- Jan 09, 2026
तहज़ीब और नवाबों के शहर लखनऊ का रूमानी अंदाज़ सदियों से अपनी विशेष छाप बरकरार किए हुए हैं। आधुनिकता के दौर में आगे बढता लखनऊ शहर अतीत की भूली बिसरी यादों को आज भी बेहद संजीदगी से सहेज कर रखे हुए है। उत्तर प्रदेश राज्य की राजधानी के रूप में लोकप्रिय लखनऊ शहर नज़ाकत और नफ़ासत का गढ है जहां की बोली, भाषा की सुरीली मिठास कानों में मधुर रस घोल देती है, उतनी ही खास है इतिहास के पन्नों में दर्ज यहां की ऐतिहासिक इमारतें। किसी समय में अवध के नाम से मशहूर यह शहर वर्तमान मे भी अपनी अवधी संस्कृति, रीति रिवाज और परंपराओं के साथ ही अवधी व्यंजनों के लाजवाब स्वाद के लिए भी उतना ही मशहूर है। आप चाहें जहां के रहने वाले हों लखनऊ की सादगी और खूबसूरती आपको अपना दीवाना बना देगी, अगर आप भी इस शानदार शहर की सैर पर निकलने की योजना बना रहें हैं तो यह आर्टिकल आपको लखनऊ भ्रमण के लिए सहायता प्रदान करेगा।
1. निदान महल
पुराने लखनऊ में स्थित यह प्राचीन स्मारक मुगल वास्तुकला शैली का शानदार दर्शन कराता मनमोहक उदाहरण है, जहां लाल बलुआ पत्थर से बनी दीवारों की छवि मुगल काल की विशिष्ट छाप छोड़ती है। शेख अब्दुर रहीम मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल ईस्वी 1556-1605 में अवध के सूबेदार हुआ करते थे। शेख अब्दुर रहीम की याद में बना यह स्मारक आदर और सम्मान के लिए जाना जाता है जहां मान्यता है कि लोग इनकी पावनमय उपस्थिति में स्वयं की मुक्ति यानी निदान हेतु प्रार्थना अरदास करते हैं और उन्हें अपनी समस्याओं से मुक्ति व निदान प्राप्त होता है। इसी कारण इस महल को निदान महल नाम से जाना जाता है।
मकबरे का केंद्रीय कक्ष वर्गाकार शैली में बना हुआ है, जिस पर ऊंचाई लिए चबूतरा, गुबंद लिए चबूतरे से घिरा हुआ है और संगमरमर की दो कब्रों पर कुरान की आयतें उत्कीर्ण की गई हैं, जो लाल पत्थर हेडस्टोन से ढके हुए हैं। इसके पास सोलह खंभे का लोकप्रिय मकबरा ऊंचाई पर स्थित चबूतरे पर स्थित है, इसमें विभिन्न आकृतियों में बनी पांच कब्रें हैं, जिन्हें जहांगीर युग मे बनवाया गया था। पत्थर के ंखंभों और ब्रैकेट्स की शानदार उत्कृष्ट बनावट ओवरहैंगिग पत्थर स्लैब को सपोर्ट करते हुए दिखते हैं जिनकी शानदार झलक अपने आप में अद्वितीय प्रदर्शन करती है। शेख अब्दुर रहीम जिन्हें अबुल फजल ने अपनी किताब आइने ए अकबरी में भी शामिल करते हुए इनके महान व्यक्तित्व के बारें में दर्ज किया है। इस मकबरे का ‘मुक्ति का मकबरा’ कहते हैं।
पताः याहियागंज क्षेत्र, शंकर दयाल सड़क, रकाबगंज, पुराना लखनऊ, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
समयः प्रातः 6 बजे से रात 10 बजे तक
प्रवेश शुल्कः निःशुल्क
2. बड़ा इमामबाड़ा, भूलभुलैया
