• Nov 05, 2025

पश्चिम बंगाल के कनखलिताला कस्बे में अवस्थित बेहद अनोखा शक्तिपीठ जो देवी सती के 51 शक्तिपीठों में से एक महत्वपूर्ण है जो नवरत्न या नौ रत्न मंदिर, रक्त टोला या रक्त मंदिर, कंकाल बाड़ी या कंकाल के घर से भी जाना जाता है। इनके हर नाम के पीछे कोई न कोई पौराणिक कहानी या मान्यता जरूर है। कंकलेश्वरी मंदिर अपने अद्वितीय नामों की वजह से आकर्षण का केंद्र है, साथ ही अपनी नौ चोटियों के कारण भी यह मंदिर खासा प्रसिद्ध है। कंकालेश्वरी मंदिर बीरभूम जिले के बोलपुर उपखंड का एक तीर्थस्थान है। विभिन्न नामों से मशहूर इस मंदिर के बारें में विस्तार से जानते हैं।

समस्त शक्तिपीठों का पौराणिक इतिहास

देवी सती और भगवान शिव से जुड़ी शक्तिपीठों की कहानी एक दुखद घटना का अंत है। जब देवी सती के पिता राजा दक्ष ने भगवान शिव को नापसंद करने के कारण अपने यहां यज्ञ समारोह का न्यौता नहीं भेजा और इसके अलावा उन्होंने सारे देवी देवताओं को आमंत्रित किया। इस बात को जानकर देवी सती से नहीं रहा गया और वे बिन बुलाए ही कारण जानने के उद्देश्य से अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ समारोह में चली गईं, वहां इन्हें भगवान शिव के प्रति कठोर शब्दों को सुनना पड़ा, जो इनके लिए असहनीय बात थी, आहत होकर देवी सती ने उसी यज्ञ कुंड की वेदी में कूदकर अपने प्राणों को त्याग कर दिया।

इन सब के बारें में जब भगवान शिव को ज्ञात हुआ तो उनके क्रोध की सीमा न रही और उन्होंने देवी सती का शव लेकर व्याकुल मन से समस्त संसार में भ्रमण शुरू कर दिया। इस घटना से समस्त संसार में हाहाकार की स्थिति उत्पन्न हो गई। इससे निजात दिलाने के उद्देश्य से भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के मृत शरीर के 51 टुकड़े कर धरती पर गिरा दिए। जहां भी देवी सती के अंग या आभूषण गिरे वहां शक्तिपीठों की दिव्य स्थापना हुई और वहां किसी विशेष देवी का उद्भव हुआ। भगवान शिव के अवतार भैरव की शक्तिपीठों में स्थापना है जो इनकी रक्षा हेतु हर शक्तिपीठ में अलग अलग नामों से विराजमान हैं।

कंकालेश्वरी शक्तिपीठ की उत्पत्ति व इससे जुड़ी कहानी

देवी सती के मृत शव को लेकर जब भगवान शिव हर जगह भ्रमण कर रहे थे, उसी समय जब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से जब उनके शरीर के अंगो को विभाजित कर गिराना शुरू किया तब पश्चिम बंगाल के इस स्थान पर देवी सती का श्रोणि भाग यानी कमर की हड्डियां गिरी थीं, जिनके बारें में कहा जाता है कि वे इतनी तीव्रता से गिरी थीं कि वे धरती को चीरती हुई नीचे गईं और इसी स्थान पर एक कुंड का निर्माण हो गया। मूल रूप से यही कुंड ही इस शक्तिपीठ का मुख्य स्थान है जहां देवी सती की कमर की अस्थियां आज भी कुंड के गर्त में मानी जाती हैं।

कंकालेश्वरी शक्तिपीठ की वास्तुकला एवं संस्कृति

बंगाली संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता यह शक्तिपीठ प्रवेश द्वार पर एक बड़ा गेट है जहां इसके दाहिनी ओर एक किसान या मजदूर को दिखाती जोड़ी भक्तों की प्रतीक्षा करती हुई प्रतीत होती है। मंदिर में प्रवेश करते ही मोड़दार गलियो को पार करते ही मंदिर के अंदर एक खुला हुआ विशाल प्रांगण भी दिखाई देता है। यह मंदिर नवरत्न शैली में बना हुआ है जिसके दो मुख्य स्तर हैं, जिसमें हर एक में चार शिखर वाले कोने वाले मंडप और ऊपरी भाग में नौ शिखरों वाला एक केंद्रीय मंडप है, इसकी भव्यता बेहद आकर्षक लुक देती है। 

18वीं शताब्दी के दौरान इसे बंगाल की पंचरत्न शैली की पहचान की तरह माना गया था, जिसमें पांच मंडप थे, जिसमें चार कोने पर और एक शीर्ष भाग पर। मंदिर के टेराकोटा पैनल जो मंदिर के अग्रभाग से वर्गाकार प्रांगण में स्थित हैं, जिसमें तीन आसन्न कक्ष है जो किसी समय में ऋषियों, राजाओं, भिक्षुकों और परिवार के सदस्यों को प्रदर्शित करते रहे हैं। 

