• Nov 03, 2025

पवित्र वातावरण और शुद्ध जल के स्त्रोत के पास स्थित दाक्षायनी शक्तिपीठ तिब्बत के कैलाश मानसरोवर झील के किनारे पर है। आध्यात्मिक पृष्ठभूमि और शांत सुखद माहौल में यह मंदिर और भी ज्यादा विशेष प्रतीत होता है। समुद्री तल से करीब 21 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित मानसरोवर झील और मां दाक्षायनी का आशीर्वाद प्रदान करता धार्मिक परिवेश श्रद्धालुओं के मर्मस्पर्शी अनुभव देता है, जिसकी गिनती देवी सती के 51 शक्तिपीठों में से होती है। कैलाश जिसे भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है, यहां मानसरोवर झील की अनुपम छवि और दाक्षायनी शक्तिपीठ की दिव्यता को महसूस करना सुखद अनुभव प्रदान करता है। इस शक्तिपीठ के बारें में और अधिक विस्तार से जानते हैं इस आर्टिकल में। 

समस्त शक्तिपीठो से जुड़ा पौराणिक इतिहास 

राजा दक्ष ने अपने यज्ञ समारोह में जब समस्त देवी देवताओ को आमंत्रित किया और अपनी पुत्री सती व जामाता भगवान शिव को नहीं बुलाया तो देवी सती को इस बात का बुरा लगा और वे इस बात का कारण जानने के लिए बिना बुलाए ही अकेले दक्ष के यज्ञ समारोह में पहुंच गईं। जहां उन्हें भगवान शिव के प्रति घनघोर अपमान का सामना करना पड़ा। इस बात से आहत सती ने उसी यज्ञ अग्नि में छलांग लगा दी और अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। 

इस घटना से जैसे सृष्टि में प्रलय आ गई, भगवान शिव अत्यधिक क्रोधित होकर देवी सती का मृत शव लेकर तांडव नृत्य करते हुए समस्त संसार का भ्रमण करने लगे। भगवान विष्णु ने कल्याण की दृष्टि से अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के मृत शरीर को 51 भागों में विभाजित कर भारतीय उपमहाद्वीप में गिरा दिया। देवी सती के ये अंग या आभूषण जहां भी गिरे वहां किसी मुख्य देवी का प्रादुर्भाव हुआ और दिव्य 51 शक्तिपीठों की स्थापना हुई। प्रत्येक शक्तिपीठ में पुरूष तत्व संरक्षक के रूप में भगवान शिव के अवतार भैरव बाबा की स्थापना है, जिन्हें प्रत्येक शक्तिपीठ में अलग अलग नामों से जाना जाता है। 

दाक्षायनी शक्तिपीठ की उत्पत्ति से जुड़ी ऐतिहासिक कहानी 

भगवान विष्णु ने जब देवी सती के मृत शरीर को विभाजित कर गिराना शुरू कर दिया, तब इनका दायां हाथ कैलाश मानसरेवर में इस स्थान पर गिरने से यहां दाक्षायनी शक्तिपीठ का उदय हुआ, इसे मनसा शक्तिपीठ नाम से भी जानते हैं। पौराणिक ग्रंथों में भी कैलाश मानसरोवर की यात्रा को अत्यधिक पवित्र और विशेष माना जाता है। जहां कैलाश को तो भगवान शिव को सिंहासन भी कहते हैं। कहते हैं कि कैलाश मानसरोवर झील में स्नान करने से आरोग्य प्राप्त होता है। शिखर की परिक्रमा करने से पीढियों तक में किए गए पापों से भी मुक्ति मिल जाती है। 