लखनऊ स्थित बड़ा इमामबाड़ा अपनी खूबसूरत और शानदार वास्तुकला के लिए जाना जाता है। बड़ा इमामबाड़ा में स्थित भूलभुलैया पर्यटको को बेहद आकर्षित करती है। 1785 ईस्वी में इस इमारत को बनाने की शुरूआत हुई थी जब अवध यानी लखनऊ में एक भयंकर अकाल का समय था तब नवाब ने रोजगार प्रदान करने के उद्देश्य से करीब एक दशक तक इस इमारत का निर्माण कार्य जारी रखा, इसको बनाने में तकरीबन 20 हजार मजदूरों को काम पर रखा गया था। भूलभुलैया की भव्य इमारत और आश्चर्यजनक पहुंच बेहद चौंकाने और आश्चर्यचकित करने वाली है। इस इमारत में कई भूमिगत मार्ग भी है जिन्हें अब बंद कर दिया गया है। बाहरी तरफ से करीब 25 सीढियां भुलभुलैया तक पहुंचती है साथ भुलभुलैया में मिलने वाले कई अनिश्चित और मोड़दार रास्ते इसकी रोचकता को और भी ज्यादा प्रसिद्धि प्रदान करते हैं। परिसर के अंदर मस्जिद भी है जिसे शिया मुसलमानों द्वारा आसफी इमामबाड़ा भी कहा जाता है, यहां मुहर्रम के समय कई शिया मुस्लिम लोग वृहद संख्या में एकत्रित भी होते हैं। यहां बनी शाही बावली इस इमारत की बेहद उत्कृष्ट संरचना है।
भूलभुलैया की छत बेहद करीने से तराशी गई खिड़कियों यानी झरोखों के कारण मंत्रमुग्ध करती है। मुख्य इमारत के दोनों तरफ कई मेहराबदार दरवाजे की शोभा आकर्षित करती है जहां से लखनऊ और पूरे परिसर के भव्य परिदृश्य जिसमें रूमी दरवाजा, आसिफी मस्जिद, हुसैनबाद घंटाघर और गोमती नदी के किनारे रोमांचक और आश्चर्यजनक खूबसूरती प्रदान करते हैं। भुलभुलैया के लिए आप गाइड मदद भी ले सकते हैं जो आपको बेहतर अनुभव प्रदान करने में मददगार होगा।
पताः हुसैनबाद, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
समयः सुबह 6 बजे से शाम 5 बजे तक व शुक्रवार को सुबह 6 बजे से दोपहर 2ः30 बजे तक।
प्रवेश शुल्कः वयस्क भारतीयों के लिए 50 रूपयें, बच्चों के लिए 25 रूपये और विदेशियों के लिए 500 रूपये शुल्क प्रति व्यक्ति, दो लोगों के लिए गाइड शुल्क लगभग 100 रूपये।
3. छोटा इमामबाड़ा
इस वास्तुकृति को अवध के तीसरे राजा मोहम्मद अली शाह ने 1837-1842 में बनवाया था, इसमे इन्हीं राजा और इनकी मां की कब्रें हैं जिन्हें बेहद भव्यता और संपन्नता के साथ तैयार करवाया गया था। लखनऊ हुसैनाबाद क्षेत्र में स्थित छोटा इमामबाड़ा के दो प्रवेश द्वार हैं, जो श्वेत संगमरमर से बने शानदार भव्य आकर्षण उत्पन्न करते हैं। इमामबाड़े के प्रांगण में हरी भरी हरियाली और सजीव फूलों की खुशबूओं से सराबोर वातावरण व लोहे के पुल पर बनी बारीक अंलकृत नक्काशी के साथ दो कास्ंय मूर्तियां पोर्टिको के दोनो तरफ पहरा देती हैं। वर्गाकार जुड़ंवा श्वेत गुबंद वाले मकबरों से घिरा सुंदर क्षेत्र और पास ही मौजूद छोटी सी अलंकृत मस्जिद के साथ इमामबाड़े के दक्षिणी छोर पर मौजूद विशाल चबूतरा है। राजा और उनकी मां का अंतिम विश्राम स्थल के साथ मकबरे की रूहानी खूबसूरती ऊंचे महल की सुनहरी गुबंद और ऊंचे शिखर की शोभा अर्धचंद्र और सितारों से सजा हुआ आकर्षक प्रतीत होता है। यहां की झूमर, पुष्प आकृतियां, मकबरे और फारसी स्नानघर मुख्यतया प्रसिद्ध हैं।
