• Dec 26, 2025

गुरूद्वारा, भारत में पवित्र, सामाजिक समरसता और नेक जगहों में से एक जगह है जो सिक्ख समुदाय के अनुयायियों के लिए पावन तीर्थस्थल और उनके आराध्य को समर्पित स्थान होता है। इन गुरूद्वारों में लोग मत्था टेकने और अरदास लेकर आते हैं। इंसानियत और सेवा भाव को समर्पित इन स्थानों पर सिर्फ धार्मिक या मानसिक शांति ही नहीं बल्कि यहां चलने वाले लंगरों से लोगों के पेट की भूख भी शांत होती है। रीति रिवाज, पारंपरिक स्थल और सिक्ख धर्म के संस्थापक और सिख गुरूओं की याद दिलाते इन गुरूद्वारों की मौजूदगी भारत को और भी ज्यादा खास बनाती है। कौन है भारत के 10 प्रमुख गुरूद्वारे, आइए विस्तार से जानते है।

1. स्वर्ण मंदिर, अमृतसर, पंजाब

हरमिंदर साहिब के नाम से भी मशहूर यह गुरूद्वारा अमृतसर शहर की पहचान है जहां हर साल लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। सिख समाज के सबसे प्रतिष्ठित गुरूद्वारों में से एक यह बेहद परम पावन और प्रसिद्ध गुरूद्वारा है, जहां विशाल क्षेत्रफल पर फैला भव्य पवित्र कुंड- अमृत सरोवर, विस्तृत सामुदायिक रसोई घर यानी लंगर हॉल और मुख्य अकाल तख्त- सिंहासन और भी कई सरंचनाएं शामिल हैं। यहां बनी इमारत के लिए जमीन का चुनाव सिख पंरपरा के तीसरे गुरू अमरदास ने किया था, जिन्होंने अपने शिष्य गुरू रामदास को कृत्रिम रूप से निर्मित तालाब के चारों ओर एक नया शहर बसाने को जमीन खोज कर लाने का आदेश दिया था। अमृत सरोवर की स्थापना गुरू रामदास ने की और इस गुरूद्वारे का निर्माण 1581 में गुरू अर्जन देव के मार्गदर्शन पर शुरू हुआ, जिसका पहला संस्करण पूरा होने में तकरीबन 8 सालों का समय लगा था। सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ की स्थापना गुरू अर्जन देव ने और अकाल तख्त की स्थापना सिखों के छठे गुरू, गुरू हरगोविंद ने की थी। गुरू अर्जन देव को मुगलो द्वारा गिरफ्तार कर लिए जाने के बाद यह मुगलों के हाथों मे चला गया था जिसे गुरू हरगोविंद ने मुक्त कराया था। इनकी मृत्यु के बाद इस गुरूद्वारे को हानि पहुंचाई गई जिसे महाराजा रणजीत सिंह ने दोबारा बनवाया और इस पर सोने की परत लगवाई, तब से यह स्वर्ण मंदिर नाम से जाना जाने लगा। 

स्वर्ण मंदिर का ऊपरी भाग शुद्ध सोने से बना है जहां आतंरिक दीवारों के साथ दरवाजों पर भी स्वर्ण का काम हुआ है। भारतीय और मुगल स्थापत्य शैली का सम्मिश्रण हरमिंदर साहिब में आप गुरू ग्रंथ साहिब से आशीर्वाद लें, गुरबाणी कीर्तन का आनंद लें, यहा होने वाले अनुष्ठानों में हिस्सा लेते हुए हुकूमनामा पढें व सुने। लंगर चखें और स्वयं सेवा सहायता समूह में श्रम सेवा प्रदान कर सकते हैं। 

प्रमुख आकर्षणः दर्शन ड्योढी जो गर्भग्रह की तरफ जाने वाला प्रवेश द्वार है, संगमरमर के बने पत्थरों पर शानदार भित्ति चित्रों और कलाकृतियों को देखें। अकाल तख्त शानदार इमारत जो हरमिंदर साहिब की ओर जाने वाले रास्ते के ठीक सामने हैं, यहां रात में गुरू ग्रंथ साहिब को रखा जाता है और सिख योद्धाओ द्वारा प्रयोग किए गए प्राचीन हथियारों का दर्शन करें। रामगढिया बुंगा, तोशाखाना, हर की पौड़ी, सिख संग्रहालय और संदर्भ पुस्तकालय और दुख भंजनी बेरी वृक्ष का अवलोकन करें। 

