- Nov 03, 2025
प्रयागराज स्थित मां ललिता शक्तिपीठ अति पावन संगम नगरी में पवित्र स्थल है जहां का अनोखा वातावरण और शांति श्रद्धालुओं को मैदानी क्षेत्र के शक्तिपीठो से रूबरू कराती हैं। प्रयागराज की धरती पर यह शक्तिपीठ किसी वरदान से कम नहीं है जहां भगवान श्री राम के साथ ही महर्षि भारद्वाज ने भी पूजा अर्चना की थी। 51 शक्तिपीठों मे पूजनीय यह मंदिर मां की पूजा तीन रूपों में करता है, मां ललिता, मां सरस्वती और मां महाकाली, जहां और भी कई आश्चर्यजनक ऐतिहासिक कथाएं सुनने के साथ ही अन्य कई छोटे मंदिरों के दर्शनों का सौभाग्य भी प्राप्त होता है। आइए, विस्तार से जानते हैं इस शक्तिपीठ की अन्य रोचक बातों के बारें में।
समस्त शक्तिपीठों का पौराणिक इतिहास
राजा दक्ष जो भगवान शिव के ससुर और देवी सती के पिता थे, एक बार उन्होंने विशाल यज्ञ समारोह का आयोजन करवाया जिसमें भगवान शिव और देवी सती को छोड़कर समस्त देवी देवताओं को सप्रेम आमंत्रित किया, इस वजह से दुखी सती अकेले ही न बुलाने के कारण को जानने के लिए उस यज्ञ समारोह में जा पहुंची तब सती ने महादेव को न बुलाने पर प्रश्न किया इसके बदले में उन्हें राजा दक्ष के द्वारा भगवान शिव के प्रति घोर अपमान सहना पड़ा। इससे आहत होकर सती ने यज्ञ कुंड की अग्नि में स्वयं के प्राणो को आहुत कर दिया।
भगवान शंकर को जब यह पता चला तो उनके गुस्से की सीमा न रही। वे मृत सती का शव लेकर समस्त लोकों मे घूमने लगे इससे सृष्टि में प्रलयकारी समय आ गया। इस परिस्थिति से भगवान शिव और सभी लोको को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शव को 51 भागों में विभाजित कर भारतीय उपमहाद्वीप में बिखेर दिया। जहां जो अंग या आभूषण गिरे वहां देवी शक्तिपीठ की स्थापना होने के साथ ही विशिष्ट देवी का उदय हुआ। जिनकी कुल संख्या 51 है और ये संसार की समस्त ऊर्जा का केंद्र बिन्दु हैं।
ललिता/प्रयाग शक्तिपीठ की उत्पत्ति से जुड़ी ऐतिहासिक कहानी
प्रयागराज स्थित इस शक्तिपीठ में मां सती के दाहिने हाथ की अंगुलियां गिरी थीं जहां मां अलोपी, कल्याणी और ललिता देवी विराजमान हैं। करीब 108 फुट ऊंचे मुकुट वाला यह मंदिर यमुना नदी के किनारे बसा वैदिक श्री यंत्र की संरचना पर बना मंदिर है। ऐसा माना जाता है कि माता सती के दाहिने हाथ की तीन उंगलियां प्रयागराज के अक्षयवट, मीरापुर और अलोपुर मे गिरी थी, जो संगम के किनारें का स्थान है। तीनों मंदिरों को शक्तिपीठ माना जाता है और इन तीनों की शक्तियों को प्रयाग यानी ललिता शक्तिपीठ में समाहित माना जाता है।
मां का शक्तिस्वरूप ललिता देवी और भगवान शिव का रक्षक स्वरूप भैरव भवनेश्वर रूप में पूज्य हैं।
मां ललिता के मंदिर के पास ही ललितेश्वर महादेव का मंदिर है जिसका अपना पौराणिक इतिहास है जिसका उल्लेख देवी पुराण में देखने को मिलता है।
ललिता शक्तिपीठ का दर्शन समय
श्रद्धालुओं के लिए देवी ललिता का यह मंदिर सप्ताह के सातों दिन खुला रहता है जहां भोर में मां की स्नान, ध्यान, श्रृंगार और आराधना से शुरू हुआ क्रम रात तक चलता रहता है।
मंदिर खुलने का समयः सुबह 5 बजे
मंदिर बंद होने का समयः रात 9 बजे
सोमवार से लेकर रविवार तक मंदिर समय सारिणी इसी अनुसार रहती है जहां विशेष अनुष्ठानों के समय मंदिर के समय में कुछ फेरबदल भी हो सकता है।
ललिता शक्तिपीठ की वास्तुकला एवं संस्कृति
प्रयाग शक्तिपीठ गुप्तकाल यानी चौथी शताब्दी के दौरान अस्तित्व में आया, जब यह किसी विशाल और मुख्य देवी के रूप में जाना जाता था।
इस मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में हुआ था जिसका आधुनिक स्वरूप कई बार जीर्णोद्धार कराया गया है।