यह संरचना एएसआई भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है जिसमें कई सारी कलाकृतियां भी देखने को मिलती हैं- राजा का प्रिय उभरा हुआ चांदी का सिंहासन, प्राचीन पवित्र कुरान की दो प्रतियां, रानी का दीवान और कई विशेष चीजों के आकर्षण मंत्रमुग्ध करते हैं। इस भव्य संरचना के लिए नवाब ने पूरे भारत से कई वास्तुकारों को बुलाया था, जो सर्वश्रेष्ठ ढांचा तैयार कर सकें।
पताः हुसैनबाद चौक क्षेत्र लखनऊ उत्तर प्रदेश
समयः सुबह 6 बजे से शाम 5 बजे तक, शुक्रवार बंदी
प्रवेश शुल्कः भारतीयों के लिए 50 रूपये शुल्क प्रति व्यक्ति और विदेशियों के लिए 500 रूपये शुल्क प्रतिव्यक्ति निर्धारित है।
4. हनुमान मंदिर अलीगंज
भक्त शिरोमणि श्री हनुमान जी का यह अद्भुत मंदिर बेहद खास और मान्यताओं पर आधारित है। इस मंदिर की विशेषता है कि यहां हर धर्म मजहब का व्यक्ति दर्शन करने के साथ ही मन्नत मांगने, प्रसाद, चढावा चढाने आता है। ज्येष्ठ मास के प्रत्येक मंगलवार को यहां विशाल मेला लगता है, जो लखनऊ के प्रमुख मेलों में शुमार रखता है। अलीगंज मोहल्ला जिसे नवाब वाजिद अली शाह की दादी और शुजाउद्दौला की पत्नी आलिया बेगम द्वारा बसाया गया था, इस स्थान पर हनुमान जी की स्थापना त्रेता युग से जुड़ी मानी जाती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार प्रभु श्री राम के समय इस मंदिर का स्थान महानगर कालोनी में इस्लामाबाड़ी में था। माना जाता है कि जब श्री लक्ष्मण जी, भगवान हनुमान के साथ माता सीता को छोड़ने के लिए कानपुर बिठूर गए थे तब रास्ते में अंधेरा हो जाने के कारण वे तीनों इसी स्थान पर रात भर ठहरे थे। इस मंदिर की मान्यता है कि जब भी यहां या आसपास किसी नए हनुमान मंदिर की स्थापना होती है तो सबसे पहले अर्जी इस मंदिर में ही लगायी जाती है।
मंदिर निर्माण संबंधी कहानी सुनने को मिलती है कि अवध के नवाब शुजाउद्दौला की पत्नी आलिया बेगम को संतान प्राप्ति की इच्छा थी इसके लिए वे इस्लामाबाड़ी में किसी बाबा के पास आशीर्वाद लेने गई थीं। जब वे गर्भवती थीं तब उन्हेंं ऐसा स्वप्न आया कि इस्लामाबाड़ी में श्रीहनुमान जी की मूर्ति गढी हुई है उसे निकालकर किसी मंदिर में प्रतिष्ठित करें। फलस्वरूप उन्होंने वैसा ही किया और मूर्ति लेकर जब लौट रहे थे तब मूर्ति लेकर चलने वाला हाथी इस स्थान से आगे नहीं बढ पा रहा था इसलिए इनकी स्थापना इसी स्थान पर की गई। मंदिर और सारी व्यवस्था नवाब की बीवी आलिया बेगम द्वारा निर्धारित की गई। यहां मेले की परंपरा भी बेगम आलिया द्वारा रोगमुक्त होने के पश्चात् शुरू करवाई गई। बेगम आलिया के नाम पर ही इस स्थान को अलीगंज नाम से जाना जाता है। हर साल ज्येष्ठ मास के बड़े मंगलवार को यहां विशाल मेले का भव्य आयोजन किया जाता है जिसमें बहुत दूर दूर से दर्शनार्थी मन्नत मांगने और चढावा चढाने के साथ आशीर्वाद प्राप्त करने की लालसा से आते हैं। यहां का शांत पंपा सरोवर और पारिजात वृक्ष भक्तों को मंदिर परिसर की भौतिक शोभा बढाता है।
पताः इति चौराहे के पास, अलीगंज, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