दर्शन समयः सामान्य दर्शन 24 घंटे उपलब्ध रहते हैं। 

कैसे पहुंचेः 

हवाई मार्ग सेः अमृतसर हवाई अड्डे से गोल्डन टेंपल की दूरी लगभग 13 किमी है, जहां से आप बस, ऑटो रिक्शा की मदद से आसानी से यहां पहुंच सकते हैं। 

रेल मार्ग सेः अमृतसर रेलवे स्टेशन से स्वर्ण मंदिर की दूरी लगभग 2 किमी है, जहां से आप ऑटो रिक्शा या साइकिल रिक्शे से गुरूद्वारे पहुंच सकते हैं। 

सड़क मार्ग सेः सभी शहरों से अमृतसर की सड़क कनेक्टिविटी बेहतर है जहां आप अपनी कार या सार्वजनिक वाहन से यहां आ सकते हैं। 

2. श्री हेमकुंड साहिब, चमोली, उत्तराखंड 

उत्तराखंड के चमोली में स्थित यह गुरूद्वारा बर्फीली झील के किनारे पर सात पहाड़ियों के बीच स्थित है, इसका जिक्र गुरू गोबिंद सिहं द्वारा लिखे गए दसम ग्रंथ में आता है। हिमालय की तकरीबन 4632 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद इस तीर्थस्थल तक गोविंदघाट से केवल पैदल चढाई करके ही जाया जा सकता है। गुरू गोबिंद सिंह जी को समर्पित यह गुरूद्वारा सिखों द्वारा अत्यंत पूजनीय और महत्वपूर्ण स्थल है, जिसके बारें में गुरू गोविंद सिंह ने दसम ग्रंथ में स्वयं अपने जन्म के बारे में लिखा है कि हेमकुंड झील के पास जब उन्होनें ध्यान और तप से भगवान को याद किया तब भगवान ने ही उन्हें धरती पर जन्म लेने का आदेश दिया जिससे वे धर्म और आस्था की गहराईयों को लोगों तक पहुंचा सके। इस स्थान की खोज सिखों द्वारा की गई थी जब वे अपने गुरू के तपस्थल को ढूंढने निकले थे। सन् 1960 में बना यह स्थान पत्थर और चिनाई के साथ शानदार तारे की आकृति जैसा है। हेमकुंड साहिब की यात्रा पूरे वर्ष नहीं की जा सकती क्योंकि शीतकाल में यहा के कपाट बंद कर दिये जाते हैं। हेमकुंड साहिब के बारे में बताया जाता है कि पहले समय में यहां एक मंदिर होता था जिसे भगवान श्री राम और श्री लक्ष्मण ने मिलकर तैयार किया था। कहते हैं इसके बाद गुरू गोविंद सिंह ने यहां कई सालों तक पूजा अर्चना ध्यान साधना की। इसकी खोज 1930 में हुई थी। 

प्रमुख आकर्षण : कहते हैं कि सात पहाड़ियों पर निशांत साहब झूलते हैं, पुष्पावती पहाड़ियों की तलहटी में मौजूद हेमकुंड साहिब अपने शानदार प्राकृतिक सौंदर्यता और मनमोहक स्थान के लिए श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। हेमकुंड साहिब के पास ही भगवान श्री राम और श्री लक्ष्मण जी के मंदिर हैं और यहीं से तकरीबन 3 किमी दूरी पर यूनेस्को वैश्विक धरोहर फूलों की घाटी को निहार सकते हैं। 

दर्शन समयः हेमकुंड साहिब के दर्शनों के लिए मई से अक्टूबर के दौरान पहुंच सकते हैं, जब उत्तराखंड की चार धाम यात्रा शुरू होती है। 

प्रातःकालीन समयः सुबह 5 बजे से दोपहर 1 बजे तक

संध्याकालीन समयः दोपहर 2 बजे से रात 9 बजे तक 

कैसे पहुंचेः

हेमकुंड पहुंचने के लिए ऋषिकेश से लगभग 273 किमी की दूरी को सड़क मार्ग से तय करते हुए गोविंदघाट पहुंचे और यहां से करीब 19 किमी की दूरी को पैदल तय कर इस गुरूद्वारे के दर्शनों के लिए पहुच सकते हैं। 

