• Nov 05, 2025

आप सभी ने कभी न कभी दुर्गा चालीसा की इन पंक्तियों को अवश्य सुना होगा- ‘‘हिंगलाज में तुम्हीं भवानी, महिमा अमिट न जात बखानी’’ यानी हिंगलाज में बसने वाली माता आपकी महिमा का गुणगान कभी मिटाया नहीं जा सकता। जी हां, हिंगलाज में बसने वाली मां भवानी का यह स्थान सर्वाधिक शक्तिशाली शक्तिपीठों में एक माना जाता है जो पाकिस्तान के बलूचिस्तान में लासबेला जिले में मकरान तट पर बसे शहर हिंगलाज में है और इसकी गिनती देवी के 51 शक्तिपीठों में होती है। पाकिस्तान के सबसे बड़े हिंदू तीर्थस्थल यात्रा के रूप में प्रसिद्ध हिंगलाज मंदिर के बारें में और भी बहुत कुछ विशेष जानेंगे इस आर्टिकल में

समस्त शक्तिपीठों से जुड़ी पौराणिक कथा

देवी सती के अपने पिता राजा दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ समारोह में अकेले ही बिन बुलाए जाने से और वहां भगवान शिव के प्रति घोर अपमान भरे शब्द सुनने से देवी सती इतना आहत हुईं कि उन्होंने यज्ञ कुंड की वेदी में तपोबल से अपने प्राण त्याग दिये। इस घटना से भगवान शिव अत्यधिक क्रोधित होकर उनका मृत शव अपने कंधांं पर लेकर घूमने लगे। 

भगवान शिव और समस्त संसार के कल्याण के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के मृत शरीर को 51 भागों में विभाजित कर जमीन पर गिरा दिया। जहां भी माता सती के अंग अथवा आभूषण गिरे, उन जगहों पर किसी न किसी विशेष देवी का प्रादुर्भाव हुआ एवं दिव्य 51 शक्तिपीठों की स्थापना हुई। इन शक्तिपीठों की स्थापना भगवान शिव द्वारा संपन्न की गई जहां हर शक्तिपीठ की रक्षा हेतु उनके भैरव अवतार की उपस्थिति देखी जाती है। 

हिंगलाज शक्तिपीठ की उत्पत्ति से जुड़े कारण व ऐतिहासिक कहानी

हिंगलाज शक्तिपीठ को कोट्टारी शक्तिपीठ भी कहते हैं जिसका जिक्र कई धर्म ग्रंथों मेंं पढने को मिलता है। कुलार्णव तंत्र में 18 पीठों का उल्लेख है जिसमें हिंगुल तीसरे रूप में उल्लेखित है। कुब्जिका तंत्र में 42 शाक्त पीठों के वर्णन में हिंगलाज का स्थान पांचवां है। तत्र चूड़ामणि के पीठ निर्णय खंड में हिंगलाज शक्तिपीठ को पहला स्थान प्राप्त है, इसी प्रकार अन्य कई धर्मग्रंथों में हिंगलाज का नाम कई और नामों से भी सुनने और पढने को जरूर मिलता है। 

हिंगलाज शक्तिपीठ में देवी सती के ऊपरी सिर का एक छोटा सा हिस्सा गिरने से इस मंदिर की नींव पड़ी। वहीं बंगाली ग्रंथ चंडीमंगल में बताया गया है हिंगलाज वह अंतिम शक्तिपीठ है जहां मां सती का मस्तक गिरा था। 

एक और कहानी सुनने में आती है कि हिंगलाज शक्तिपीठ में देवी ने राक्षस हिंगोल का वध कर दिया था। हिंगोल भागते हुए इसी गुफा में छिप गया था जहां देवी पीछा करते हुए आईं और उसका अंत कर दिया। यही स्थान हिंगलाज माता के मंदिर के नाम से जाना जाता है। मरने से पहले हिंगोल के अनुरोध पर ही देवी ने अपना नाम इसके नाम पर हिंगलाज कर लिया। 

हिंगलाज शक्तिपीठ की वास्तुकला एवं संस्कृति 

हिंगलाज घाटी को स्वयं हिंगलाज माता माना जाता है इस वजह से यह पूरा स्थान दिव्य और पवित्र तीर्थ माना जाता है जहां देवी का निवास स्थान है। ल्यारी तहसील से दूर स्थित एक संकरी घाटी में हिंगोल नदी के पश्चिमी तट पर, मकरान रेगिस्तानी क्षेत्र, किर्थर पर्वत सीरीज के अंत में स्थित है जो हिंगोल राष्ट्रीय उद्यान के अंतर्गत आने वाला क्षेत्र है। हिंगलाज माता का मंदिर एक प्राकृतिक पहाड़ी गुफा में है जहा मां हिंगलाज की पूजा किसी मूर्ति के रूप में नहीं होती बल्कि पिंडी रूप में अवस्थित मां हिंगलाज की पूजा अर्चना की जाती है, जो बहुत शक्तिशाली स्थान हैं। 