समयः मंदिर आमतौर पर हमेशा खुला रहता है जहां प्रातःकालीन आरतीः सुबह 5 से 6 बजे और शाम में सायंकालीन आरतीः 7 से 9 बजे तक। विशेषतौर पर मंगलवार और शनिवार को ज्यादा भव्य भीड़ होती है।
प्रवेश शुल्कः निःशुल्क
5. छतर मंजिल
लखनऊ का यह स्मारक अपनी शानदार उपस्थिति और समृद्धिशाली अतीत के कारण जाना जाता है। यूरोपीय और भारतीय इस्लामी शैलियों के सम्मिश्रण को प्रदर्शित करता यह स्थान 1857 के विद्रोह से विशेषतः जुड़ा हुआ है, इस कारण इसकी प्रमुखता और भी ज्यादा बढ जाती है। इस स्मारक पर उकेरे चित्र, सजावटी प्लास्टरवर्क और बारीक कलाकृतियों की मौजूदगी इस महल के भीतरी भाग को बहुत सुंदर बनाती है। छतर मंजिल इसे छाता महल के नाम से भी जानते हैं जो स्वतंत्रता संग्राम की पहली शुरूआत के समय मुख्यालय के रूप में जानी गई। छतर मंजिल में मौजूद विशाल सोने का छाता दूर से ही अपनी दिव्य छटा बिखेरता है। वर्तमान में यह मंजिल लोकप्रिय संग्रहालय और शानदार सांस्कृतिक केंद्र के रूप में जानी जाती है, जहां लखनऊ और उसके समृद्ध संपन्न इतिहास की झलक कई सारे विविध आकर्षणों के साथ आमंत्रित करती हैं।
पताः महात्मा गांधी मार्ग, चौक बस स्टॉप, कैसरबाग, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
समयः सुबह 9ः30 बजे से शाम 6 बजे तक
प्रवेश शुल्कः कोई प्रवेश शुल्क नहीं है।
6. दिलकुशा कोठी
लखनऊ स्थित यह कोठी दिलकुशा महल के नाम से भी जाना जाता है जो ला मार्टिनियर कॉलेज के दक्षिण में स्थित है। इस महल को देखकर मन आनंदित और भाव विभोर हो जाता है इसलिए इसे दिलकुशा महल कहा जाता है। इस महल की पहुंच विशाल भव्य पेड़ों की गलियारे से होती हुई अर्ध वृत्ताकार द्वार तक जाती थी जो बेहद सुंदर प्लास्टर्स से सजा होता था। सन् 1798 से 1814 तक अपने शासनकाल में एक शिकार लॉज और रॉयल रिट्रीट के तौर यहां के नवाब सआदत अली खान ने बनवाया था। महल के चारों ओर बना भव्य उद्यान जिसमें हिरण व अन्य वन्य प्रजातियां देखने को मिलती थी। इस महल को राष्ट्रीय स्मारक के तहत जाना जाता है। इसके दक्षिणी छोर पर ब्रिटिश अधिकारियों और सैनिकों की समाधियां हैं जहां आज यह जीवंत खंडहर और आसपास की हरियाली संपन्न बगीचे के रूप में ज्यादा पसंद किया जाता है, जहां आप अतीत की झलक देखने के साथ ही शानदार फोटोग्राफी का आनंद भी ले सकते हैं।
पताः बिबियापुर मार्ग, कैंटोनमेंट, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
समयः सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक
प्रवेश शुल्कः निःशुल्क
7. मोती महल
19वीं सदी में नवाब वाजिद अली शाह द्वारा निर्मित यह महल लखनऊ के राजसी वैभव को बढाने के लिए गोमती नदी के पार जानवरों और पक्षियों के आकर्षणों को निहारने के लिए बनवाया गया था। महल का श्वेत मोती सा रंग इसे मोती महल नाम से प्रसिद्ध करता है। मोती महल मे बनी दो प्रमुख इमारतें शाह मंजिल और मुबारक मंजिल आज सरकारी ऑफिस के रूप में प्रयोग की जा रही हैं। इस महल का उपयोग कभी कभी शत्रु अभियानों को फलीभूत करने के लिए भी किया जाता था। यहां बने उद्यान का इस्तेमाल प्रदर्शनियों और समारोहों के लिए किया जाता है।
