रतिमा भी दर्शनीय है।
कैसे पहुंचे
हवाई मार्ग से
- लेह इंटरनेशनल एयरपोर्ट के माध्यम से हवाई रास्ते से आप हेमिस मठ की सैर कर सकते हैं।
रेल मार्ग से
- जम्मूतवी रेलवे स्टेशन जिसकी दूरी करीब 750 किमी है, यहां से बस या टैक्सी के माध्यम से हेमिस मठ घूमने जा सकते हैं।
सड़क मार्ग से
- लेह एयरपोर्ट और जम्मूतवी रेलवे स्टेशन से सड़क माध्यम से लेह की दूरी आप बस, टैक्सी या किराए पर बाइक पर लेकर जा सकते हैं।
7. ताबो मठ, स्पीति वैली, हिमाचल प्रदेश
हिमालय क्षेत्र का सबसे प्राचीन मिट्टी का बना मठ है जो हिमालय का अजंता भी कहा जाता है। यह बौद्ध मठ आज भी बिना किसी परिवर्तन के सुरक्षित है जो पर्यटकों को और ज्यादा आकर्षित करता है। लगभग 1000 साल पहले बने इस मठ में पुराने मंदिर जिनकी संख्या नौ और कई स्तूप हैं। यहां का गुफा मंदिर जो पहाड़ी ढलान पर है, इसका उपयोग ध्यान साधना प्रार्थना के लिए किया जाता है। परम पुनीत 14वें दलाई लामा द्वारा 1983 में ताबो में पहली कालचक्र दीक्षा के लिए सभागार, कालचक्र मंदिर बनाया गया था। साल 2009 में कालचक्र स्तूप की नीवं रखी गई थी। मंदिर परिसर में बौद्ध चित्रों की मूर्तियों का अनोखा संग्रह है जो तिब्बती भारतीय बौद्ध धर्म के इतिहास को दर्शाता है।
प्रमुख आकर्षणः स्पीति वैली हिमाचल प्रदेश में बना यह मठ अन्य आकर्षणो को भी संजोता है। यहां आप बर्फीली हवाओं के साथ मुख्य झीलों और ताबो मठ के पास बने ड्रोमटन का बड़ा मंदिर, महाकाल वज्र भैरव मंदिर, कार्ब्युम लाखांग श्वेत मंदिर भी देख सकते हैं। चित्र भंडार कक्ष में सुंदर थंगका आकर्षित करते हैं जहां भिक्षुओं के मुखौटों, हथियार और अनुष्ठानिक पोशाकें रखी जाती हैं। ताबो मठ ही नही वरन पूरी स्पीति घाटी का मौसम बहुत ठंडा होता है जो वृष्टि छाया क्षेत्र में आता है और शीतकालीन मरूस्थल के नाम से जाना जाता है।
कैसे पहुंचे
हवाई मार्ग से
- कुल्लू का भुंतर हवाई अड्डा सबसे नजदीकी एयरपोर्ट है जहां से आप सड़क माध्यम से ताबो मठ घूमने आ सकते हैं।
रेल मार्ग से
- शिमला रेलवे स्टेशन है जो कालका-शिमला रेल मार्ग से जुड़ा है और नैरो गेज मार्ग है। इसके अलावा आप चंडीगढ रेलवे स्टेशन से सड़क माध्यम से यहां की सैर करने पहुंच सकते हैं।
सड़क मार्ग से
- शिमला, चंडीगढ और रिकांगपियों से आपको दैनिक बसें ताबो तक की यात्रा करा सकती हैं। स्पीति घाटी में बसा यह मठ स्थानीय वाहनों की मदद से आराम से जाया जा सकता है।
निष्कर्ष
बौद्ध धर्म की पताका फहराते भारतीय मठों और मंदिरों की शोभा अत्यंत निराली है जिनकी उपस्थिति से मन को मानसिक शांति और आध्यात्मिक आभा प्राप्त होती है। प्राचीन मठों की अद्वितीय स्थापत्य कला और उनकी विशेषताएं विरासतकालीन समय की उत्कृष्टता को दर्शाती हैं। महात्मा बुद्ध ने अपनी शिक्षाओं में मानव उन्नति और जीवन जीने का सार समझाते हुए हमेशा ही मानव सेवा धर्म को सर्वोच्च बताया है। इनके उपदेशों और शिक्षाओं को अपनाते इनके मठ और मंदिर आज भी उतने ही प्रासंगिक है जिनकी अवस्थिति और शांतिपूर्ण वातावरण श्रद्धालुओं को भाव विव्हल और ओजस्वी बनाता है।
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