हवाई मार्ग सेः ऋषिकेश तक हवाई रास्ते से पहुंचने के लिए देहरादून जॉली ग्रांट एयरपोर्ट नजदीक है जहां दूरी 300 किमी है, जिसे बस या टैक्सी से तय कर सकते हैं। 

रेल मार्ग सेः नजदीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश हैं। 

सड़क मार्ग सेः आप चाहें तो पूरी यात्रा बस या स्वयं की कार से करते हुए भी ऋषिकेश, गोविंदघाट के रास्ते हेमकुंड साहिब पहुंच सकते हैं। 

3. श्री मणिकरण साहिब, कसोल, हिमाचल प्रदेश 

हिमाचल प्रदेश में मनाली कुल्लू के निकट प्रसिद्ध सिख तीर्थस्थलों में से एक यह स्थान प्राकृतिक और आध्यात्मिक खूबसूरती का अद्भुत मेल प्रस्तुत करता है। मान्यता है कि गुरूद्वारा मणिकरण साहिब सिख धर्म के प्रवर्तक गुरूनानक देव जी की तपस्थली है जहां उन्होंने एकांतिक साधना की थी। इस गुरूद्वारे की इतनी अधिक लोकप्रियता है कि कहा जाता है कि यहां दर्शन कर लेने के बाद भारत के अन्य धार्मिक स्थानों में जाने की भी कोई जरूरत नहीं रहती। मणिकरण न सिर्फ सिखों के लिए बल्कि हिंदू धर्म के लिए भी विशेष है, क्योंकि किंवदंती है कि भगवान शिव देवी पार्वती के खोए हुए रत्नों की खोज कर रहे थे, तब शेषनाग ने भगवान शिव के क्रोध से बचने के लिए प्रस्फुटन सहित तीन गर्म झरनों के साथ उन रत्नों को सौंपा था। मणिकरण और भी कई सारे पौराणिक तथ्यों और ऐतिहासिक कारणों की वजह से बेहद प्रसिद्ध है। 

प्रमुख आकर्षणः ऐसा माना जाता है कि सृष्टि के जलमग्न होने के बाद मनु ने इसी स्थान से मानव जीवन की पुनः निर्माण की शुरूआत की थी। गर्म पानी के झरने जिनमें उपचारात्मक गुण पाए जाते हैं, यहां स्नान ध्यान कर सकते हैं। यहां और भी कई प्रसिद्ध मंदिर जहां भगवान श्रीराम, प्रभु श्रीकृष्ण और भगवान विष्णु व अन्य देवी देवताओं के मंदिरों में दर्शन लाभ ले सकते है। आकर्षक प्राकृतिक खूबसूरती और झरनों का तप्त जल आगुंतको के बीच प्रमुखतः लोकप्रिय है। मणिकरण से आसपास की जगहो में आप कसोल, तोश और मनाली को एक्सप्लोर कर सकते हैं। 

दर्शन समयः

प्रातःकालीनः सुबह 5 बजे से दोपहर 12 बजे तक

सायंकालीनः शाम 4 बजे से रात 9 बजे तक 

कैसे पहुंचेः 

हवाई मार्ग सेः भुंतर हवाई अड्डे से लगभग 50 किमी दूरी को तय कर आप मणिकरण गुरूद्वारे पहुंच सकते हैं। 

रेल मार्ग सेः नजदीकी रेलवे स्टेशन जोगिंदर नगर है जहां से आप लगभग 125 किमी की दूरी तय कर मणिकरण पहुंच सकते हैं। 

सड़क मार्ग सेः मणिकरण दिल्ली से लगभग 500 किमी, चंडीगढ से 270 किमी करीब और मनाली से लगभग 80 किमी दूरी पर है। यहां से आप आसानी के साथ सड़क रास्ते से मणिकरण के लिए बस या टैक्सियों की मदद ले सकते हैं। 

4. श्री बंगला साहिब, नई दिल्ली

श्री बंगला साहिब सिखों के गुरू हरकिशन जी को समर्पित है जो मात्र पांच साल की आयु में अपनी आध्यात्मिक शक्तियो और निष्ठा के चलते सिखों के गुरू पद पर सुशोभित हुए। कीरतपुर साहिब में जन्में गुरू हरकिशन आमेर के मिर्जा राजा जय सिंह के अनुनय विनय पर दिल्ली पधारे थे, जहां उन्होनें दिल्ली की जनता को भयंकर चेचक महामारी से निजात दिलाया और स्वयं मात्र आठ साल की अवस्था में ही यह शरीर छोड़ दिया और शरीर छोड़ते समय सिखों के अगले गुरू का नाम बाबा बकाला से भी बताया था। 