आज भी यह स्थान पक्षी प्रेमियों के लिए जन्नत जैसा स्पर्श प्रदान करता है, इसके अलावा गोमती नदी की मोहकता और स्थापत्य सुंदरता के साथ स्वच्छ निर्मल वातावरण आकर्षित करता है। आप यहां नौका विहार, शांतिपूर्ण बैठक और भ्रमण का आनंद ले सकते हैं।
पताः राणा प्रताप मार्ग, पुराना हैदराबाद, हजरतगंज, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
समयः सुबह 11 बजे से रात 11 बजे तक
प्रवेश शुल्कः निःशुल्क
8. साइंस सिटी
इस परिसर में आपप विभिन्न वैज्ञानिक प्रदर्शनियों की झलक देखने के साथ ही कई एक्टिव और ऑडियो विजुअल प्रदर्शन भी देख सकते हैं। जैव प्रौद्योगिकी, मानव ब्रेन, समुद्री जीवन से जुड़ी रोचक जानकारियों को व्यावहारिक रूप से देख सकते हैं। साइंस सिटी में सभी के लिए एसी हॉल में साइमैक्स मूवी थिएटर के अन्तर्गत आप यहां छोटा सा 3डी शो भी देख सकते हैं। तारामंडल शो का आनंद लें जहां आप अंतरिक्ष और तारों के बारें में भी जान सकते हैं। हरियाली संपन्न पार्क में प्रागैतिहासिक काल के जीवों और जानवरों के चित्रण आकर्षित करते हैं। आप यहां कई रोचक और ज्ञानवर्धक क्विज में भाग भी ले सकते हैं।
पताः अलीगंज एक्सटेंशन, एकता विहार चंद्रलोक लखनऊ, उत्तर प्रदेश
समयः सुबह 9ः30 बजे से रात 8 बजे तक
प्रवेश शुल्कः विभिन्न कैटेगरी में अलग अलग दर लागू है जिनमें न्यूनतम दर रूपये 10 से लेकर रूपये 50 है।
9. जनेश्वर मिश्र पार्क
एशिया के सबसे बड़े उद्यानों मे शुमार रखता यह स्थल करीब 376 एकड़ क्षेत्रफल में फैला हुआ है जिसे लंदन के हाइड पार्क की तर्ज पर तैयार किया गया है। इसका नाम समाजवादी पार्टी के संस्थापक जनेश्वर मिश्र को समर्पित है, यहां इनकी करीब 25 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित है। इस पार्क में कई सारे पक्षियों, छोटे जानवरों, मछलियों और कीड़ों की विस्तृत श्रृंखला देखने को मिलती है। जहां आप गोंडोला नाव की सवारी के साथ फव्वारों का आनंद भी ले सकते हैं। पार्क में सुबह की सैर, जॉगिग, साइक्लिंग और ओपन एयर जिम मे फूड प्लाजा और भोजन का यादगार स्वाद चख सकते हैं।
पताः गोमती नगर क्षेत्र, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
समयः सुबह 5 बजे से रात 9 बजे तक
प्रवेश शुल्कः 10 रूपये प्रति व्यक्ति और गंडोला नाव सवारी 100 रूपये
10. चंद्रिका देवी मंदिर
पवित्र गोमती नदी किनारे स्थित चंद्रिका देवी मंदिर अत्यंत परम पावन और महत्वपूर्ण देवी तीर्थस्थल है। देवी दुर्गा के भक्तो के लिए श्रद्धा और आस्था का यह स्थान अपने धार्मिक वातावरण, पौराणिक मान्यता और नदी के तट पर बसे होने के कारण और भी ज्यादा मंत्रमुग्ध करता है। इस मदिर से जुड़ी पवित्र कथा त्रेता युग से संबंधित है- जब एक बार अमावस्या की रात भगवान लक्ष्मण के पुत्र राजकुमार चंद्रकेतु अश्वमेध यज्ञ के घोड़े के साथ गोमती नदी के पास से