मकरान रेगिस्तान के खेरथार पहाड़ीय श्रृंखला में बना एक छोटा प्राकृतिक गुफा मंदिर है जहां छोटी शिला ही मां हिंगलाज के रूप में पूज्य हैं, इसकी शक्ति, पवित्र वातावरण और नैसर्गिक सुंदरता श्रद्धालुओं के लिए अद्भुत आकर्षण उत्पन्न करती है। 

हिंगलाज मंदिर के पास पूजा आराधना करने के और भी खास स्थान है। जिनमें से गणेश देव, गुरूगोरख नाथ धूनी, ब्रह्म कुंड, तीर कुंड, माता काली, गुरूनानक खराओ, रामझरोखा बेथक, चोरासी पर्वत पर चंद्र कूप, अनिल कुंड, अघोर पूजा और खारिरिवर प्रसिद्ध हैं। 

बाबा चंद्रगुप्तः इस मिट्टी के ज्वालामुखी को भगवान शिव का अवतार कहा जाता है जिसे बाबा कहकर भी बुलाया जाता है। ज्वालामुखी के शीर्ष पर पहुंचकर अपना पूरा नाम और मूल स्थान बताते हैं फिर पूरे समूह के सामने अपने पापों को बताना पड़ता है जहां मिट्टी के बुदबुदाने और हवा की प्रतिक्रिया के हिसाब से छड़ीदार यह बता पाते हैं कि क्या उक्त तीर्थयात्री के पाप माफ कर दिए गए हैं? 

पवित्र तालाब की संख्या सात है जिनका उपयोग यहां आध्यात्मिक चेतना शुद्धि के लिए किया जाता है

शरण कुंडः इसे साल 2011 से कंक्रीट से ढक दिया गया है। 

तिल कुंडः मंदिर के उत्तर पश्चिम में स्थित इस कुंड में काले तिलों में हाथों से रगड़कर तब तक धोया जाता है जब तक वे सफेद न हो जाएं। ऐसा माना जाता है कि यह आत्मा शुद्धि का प्रतीक है। तिल कुंड के जल मे तिल का तेल भी होता है जिससे इसकी उपचारात्मक क्षमता भी बेहतर मानी जाती है। 

ब्रह्म कुंड, कीर कुंड और काली कुंडः ये कुंड घाटी में आगे की ओर स्थित है जो एक ही जलधारा से जुड़े हुए हैं। कीर कुंड की विशेषता है कि एक चट्टान से गिरती पानी की छोटी छोटी बूंदे त्वचा और नेत्र रोगों को सही करती हैं। ब्रह्म कुंड में भगवान ब्रह्मा ने तपस्या की थी यहां डुबकी लगाने की मान्यता है जिससे सारी मनवांछित सफलताएं मिलती हैं। काली कुंड ब्रह्मा कुंड के ऊपर स्थित है जो काली माता से जुड़ा हुआ है। काली कुंड के जल में रोगों से लड़ने की क्षमता प्राप्त होती है। जिसे पीने से आध्यात्मिक चेतना में बढोत्तरी होती है। 

अनिल कुंड या अलील कुंडः इस कुंड का महत्व सबसे अधिक माना जाता है क्योंकि यह तीर्थयात्रा के फलस्वरूप मिलने वाला फल माना जाता है। एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित सिर्फ इस कुंड तक पहुंचने में कम से कम दो घंटे का समय लग जाता है। यहां यात्रा करना दैवीय कृपा और आशीर्वाद प्राप्ति का संकेत माना जाता है। 

हिंगलाज शक्तिपीठ और मुस्लिम श्रद्धालुओं की आस्था 

आश्चर्यजनक बात है कि सिर्फ हिंदू संप्रदाय ही नहीं वरन् मुस्लिम धर्म के लोग भी मां हिंगलाज की शक्तिपीठ को मानते हैं। स्थानीय मुसलमानों द्वारा इसे ‘बीबी नानी पीर’ या ‘नानी का हज’ कहते हैं। सूफी संत शाह अब्दुल लतीफ भिट्टाई ने हिंगलाज माता मंदिर का दर्शन किया था, जिसके बारे में उन्होनें अपनी रचना सूर रामकली में बताया है। कहते हैं कि हिंगलाज माता को भेंट प्रदान करने के लिए इन्होंने कठिन यात्रा की और उनकी शिला पर दूध अर्पित किया, इससे प्रसन्न होकर हिंगलाज माता ने उन्हें साक्षात् दर्शन भी दिए थे। 