दिल्ली में गुरू हरकिशन जी इसी स्थान पर रहते थे जो आमेर के राजा जयसिंह का निजी महल हुआ करता था। इस स्थान पर आज भी दिव्य कुंड है जिसके बारें में कहा जाता है कि यह बहुत चमत्कारी है, किसी बीमारी या रोग के चलते इस जल का सेवन करने से बीमारी या रोग से मुक्ति मिलती है। 

प्रमुख आकर्षणः लंगर सेवा दिन रात चलती रहती है जहां आप भोजन कर सकते हैं, प्रार्थना स्थल में बैठकर ध्यान सकत। गुरूद्वारे से इंडिया गेट, लालकिला, जंतर मंतर पास ही हैं, पर्यटन आनंद ले सकते हैं। जनपथ मार्केट में खरीदारी कर सकते हैं। 

दर्शन समयः 24 घंटे खुला रहता है। 

कैसे पहुंचेः

हवाई मार्ग सेः नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट से वाया मेट्रो, बस या टैक्सी की मदद से गुरूद्वारा बंगला साहिब पहुंच सकते हैं। नजदीकी मेट्रो स्टेशन पटेल चौक है। 

रेल मार्ग सेः नजदीकी मेट्रो स्टेशन पटेल चौक है जहां पटेल चौक से गुरूद्वारे की दूरी लगभग 2 किमी है। आप चाहें तो यहां से पैदल या ऑटो रिक्शा से पहुंच सकते हैं। रविवार के दिन पटेल चौक मेट्रो स्टेशन से गुरूद्वारा बंगला साहिब के लिए निःशुल्क ऑटो सुविधा प्रदान की जाती है, जो एक तरह से सिख समुदाय के लोगो द्वारा की गई सेवा है। 

सड़क मार्ग सेः आप चाहें तो नई दिल्ली स्थित इस गुरूद्धारे पर ऑटो, बस या अपनी व्यक्तिगत गाड़ी से आराम से पहुंच सकते हैं। गुरूद्वारे के भूतल में पार्किंग सुविधा उपलब्ध है। 

5. तख्त श्री पटना साहिब, पटना, बिहार 

सिखों के पांच तख्तों में से एक यह स्थान सिखो के दसवें और अंतिम गुरू, गुरू गोविंद सिंह के जन्म स्थान के रूप में जाना जाता है। 22 दिसम्बर 1666 को इनका जन्म मुगल साम्राज्य में इसी स्थान पर हुआ था, इनके जीवन के शुरूआती वर्ष में यहीं रहते थे। इसके अलावा पटना को गुरूनानक देव और गुरू तेग बहादुर के आगमन की वजह से भी जाना जाता है। 19वीं शताब्दी महाराजा रणजीत सिंह द्वारा इस गुरूद्वारे का निर्माण कराया गया था, जिसे सन् 1934 में नुकसान होने की वजह से पुनः इसे 1948 से 1957 के बीच बनवाया गया था। तख्त श्री हरमिंदर जी पटना साहिब दूसरा सबसे परम पावन स्थान माना जाता है, जहां तीन सिख गुरूओं के आगमन से और भी ज्यादा खास माना जाता है। 

प्रमुख आकर्षणः स्वर्ण गुबंद और जटिल नक्काशी से सुसज्जित स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना यह स्थान बेहद लोकप्रिय स्थान है जहां विश्वभर से लोग दर्शन और आशीर्वाद के लिए आते हैं। संगमरमर की भव्य चमक और दिन की प्राकृतिक रोशनी में जगमगाता यह गुरूद्वारा, संग्रहालय, आवासीय कक्ष और रसोई घर यानी लंगर के लिए भी मशहूर हैं। नालंदा खंडहरों और बौद्ध धर्म के अन्य स्थानों को एक्सप्लोर कर सकते हैं। 

दर्शन समयः सुबह 4 बजे से रात 10 बजे तक 

कैसे पहुंचेः

हवाई मार्ग सेः नजदीकी हवाई अड्डा जय प्रकाश नारायण इंटरनेशनल एयरपोर्ट है जो यहां से करीब 15 किमी की दूरी पर है। यहां से टैक्सी व ऑटो आसानी से मिल जाते हैं। 