गुजर रहे थे तब उन्हें कुछ भय लगा तब उन्होंने माता उर्मिला द्वारा सिखाए मंत्रों को उच्चारित किया तब देवी का स्वरूप हल्की चांदनी रोशनी के साथ उनके सामने प्रकट हुईं जिससे उनका भय आदि दूर हो गया। हल्की चांदनी उजाले के साथ प्रकट होने के कारण यहां देवी को चंद्रिका देवी के नाम से जाना जाता है। कहते हैं यह इतना मनमोहक मंदिर हैं कि यहां एक बार आने वाला श्रद्धालु बार बार आने की कामना करता है।
पताः कठवारा गांव, बख्शी का तालाब, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
समयः सुबह 5 बजे से दिन 1 बजे व दोपहर 2 बजे से रात 10 बजे तक।
प्रवेश शुल्कः निःशुल्क
लखनऊ घूमने का सर्वश्रेष्ठ समयः
लखनऊ पर्यटन के लिए सबसे शानदार समय अक्टूबर से मार्च होता है जहां मौसम की खूबसूरती और बेमिसाल अंदाज़ आकर्षित करता है। इस दौरान यहां सर्दियों की ऋतु मौसम में ठंडक का एहसास प्रदान करती है। ग्रीष्म ऋतु में यहां का तापमान लगभग 45 डिग्री सेल्सियस तक चला जाता है, तपिश ज्यादा होने के कारण सर्दियां यहां घूमने के लिए सबसे सर्वोत्तम समय है।
लखनऊ के प्रसिद्ध व्यंजन
लखनऊ के अवधी स्वाद और उसकी खुशबू सभी को मोहित करती है। ऐसे में यहां पर्यटन करते समय लज़ीज व्यंजनों पकवानों और स्ट्रीट फूड की खुशबू आकर्षित करती है। 1722 ईस्वी में यहां के पहले नवाब सआदत अली खान जो सफावी यानी फारस का थे, इन्होंने संस्कृति, रीति रिवाज के साथ स्वाद के लिए भी बेमिसाल कदम उठाया। 1775 ईस्वी में लखनऊ इसी अवध क्षेत्र की राजधानी बना जहां सभी के पसंदीदा व्यंजनों की अद्भुत व रोचक श्रृंखला आमंत्रित करती है।
अफीम चायः लखनऊ की चाय का नाम सुनते ही वाह अपने आप मुंह से निकल जाता है। मिट्टी के प्याले में गरमागरम चाय और बन मक्खन या समोसे के साथ नाश्ते की खुशबू इतनी मनमोहक लगती है कि हर किसी को अपनी लत लगवा ही देती है इसीलिए प्यार से यहां की चाय को ‘अफीम-चाय’ कहते हैं। यूं तो पूरे लखनऊ में ही पर हजरतगंज विशेष रूप से चाय के लिए बहुत ज्यादा प्रसिद्ध स्थान कहा जाता है।
गलौटी कबाबः उत्तर प्रदेश में इस डिश को बहुत ज्यादा पसंद किया जाता है, जिसकी शुरूआत वास्तव मेंं लखनऊ क्षेत्र से ही मानी जाती है। करीब सन् 1905 में हाजी मुराद अली द्वारा यहां के चौक बाजार में स्थापित किया गया था। फिलहाल तो यहां 17वीं शताब्दी से ही कबाब रेसिपी चलन में थी लेकिन गलौटी कबाब जिसकी उत्पत्ति नवाब असफ-उद्-दौला के समय पर हुई। दरअसल नवाब के दांत जब कमजोर हो गए तो वो कोई चबाने युक्त चीज नहीं खा सकते थे पर ऐसे में उन्हें कबाब खाने का मन हुआ तब उन्होंने घोषणा की- ऐसा कबाब हो जिसमें चबाने की जरूरत ही न हो और इसे शाही संरक्षण प्रदान किया जाएगा। तब गलौटी कबाब डिश बनी थी। रूमाली रोटी के साथ गलौटी कबाब का आनंद बेहद स्वादिष्ट होता है।