मंदिर के गर्भग्रह में कंकालेश्वरी देवी की मूर्ति स्थापित हैं जिसके लिए कई किंवदंतियां प्रचलित हैं, कुछ लोगों को मानना है कि यहां देवी की कोई मूर्ति नहीं है बल्कि बड़े फ्रेम में एक तस्वीर है। यहां मौजूद प्रतिमा काले बेसाल्ट पत्थर पर बहुमूल्य पत्थरो से बनी है। कंकालेश्वरी प्रतिमा देखने में बिल्कुल मानव कंकाल जैसी प्रतीत होती है जिसमें हडि््डयां, मांसपेशिया, शिराएं व धमनियां साफतौर पर दिखाई देती हैं। अन्य मंदिर में शिवलिंग और त्रिशूल स्थापित है।

यहां मौजूद कंकालेश्वरी प्रतिमा को कुछ लोग पूर्व आर्य काल की ‘‘यक्षिणी’’ भी मानते हैं जिसकी खोज 17वीं शताब्दी में मानी जाती हैं। कहते हैं इसका निर्माण पंचकोट राजा ने करवाया था। ऐसी मान्यता है कि प्राचीन काल में इस मंदिर में मानव बलि दी जाती थी। पुरातत्वेत्ताओं की बात करें तो यह प्रतिमा बुद्ध, जैन या पाल युगों में से हैं जिस पर बौद्ध तंत्र का प्रभाव बताया जाता है। प्रतिमा की सटीक तिथि ज्ञात नहीं है लेकिन इसकी प्राचीनता लगभग 2000 साल पुरानी बताई जाती है। 

कंकालेश्वरी मंदिर दर्शन समय

  • मंदिर खुलने का समयः सुबह 6 बजे मंगला आरती से दर्शन कार्यक्रम शुरू हो जाता है।
  • मंदिर बंद होने का समयः रात 8 बजे संध्या आरती के बाद मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं।

कंकालेश्वरी मंदिर में मनाए जाने वाले उत्सव अनुष्ठान एवं त्यौहार

नवरात्रि पर्वः चैत्र माह में आने वाला नवरात्रि त्यौहार देवी दुर्गा को समर्पित है जिसमें नौ दिनों के समय में विभिन्न तरह के विशाल भव्य अनुष्ठानों के साथ मेलों का आयोजन होता है जहां विभिन्न तरह का अनुभव मिलता है। इस दौरान पूजा पाठ ध्यान साधना और रात्रि जागरण जैसे उत्सवों का आयोजन मंत्रमुग्ध करता है।

दुर्गा पूजाः आश्विन मास में आने वाली शारदीय नवरात्रि की पंचमी तिथि से लेकरह नवमी तिथि तक दुर्गा पूजा का भव्य और उमंग उल्लसित अनुष्ठान किया जाता है। वैसे भी पूरे पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा का विशेष महत्व है जब हर एक कोने में देवी मां की साधना भक्ति और पारंपरिक गीतों की गूंज सुनाई देती है। ऐसे में इस मंदिर में भी यह पर्व पूर हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

दीवालीः पश्चिम बंगाल में दीवाली पर्व पर मां काली की विशेष पूजा साधना की जाती है जो पूरी रात चलती है। दीवाली की रात यहां विशेष मानी जाती है। इसीलिए मां कंकलेश्वरी में दीवाली की रात भक्त पूजा अर्चना और दीपों की कतारें प्रज्वलित करते हैं।

महाशिवरात्रिः भगवान शिव को समर्पित यह त्यौहार इस मंदिर में पूरी तन्मयता के साथ मनाया जाता है। इस दौरान यहां भव्य अनुष्ठानों और मेले का आयोजन किया जाता है। इसके अलावा पूरे दिन मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है।

कंकालेश्वरी मंदिर से जुड़े रोचक रहस्य

यहां अवस्थित मूर्ति के बारें में किवंदती है कि यहां प्राचीन काल में मानव बलि देने की परंपरता रही है इसी कारण इस मंदिर को रक्त मंदिर या रक्त टोला कहा जाता है। और इस मंदिर की वास्तुकला के कारण यह नौ रत्न मंदिर कहा जाता है। 

कहते हैं कि इस मंदिर में देवी की पूजा पिंड रूप में की जाती है जो देवी का प्रतीकस्वरूप है। 

यहां स्थित कुंड के बारें में बताया जाता है कि यहां देवी सती के कमर का हिस्सा गिरा जिससे धरती में एक गड्ढा बना, कालांतर में यहां पानी भर गया, जिसने एक कुंड का रूप ले लिया। ऐसा माना जाता है कि सती का वास्तविक हिस्सा इसी कुंड के नीचे है। ऐसे देखा जाए तो यही कुंड ही असली शक्तिपीठ स्थान है। 