हिंगलाज शक्तिपीठ का दर्शन समय 

हिंगलाज मंदिर प्राकृतिक गुफा में बना शक्तिपीठ है जहां जाने के लिए कई मीलों तक रेतीली धरती पर पैदल चलना पड़ता है। पाकिस्तान मे अवस्थित इस शक्तिपीठ की यात्रा आसान नहीं है। 

प्रातःकालीन दर्शन समय : सुबह 5 बजे से दोपहर 1 बजे तक 
सायंकालीन दर्शन समयः दोपहर 3ः30 बजे से रात 9 बजे तक 

हिंगलाज माता आरती समय

प्रातःकालीन आरतीः सुबह 6ः15 मिनट 
सायंकालीन आरतीः शाम 6ः15 मिनट 

हिंगलाज शक्तिपीठ में मनाए जाने वाले उत्सव त्यौहार एवं अनुष्ठान 

हिंगलाज मंदिर में अप्रैल के समय वार्षिक तीर्थयात्रा का आयोजन किया जाता है जिसमें लाखों तीर्थयात्री भाग लेने पहुंचते हैं, इसमें पाकिस्तान, भारत और दुनिया भर से लोग हिस्सा लेते हैं। पाकिस्तान के सिंध, हैदराबाद और कराची से भक्त मंदिर दर्शन के लिए इस यात्रा में शामिल होते हैं।

बस या किसी भी माध्यम से आप मकरान तटीय हाईवे आ सकते हैं जहां से मंदिर पहुंचने के लिए रेगिस्तानी इलाकों, हवाओं की तेजी और कंकरीले पथरीले रास्तों पर चलना पड़ता है।

इस मंदिर की तीर्थयात्रा में मिट्टी के ज्वालामुखी पर और सैकड़ों सीढियों को चढते हैं, उथले गड्ढों में नारियल और गुलाब की पंखुड़ियां फेंककर मां हिंगलाज का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। माता के जयकारों और बोल बम के नारों से गुजाएंमान रेगिस्तानी वातावरण आस्था और विश्वास के साक्षी बनते हैं। 

यहां चंद्रगुप्त और खंडेवारी मिट्टी के ज्वालामुखी हैं जहां भक्त अपनी दर्शन मनोकामनाओं को पूरा करने और धन्यवाद देने के उद्देश्य से नारियलों को ज्वालामुखी के गड्ढों में फेंकते हैं। कुछ लोग गुलाब की पंखुड़ियों को भी फेंकते हैं साथ ही अपने चेहरे व शरीर को मिट्टी से रंगते हैं। इसके बाद हिंगोल नदी में पावन स्नान करने के बाद माता हिंगलाज की पवित्र गुफा के दर्शनों के लिए पहुचते हैं। 

हिगलाज माता की वार्षिक यात्रा चार दिवसीय समारोह होता है, इनमें तीसरे के दिन का समारोह प्रमुख माना जाता है जब पुजारी मां हिंगलाज और अन्य देवताओं से तीर्थयात्रियों द्वारा चढाए गए भोग प्रसाद को स्वीकार करने का अनुरोध करते हैं और उनकी आराधना के लिए मंत्रोच्चार भी करते हैं। 

कराची के नानद पंथी अखाड़े से शुरू होती यात्रा और भी कई हठ योगियों द्वारा संपन्न की जाती है। ग्रहस्थी, योगी हर तरह के धर्म और पंथ को मानने वाले भक्तजन हिंगलाज मां के आशीर्वाद और कृपा पाने के लिए दरबार में पहुंचते हैं। 

हिंगलाज शक्तिपीठ से जुड़े रोचक तथ्य

हिंगलाज शक्तिपीठ से संबंधित कई ऐसे आश्चर्यजनक तथ्य है जो यहां के प्रति आस्था में और ज्यादा बढा देते हैं। इस मंदिर के बारें में कहा जाता है कि जब भगवान राम लंका विजय कर अयोध्या पहुंचे और विजय तिलक कर शासन शुरू किया तब उन्हें किसी ऋषि ने सुझाव दिया कि ब्राह्मण हत्या का दोष दूर करने के लिए आप हिंगलाज शक्तिपीठ की यात्रा करें। 