रेल मार्ग सेः निकटतम रेलवे स्टेशन पटना जंक्शन है जो करीब 1.5 किमी ही दूरी पर है। पटना, बिहार की राजधानी है इसलिए सभी प्रमुख रेल यहां रूकती हैं। 

सड़क मार्ग सेः भारत के किसी भी प्रमुख शहर से आप पटना तक सड़क माध्यम से आसानी से पहुंच सकते हैं और पटना के सभी भागों से गुरूद्वारे तक ऑटो रिक्शा या कैब आसानी से मिल जाती हैं। 

6. श्री दुख निवारण साहिब, पटियाला, पंजाब 

पटियाला स्थित यह गुरूद्वारा सिख धर्म के नौंवे गुरू श्री तेग बहादुर जी को समर्पित है, जो श्री आनंदपुर साहिब से सैफबाद यानी बहादुरगढ शहादत के लिए जाते समय यहां के नवाब सैफ खान की विनती पर इस स्थान पर तीन महीने के लिए रूके और श्रद्धालुओं को कृतार्थ किया। गुरू तेग बहादुर की चरण रज से पवित्र हुई यह धरती आज इन्हीं के नाम पर बहादुरगढ नाम से जानी जाती है। श्री गुरू तेग बहादुर साहिब जी के इस स्थान से जुड़ी कहानी सुनने को मिलती है कि यह जगह पटियाला के बसने से भी पहले यहां थी, जो एक झियूर सिख भग राम के अनुरोध पर लेहल गांव के जलकुंड के किनारे बैठ गए, उस समय यहां बच्चों को कुपोषण की बीमारी भी थी। गुरू तेग बहादुर ने कहा कि जो भी इस कुंड में स्नान करेगा उसकी बीमारी दूर हो जाएगी और बसंत पंचमी के दिन यहां स्नान करने से सभी तीर्थों का फल प्राप्त हो जाएगा। यहां गुरू तेगबहादुर द्वारा लिखा हुकूमनामा मौजूद है। इस स्थान को दुख निवारण नाम स्वयं गुरू तेग बहादुर ने ही दिया था। 

प्रमुख आकर्षणः अमृत सरोवर में स्नान कर सकते हैं जो 12-12 फीट ऊंची भव्य दीवारों के बन जाने की वजह से शानदार और आकर्षक किलेनुमा स्नानघर बन गया जहां चौड़े बरामदे में श्रद्धालु कथा कीर्तन का आनंद ले सकते हैं। ड्योढी, तीन मंजिला इमारत के अलावा सिख संगत के आवास का दीदार कर सकते हैं। 

दर्शन समयः 24 घंटे खुला रहता है। 

कैसे पहुंचेः 

हवाई मार्ग सेः चण्डीगढ एयरपोर्ट पटियाला से करीब है जहां आप बस या टैक्सी की मदद से पहुंच सकते हैं। 

रेल मार्ग सेः नजदीकी रेलवे स्टेशन पटियाला है जहां से आप स्थानीय वाहनों के माध्यम से गुरूद्वारे पहुंच सकते हैं। 

सड़क मार्ग सेः पंजाब के पटियाला शहर की कनेक्टिविटी भारत के प्रमुख शहरों से बेहतर है, जहां आप सड़क मार्ग से बस या निजी वाहन के माध्यम से आसानी से पहुंच सकते हैं। 

7. तखत सचखंड श्री हुजूर अचलनगर साहिब गुरूद्वारा, नांदेड़, महाराष्ट्र

श्री हुजूर साहिब नाम से मशहूर यह गुरूद्वारा सिख समुदाय के पांच प्रमुख तीर्थस्थलों में एक माना जाता है। इस गुरूद्वारे को स्वयं गुरू गोविंद सिंह द्वारा सन् 1708 में स्थापित किया गया था, इसी स्थान पर गुरू गोविंद सिंह ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष बिताए और आखिरी सांस ली। गुरू गोविंद सिंह एक कठिन यात्रा करने के बाद यहां पहुंचे थे और यहां से उन्होंने मुगल सम्राट औरंगजेब को विजय पत्र यानी जफरनामा लिखा था। लगभग 12 एकड़ क्षेत्रफल पर फैला यह गुरूद्वारा सिखों की विशिष्ट वास्तुकला शैली से बनी शानदार संरचना है, इसके प्रवेश द्वार को बुलंद दरवाजा कहते हैं, जिसकी सजावट और जटिल नक्काशी आकर्षित करती है। यहां उपस्थित सरोवर में श्रद्धालु स्नान कर गुरू ग्रंथ साहिब के दर्शन आदि करते हैं। यहां गुरू गोविंद सिंह से जुड़ी वस्तुओं का एक प्रमुख संग्रहालय भी है जहां उनके निजी सामान, हथियार और वस्त्रों को देख सकते हैं। यहां होने वाले लंगर में किसी भी जाति धर्म का व्यक्ति भोजन कर सकता है। 