यहां मौजूद कंकालेश्वरी मां को देवगर्भा और भैरव देवता को रुरु कहा जाता है। 

इस मंदिर में पवित्र कुंड के साथ ही पास एक छोटी सी नदी भी बहती है, जिससे यहां की प्राकृतिक खूबसूरती में चार चांद लग जाते हैं। 

कंकालेश्वरी मंदिर के आसपास घूमने योग्य स्थान

तारापीठः पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के रामपुरहाट में स्थित यह मंदिर प्रसिद्ध हिंदू तीर्थस्थल है। यह पीठ अपनी तांत्रिक विशेंषताओं के लिए जाना जाता है। यहां के मुख्य पुजारी तांत्रिक संत बामाखोपा रहे हैं जो मंदिर में भी पूजा करते और श्मशान घाट में भी निवास करते थे। इनका आश्रम द्वारका नदी के तट पर मंदिर के पास ही स्थित है। देवी दुर्गा की दस महाविद्याओं में से एक मां तारा अपने भक्तों का कल्याण करती हैं। साहपुर ग्राम पंचायत का यह हिस्सा है जहां बंगाली संस्कृति की विशिष्टताएं देखने को मिलती है जहां हरे भरे धान के खेतों के साथ फूस की छत वाली झोपड़ियां और मछलीघर दिखाई पड़ते हैं। यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन तारापीठ रोड और रामपुरहाट है। 

खोई गार्डनः पश्चिम बंगाल की फूलों की वादियों की बात करे तो इस गार्डन का नाम सबसे पहले आता है जिसकी तुलना उत्तराखंड की फूलों की घाटी से की जाती है। प्रसिद्ध और सुंदर सा पर्यटन स्थल जहां रंग बिरंगे फूलों के शानदार दृश्य आकर्षित करते हैं। ग्रामीण परिवेश की शानदार झलक पेश करता यह स्थान अपनी सादगी और संपन्नता के लिए पर्यटकों को और भी ज्यादा आकर्षित करता है। 

अमार कुटीरः शांतिनिकेतन से लगभग 15 किमी दूर कोपई नदी की सुरम्यता के किनारे बसा यह स्थान अमार कुटीर है जो बंगाली शब्द है और इसका हिंदी अर्थ होता है मेरी कुटिया। कला और शिल्प को बढावा देने वाली यह संस्था आजादी के दीवानों के लिए एक शरण स्थली के रूप में कार्य करती थी। इस कुटिया की नींव रखी थी सुषेण मुखर्जी ने जिनकी पहली बार मुलाकात शांतिनिकेतन आश्रम में महात्मा गांधी जी से हुई थी और वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित थे।

सोनाजुरीर सानिबारेर हाटः सोनाझुरी हाट संस्कृति और रचनात्मकता के लिए जाना जाता है जहां प्रकृति और कला का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। उमंग उल्लास और उत्साह से परिपूर्ण यह क्षेत्र शनिवार के दिन साप्ताहिक रूप से लगता हे जिसकी मौजूदगी यहां के साल और पियाल के पेडों से और भी ज्यादा भव्य लगती है।

कैसे पहुंचे कंकालेश्वरी शक्तिपीठ

हवाई मार्ग से

  • कंकालेश्वरी शक्तिपीठ पहुंचने के लिए आप निकटतम हवाई अड्डे सुभाष चंद्र बोस इंटरनेशनल एयरपोर्ट से बस या कैब की मदद से करीब 152 किमी का सफर तय करके यहां पहुंच सकते हैं।

रेल मार्ग से

  • रेल मार्ग से जाने के लिए बोलपुर शांतिनिकेतन नजदीकी रेलवे स्टेशन है जहां से मंदिर की दूरी लगभग 9 किमी है। इसके लिए स्थानीय टैक्सी या रिक्शा की मदद ले सकते हैं।

सड़क मार्ग से

  • सड़क रास्ते से जाने के लिए आपको राज्य परिवहन की बसें या किसी अन्य प्राइवेट वाहन की मदद से शांति निकेतन बस स्टेशन जो कंकालेश्वरी मंदिर से लगभग 10 किमी की दूरी पर है, पहुंच सकते हैं।

निष्कर्ष

अंत में, कंकलेश्वरी शक्तिपीठ एक जीवंत और शक्तिशाली स्थान हे। जहां भक्तों की कतारें सदैव मां के दर्शनों को लालयित रहती हैं। आध्यात्मिक परिवेश और प्राकृतिक खूबसूरती का अनोखा संगम मां कंकालेश्वरी की महिमा का गुणगान करता अद्वितीय प्रतीत होता है। विभिन्न नामो से प्रसिद्ध इस मंदिर की नवरत्न और पंचरत्न शैली की विशेषताएं आज भी उतनी ही प्रांसगिक लगती हैं, मानसिक शांति सुकून और शारीरिक तरोताजगी प्रदान करती यह जगह कंकालेश्वरी मां का निवास स्थान है।

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