भगवान राम ने बात मान ली और तमाम सारे सैनिकों, घोड़ों हाथियों को और मां सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी के साथ मां हिंगलाज के दर्शन को जैसे ही हिंगलाज घाटी पहुंचे तो मां हिंगलाज की सेना ने भगवान राम और उनकी सेना को युद्ध के लिए ललकारा। युद्ध समाप्ति पर देवी की सेना ने भगवान राम की सेना को परास्त कर दिया तब भगवान राम ने दूत के माध्यम से देवी से पूछा कि वे तो दर्शन के लिए आ रहे थे तो उनसे युद्ध क्यों? ऐसे में देवी हिंगलाज ने कहा कि वे साधारण मनुष्य की तरह यात्रा संपूर्ण करें। भगवान श्रीराम ने दोबारा पहले पड़ाव जो आज राम बाग कहलाता है से यात्रा आगाज़ किया। 

कुछ रास्ते चलने पर रेगिस्तानी धरती पर मां सीता को प्यास लगी, ऐसे में मां सीता ने अपने हाथ पर मिट्टी रखी जिससे पांच कुओं का निर्माण हुआ जिनसे सभी ने पानी पिया और वे पांच कुएं सीता कुआं कहलाया। 

इस मंदिर की मान्यता है कि मंदिर दर्शन कर लौटने तक ब्रहमचर्य का पालन किया जाता है और यहां तीर्थयात्रा के दौरान कोई भक्त अपने साथी भक्तों या किसी अन्य व्यक्ति को पानी नही दे सकता है। 

हिंगलाज माता को क्षत्रिय वर्ग की कुलदेवी भी माना जाता है। भगवान परशुराम के डर से क्षत्रिय वर्ग शरण लेने हिंगलाज माता की शरण में पहुंचा, तब मां ने दया भाव में अपनाया और रक्षा का आश्वासन देकर उसे निभाया। तभी से हिंगलाज माता कई वर्गों की कुलदेवी कहलाईं। 

हिंगलाज शक्तिपीठ के आसपास या पाकिस्तान मे पर्यटन स्थल 

शारदा पीठः पीओके कश्मीर की नीलम घाटी में स्थित यह शक्तिपीठ देवी दुर्गा का प्रतिष्ठित स्थल है। जहां हिंगलाज माता के दर्शनों के बाद इस पीठ की तीर्थयात्रा कर सकते हैं। मान्यता है कि यहां देवी सती का दाहिना हाथ गिरा था। 

हुंजा घाटीः हिमालय और कराकोरम रेंज के बीच बसा हुआ यह स्थान अपनी शानदार खूबसूरती के लिए जाना जाता है जहां पर्यटन की दृष्टि से बहार रहती है। 

अट्टाबाद झीलः बलूचिस्तान में मौजूद यह खूबसूरत झील साल 2010 के भूस्खलन के दौरान बनी हुई फेवरेट पिकनिक स्पॉट के रूप में जाना जाता है।

स्वात घाटीः खैबर पख्तूनवा में स्थित यह घाटी स्थानीय स्विट्जरलैण्ड के नाम से जानी जाती है जहां हरी भरी घाटियां, नदियों के आकर्षण और ऐतिहासिक स्थलों के शानदार नजारों की श्रृंखला है। 

हिंगलाज शक्तिपीठ कैसे पहुंचे 

हवाई मार्ग से 

नजदीकी इंटरनेशनल एयरपोर्ट कराची है जो मंदिर से लगभग 245 किमी है। 

सड़क मार्ग से 

हिंगलाज शक्तिपीठ तक स्थानीय और निजी परिवहन लेकर यहां दर्शन करने पहुंच सकते हैं। 

निष्कर्ष 

हिंगलाज शक्तिपीठ आध्यात्मिक आस्था संस्कृति और दिव्य पृष्ठभूमि लिए श्रद्धालुओं को आकर्षित करता हुआ संसार की समस्त ऊर्जाओं का साकार स्वरूप है। इसकी पौराणिक कथाएं और ऐतिहासिक किंवदंतियां इसके बारें में और भी ज्यादा रोचकता को बढावा देती हैं। आप पर्यटन प्रेमी हों या तीर्थयात्रा के नए आयामों को देखने के शौकीन, हिंगलाज माता के अलौकिक दर्शनों की छटा और अद्वितीय क्षमताएं इसे सिर्फ यात्रा नहीं बल्कि एक दिव्य अनुभवीय सफर में साकार करती हैं।

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