इस मंदिर की वास्तुकला गर्भग्रह के ऊपरी भाग पर आसान उत्तर भारतीय नागर शैली मे बना हुआ भव्य परिदृश्य बनाता है। मुख्य गर्भग्रह में मां ललिता की मूर्ति स्थापित है जो लाल पोशाक और गहनों, आभूषणांं और पुष्पों से सुसज्जित बहुत ही प्यारी लगती हैं।
मंदिर की दीवारो पर शक्ति से संबंधित 64 योगिनियां और महाविद्या रूपों का चित्रण देखने को मिलता है।
ललिता शक्तिपीठ में मनाए जाने वाले अनुष्ठान, उत्सव एवं त्यौहार
ललिता शक्तिपीठ प्रयागराज का प्रतिष्ठित मंदिर है जहां तीन नदियों का संगम होता है। गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों के पवित्र संगम पर स्थित यह शहर कुंभ मेले के लिए देश दुनिया में जाना जाता है जहां करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट भीड़ देखने को मिलती है। इस दौरान यहां साधु संत ग्रहस्थ और हिंदू धर्मों के सभी विशेष लोग यहां डुबकी लगाने जरूर आते हैं। ऐसे में मां ललिता की शोभा और दर्शनो के लिए भक्तो की भारी भीड़ यहां पहुंचती है। इसके अलावा यहां माघ मेला भी बहुत धूमधाम से मनाया जाता है जिसमें तीर्थयात्री संगम स्नान करने के साथ ही मां ललिता के दर्शनों की अभिलाषा से पहुंचते हैं।
चैत्र व आश्विन नवरात्रिः ललिता देवी मंदिर में मनाए जाने वाला नवरात्रि उत्सव भक्तो के लिए अपार श्रद्धा और उत्सव का पर्व है जब नौ दिनों तक लगातार मां की साधना की जाती है। उस समय यहां लगने वाले मेलों, दुकानों और भक्तों की लंबी कतारें हर किसी को यहां आकर्षित करती हैं। पवित्र धूम और ढोल नगाड़ों की गूंज के साथ नवरात्रि पर्व के आगमन की तैयारी की जाती है। जहां भक्त मां को विभिन्न तरह का भोग अर्पित करने के साथ ही लाल रंग की चुनरी और लहंगा भेंट करते हैं।
ललिता शक्तिपीठ और प्रयागराज से जुड़े रोचक तथ्य
इस शक्तिपीठ के बारे में कथन है कि यहां दर्शन किए बिना आपकी प्रयागराज तीर्थयात्रा अधूरी मानी जाती है।
ललिता देवी शक्तिपीठ मां यमुना किनारे स्थित है वहीं अलोपी मंदिर मां गंगा के किनारे संगम के पास ही स्थित है जिसके लिए कहा जाता है कि यहां देवी की कोई प्रतिमा नहीं है बल्कि एक झूला है जिसे देवी की शक्तियों का प्रतीक माना जाता है। जहां लाल धागा बांधकर मन्नत मांगी जाती है। यह स्थान अलोपी देवी इसलिए कहलाता है कि यहां गिरने वाली देवी सती की उंगली हवन कुंड में ही गिरते अलोप हो गई थी इसलिए इसे अलोपी देवी कहा जाता है।
मां ललिता, अलोपी और कल्याणी देवी मंदिरों में कल्याणी मंदिर में 32 अंगुल की देवी प्रतिमा ऋषि याज्ञवल्क्य जी ने स्वयं स्थापित करके मां की साधना की थी। मां कल्याणी देवी मंदिर में नवरात्रि का समग्र आकर्षण देखते बनता है।
मुगल काल में अकबर ने संगम किनारे इलाहाबाद किले का निर्माण करवाया जिसमें अक्षयवट यानी बरगद के प्राचीन पेड़ के साथ ही प्राचीन मंदिरों को भी सम्मिलित किया गया है।
ललिता शक्तिपीठ के आसपास घूमने वाले स्थान
लेटे हुए हनुमान जी मंदिरः इन्हें संकट मोचन मंदिर नाम से भी जानते हैं। इनके बारे में मान्यता है कि राम रावण युद्ध के बाद हनुमान जी अत्यधिक थक गए थे तब वे मां सीता के कहने पर इसी संगम के किनारे ही आराम करने के लिए लेट गए थे, इसलिए यहां इनकी स्थापना इसी रूप में देखी जाती है। वर्ष का पहला स्नान संकट मोचन मदिर में हनुमान जी को मां गंगा ही सबसे पहले कराती हैं। शनिवार और मंगलवार को यहां अपार भीड़ देखने को मिलती है।