टोकरी चाटः लखनऊ आएं तो यहां की टोकरी चाट को कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं। वैसे तो पूरे उत्तर प्रदेश में चाट को लेकर अलग ही लेवल का क्रेज रहता है लेकिन लखनऊ की टोकरी चाट बहुत विशेष है, क्योंकि इसे आलू से बनी एक खाने योग्य टोकरी में सर्व किया जाता है। इसमें मैश किए आलू टिक्कियों, मटर और नमकीन को भरा जाता है, साथ में खट्टी मीठी चटनी के साथ गाढी दही डाली जाती है।
बिरयानीः लखनवी भोजन में जब तक बिरयानी नाम शामिल न हो तब तक कुछ अधूरापन है। यह पकवान मसालो से युक्त मटन या चिकन के रसदार भागों और बासमती चावल की जुगलबंदी बेहद स्वादिष्ट लगती है।
इन सभी व्यंजनो के अलावा लखनऊ में ठंडाई, फालुदा कुल्फी, मलाईपान, शीरमहल मिठाई, खस्ता कचौड़ी और कुलचे निहारी आदि प्रसिद्ध हैं।
कैसे पहुंचे लखनऊ
हवाई मार्ग से
- लखनऊ पहुंचने के लिए हवाई रास्ता सुलभ और आसान है, शहर के कें्रद से तकरीबन 12 किमी दूरी पर स्थित चौधरी चरण सिंह इंटरनेशनल हवाई अड्डा है जिसे पहले अमौसी एयरपोर्ट नाम से जाना जाता था।
रेल मार्ग से
- रेल मार्ग से लखनऊ बहुत बेहतरी से जुड़ा हुआ है। यहां कई महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन है जो शहर को रेल मार्ग के माध्यम से अन्य प्रमुख शहरो से जोड़ते हैं। लखनऊ के प्रमुख रेलवे स्टेशनों में लखनऊ चारबाग रेलवे स्टेशन, लखनऊ जंक्शन हैं, इसके अलावा लखनऊ सिटी, गोमती नगर, ऐशबाग रेलवे स्टेशनों के अलावा और भी कई रेलवे स्टेशन पूरे लखनऊ महानगर में सुविधा प्रदान करते हैं।
सड़क मार्ग से
लखनऊ पूर्व, पश्चिम और दक्षिण की ओर चले रहे नेशनल हाईवे 24, 25 व 28 के चौराहे पर है जहां प्रमुख निम्न शहरों से उक्त दूरी पर है।
- आगरा : 363 किमी
- इलाहाबादः 225 किमी
- कोलकाताः 985 किमी
- दिल्लीः 497 किमी
- कानपुरः 79 किमी
- वाराणसीः 305 किमी
लखनऊ पहुंचने के लिए सड़क मार्ग की सुविधा अच्छी तरह उपलब्ध है। अगर आप दिल्ली या आगरा से लखनऊ पहुंचना चाहते हैं तो आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे, यमुना एक्सप्रेसवे के माध्यम से पहुंच सकते हैं। भविष्य में कानपुर की तरफ से कानपुर लखनऊ एक्सप्रेसवे और पश्चिमी, पूर्वी हिस्सों को जोड़ने के लिए गंगा एक्सप्रेसवे और ज्यादा कनेक्टिविटी स्थापित करेगा। लखनऊ जाने के लिए बस के माध्यम से या टैक्सी, कैब बुक कर लखनऊ पहुंच सकते हैं।
निष्कर्ष
लखनवी अंदाज़ और पर्यटन विशेष आकर्षण, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है। इसके अलावा आधुनिक शहर की झलक दर्शाते इस शहर में विशाल मॉल्स, पुराने चहल पहल भरे बाजार और यादगार उद्यानों, मनोरंजन क्षेत्रों की उपस्थिति तमाम सारे शानदार और रोचक विशेषताओं की खूबियां प्रदान करते हैं। लखनऊ सिर्फ एक शहर नहीं बल्कि उस युग की दास्तां को बयां करता खूबसूरत अनुभव है जिसे हम अतीत के पन्नों में ही निहारते हैं। तो, आइए इस मशहूर शहर की सड़को पर ऐतिहासिकता और आधुनिकता के अद्भुत संयोग का आनंद लीजिए, यहां की लखनवी तहज़ीब की मिसाल देश प्रदेश ही नहीं बल्कि विश्वस्तर पर भी लोकप्रिय हैं।
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