प्रमुख आकर्षणः यहां से तकरीबन 100 मीटर की दूरी पर सचखंड गुरूद्वारा, 350 मीटर दूरी पर गुरूद्वारा शहीद गंज साहिब, गुरूद्वारा गोबिंद बाग साहिब, गुरूद्वारा भजनगढ साहिब, गुरूद्वारा श्री बंदा घाट साहिब और गुरूद्वारा महा अकाल सिंह जी शहीद गंज साहिब के दर्शन कर सकते हैं। जहां इनकी पहुंच श्री हुजूर गुरूद्वारा से 1 किमी की परिधि सीमा के भीतर ही है। 

दर्शन समयः 24 घंटे खुला रहता है। 

कैसे पहुंचेः 

हवाई मार्ग सेः नांदेड़ में नजदीकी एयरपोर्ट श्री गुरू गोविंद सिंह जी है जो भारत के प्रमुख शहरों से भली भांति जुड़ा हुआ है। एयरपोर्ट से गुरूद्वारे की दूरी लगभग 7 किमी है। 

रेल मार्ग सेः नांदेड़ में नांदेड़ रेलवे स्टेशन और गुरूद्वारे के बीच की दूरी तकरीबन 4 किमी है जिसे आप टैक्सी या बस से आराम से तय कर सकते हैं। सड़क मार्ग सेः नांदेड़ महाराष्ट्र के सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है जहां आप राज्यस्तरीय बसों या निजी साधन से आराम से पहुंच सकते हैं। 

गुरूद्वारे में अपनाने योग्य रीति रिवाज व नियम

  • कुंड और मंदिर के चारों ओर दक्षिणावर्त दिशा में परिक्रमा करें
  • अपने सिर को स्कार्फ से ढकें। 
  • जूते और अन्य सामान को सुरक्षा केंद्र में जमा करा दें। 
  • प्रवेश करने से पहले ही मोबाइल स्विच ऑफ या साइलेंट कर दें। 
  • गुरूद्वारे गर्भग्रह की फोटोग्राफी निषिद्ध रहती है, बाहरी परिसर में कर सकते हैं। 
  • सरोवरों में हाथ पैर धोते या स्नान करते समय साबुन या किसी अन्य तरह की सामग्री इस्तेमाल न करें
  • गुरूद्वारे आने के लिए किसी भी धर्म, जाति और रंग के लोगों के लिए कोई रोक नहीं है। 

गुरूद्वारे में क्या करें 

  • गुरू ग्रंथ साहिब से आशीर्वाद लें 
  • लंगर सेवा में शामिल हों 
  • स्वयं सेवा सहायता में शामिल होकर श्रम दान कर सकते हैं। 

गुरूद्वारे में क्या न करें

  • सरोवर के पानी के साथ छेड़छाड़ न करें। 
  • गर्भग्रह में शोरगुल न करें 
  • लंगर करते समय भोजन की बर्बादी न करें 
  • किसी भी धर्म जाति विशेष कोई नकरात्मक टिप्पणी न करें। 

निष्कर्ष

गुरूद्वारा सिर्फ आध्यात्मिक स्थल ही नहीं वरन् त्याग, साहस, सेवा और बलिदान का शौर्य प्रतीक है, जहां आज भी सामाजिक भेदभाव व रूढिवादी मान्यताओं को दरकिनार करते हुए मानवता को सर्वोपरि स्थान दिया जाता है। सर्व धर्म समभाव की भावना को साकार करते गुरूद्वारों की उपस्थिति सिख गुरूओं और उनकी दिव्यता को समर्पित ऐसा स्थान है जहां सरल व सहज भाव से सकारात्मक ऊर्जा चेतना के रूप में ईश्वर की अनुभूति की जा सकती है। धार्मिक और नैतिक शिक्षा को फलीभूत करते भारतीय गुरूद्वारों की मौजूदगी सिर्फ सिख धर्म ही नहीं वरन् सभी धर्मों के लिए इंसानियत का सर्वश्रेष्ठ प्रमाण है।

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