शंकर विमान मण्डपमः दक्षिण भारतीय शैली का प्रतिनिधित्व करता यह मंदिर चार स्तम्भों पर निर्मित आश्चर्यजनक आकर्षण है, इसमें कुमारिल भट्ट, जगतगुरू आदि शंकराचार्य, कामाक्षी देवी और तिरूपति बालाजी के दर्शनों का लाभ लेने का अवसर प्राप्त होता है। कामाक्षी देवी के चारों ओर 51 शक्तिपीठों की देवियों के दर्शन, तिरूपति बालाजी के चारों ओर 108 विष्णु भगवान और योगशास्त्र सहस्त्रयोग लिंग के 108 शिवलिंगों के अद्भुत दर्शन करने का अलौकिक आनंद ले सकते हैं। इस मंदिर की अनोखी और भव्य विशेषताएं भक्तों को आकर्षित करती हैं।
नाग वासुकी मंदिरः प्रयागराज में गंगा नदी के तट पर बना यह मदिर नागों के राजा वासुकी नाग को समर्पित मंदिर है जिन्होंने समुद्र मंथन में अपना भरपूर सहयोग दिया था। कहते हैं समुद्र मंथन के बाद नाग वासुकी अपनी थकावट उतारने के लिए इसी स्थान पर विश्राम करने आए थे। इस मंदिर की मान्यता है कि यहां आने वाले व्यक्ति को जीवनकाल में सर्पों से किसी तरह का भय नहीं सताता है।
त्रिवेणी संगमः प्रयागराज में सुप्रसिद्ध त्रिवेणी संगम जहां गंगा यमुना और अदृश्य रूप से सरस्वती नदी का मिलन होता है। यह पवित्र स्थान पुराणो और हिंदू मान्यताओं में अत्यधिक महान कहा जाता है, जहां स्नान करने से जन्म जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिल जाती है। यहां लगने वाला कुंभ और अर्धकुंभ मेला प्रसिद्ध है जो क्रमशः 12 और 6 सालों में लगाया जाता है। वर्ष भर यहां समस्त पूर्णिमासी और अमावस्या तिथियों को बेहद भीड़ देखने को मिलती है।
वेणी माधव मंदिरः इस मंदिर में भगवान विष्णु श्री वेणी माधव के रूप में और मां लक्ष्मी अपने त्रिवेणी रूप में प्रतिष्ठित है। पुराणों के अनुसार भगवान ब्रहमा जब बनारस स्थित दशाश्वमेध घाट में यज्ञ कर रहे थे तब उन्होंने इस की सफलता और प्रयागराज की रक्षा हेतु भगवान विष्णु के 12 रूपों की स्थापना प्रयागराज में की थी। अन्य मान्यता के अनुसार राक्षस गजकर्ण का अंत कर भगवान विष्णु त्रिवेणी संगम की नगरी में भक्तों की याचना पर अपने इस स्वरूप में यहा विराजमान हैं।
कैसे पहुंचे ललिता शक्तिपीठ
ललिता शक्तिपीठ पहुंचने के लिए आप हवाई, रेल या सड़क मार्ग तीनों में कोई भी विकल्प चुन सकते हैं।
हवाई मार्ग से
- ललिता देवी शक्तिपीठ पहुंचने के लिए वाराणसी स्थित लाल बहादुर इंटरनेशनल एयरपोर्ट से पहुंच सकते हैं जहां देश विदेश कहीं से भी जाया जा सकता है। एयरपोर्ट से मंदिर की लगभग दूरी 135 किमी है जिसे तय करने के लिए स्थानीय टैक्सी या कैब किराए पर ले सकते हैं।
रेल मार्ग से
- ललिता देवी शक्तिपीठ का नजदीकी रेलवे स्टेशन प्रयागराज जंक्शन है जहां से मंदिर की लगभग दूरी 5 किमी है जिसे तय करने के लिए स्थानीय वाहनों से लगभग 20 से 25 मिनट का समय लग सकता है।
सड़क मार्ग से
- प्रयागराज की कनेक्टिविटी सड़क रास्ते से बेहतर है जहां जाने के लिए आप निजी कार, राज्य सरकार की बस या प्राइवेट बसों के माध्यम का सहारा ले सकते हैं। प्रयागराज बस स्टैंड से ललिता देवी मंदिर की लगभग दूरी 3.5 किमी है।
निष्कर्ष
प्रयाग शक्तिपीठ में मां ललिता का आशीर्वाद प्रदान करती प्रयागराज संगम की धरती भक्तों को विशेषतः आकर्षित करती है जिसका जिक्र हिंदू धर्मग्रंथों के साथ ही तंत्र ग्रंथों में भी विस्तार से किया गया है। पवित्र पावन धाम और भक्तो की मनोवांछित इच्छाओं को साकार रूप प्रदान करती मां ललिता अपने भक्तों का सदैव कल्याण करती हैं। सकारात्मक ऊर्जा और दिव्य चेतना को मानव जीवन में जाग्रत करती देवी मां भौतिक सुखों के साथ ही आध्यात्मिक उन्नति की पराकाष्ठा भी प्रदान करती हैं।
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