कैलाश पर्वत की खोज के बारें मे कहा जाता है कि राजा गुरलामांधाता ने की थी। इसी वजह से सबसे हाइेस्ट चोटी को गुरूला अथवा मामोनानी रखा गया। इस पर्वत के निर्माण की आयु लगभग 30 मिलियन वर्ष है। विष्णु पुराण की बात करें तो लगभग 200 ईसा पहले ही बताया गया है कि किस तरह दुनिया सात महाद्वीपों से बनी हैं जिनके पास सात महाद्वीप है। अगर इसके केंद्र की बात करें तो कैलाश पर्वत इसका केंद्र बिन्दु है। इस स्थान को भगवान ब्रह्मा के हंस या हंस के निवास स्थान के रूप में भी जाना जाता है। 

दाक्षायनी मंदिर की वास्तुकला एवं संस्कृति

इस शक्तिपीठ में देवी की आराधना दाक्षायनी रूप में की जाती है। कैलाश मानसरोवर जिसे भगवान शिव के निवास स्थान के रूप में जाना जाता है, देवी के शक्तिपीठ होने की वजह से यह स्थान शाक्त सपं्रदाय के अनुयायियों के लिए भी महत्व रखता है। कैलाश पर्वत की चोटी की महिमा विशेष है। दाक्षायनी मंदिर की बात करें तो यहां कोई मंदिर या मूर्ति नहीं है, बल्कि केवल एक भव्य विशाल शिलाखंड है जिसकी अर्चना पूजा की जाती है। कैलाश पर्वत को विश्व की धुरी भी कहा जाता है जिसके चारों ओर देवताओं ने इस सृष्टि की रचना की है। कैलाश पर्वत से एशिया की कुछ सबसे ज्यादा लंबाई वाली और पावन नदियों के उद्गम स्थल निकट ही है। 

दाक्षायनी शक्तिपीठ में मंदिर दर्शन समय 

  • सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे तक 

दाक्षायनी शक्तिपीठ में मनाए जाने वाले व्रत, उत्सव, अनुष्ठान एवं त्यौहार

दुर्गा पूजाः आश्विन मास में आने वाली नवरात्रि की पंचमी तिथि से लेकर नवमी तिथि तक दुर्गा पूजा का विशाल आयोजन किया जाता है। जो सितम्बर या अक्टूबर में आती है। इन दिनों मां की विशेष उपासना साधना करने का नियम और सबसे अच्छा समय बताया जाता है। विशाल तैयारी और भव्यता देखने लायक होती है।

चैत्र नवरात्रिः चैत्र मास यानी मार्च अप्रैल में आने वाला नवरात्रि पर्व नौ दिनो का सामूहिक आयोजन होता है जिसमें मां की आरती, भोग, प्रसाद और भिन्न भिन्न प्रकार की वस्तुएं इन्हें अर्पित की जाती है। कहते हैं मां को श्रृंगार का सामान सबसे ज्यादा पसंद होता है। इन दिनों यहां की धूम देखने लायक होती है। हर तरफ संपन्नता और खुशहाली का संदेश प्रसारित करता नवरात्रि पर्व माता दाक्षायनी का विशेष त्यौहार है जब यहां की छटा और ज्यादा बढ जाती है। 

महाशिवरात्रिः कैलाश पर्वत भगवान शिव का प्रिय स्थान है जिसकी रौनक महाशिवरात्रि पर्व पर बहुत ही ज्यादा खुशनुमा होती है। भव्य मेले दिव्य अभिषेक और पूजा आराधना से भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उनके भक्त तन मन से उनका ध्यान करते हैं। महाशिवरात्रि फरवरी या मार्च में आना वाला सर्वाधिक प्रमुख त्यौहार है, जिसके बारें में कई पौराणिक कहानियां सुनने को मिलती है।

दाक्षायनी शक्तिपीठ से जुड़े रोचक तथ्य

दाक्षायनी शक्तिपीठ को मनसा शक्तिपीठ भी कहते हैं क्योंकि देवी मां भक्तो के मन की सारी बात समझती है और उनकी इच्छाओं को पूरा भी करती हैं इसीलिए यह शक्तिपीठ मनसा शक्तिपीठ भी कहलाता है। 

कैलाश पर्वत सिर्फ हिंदूओं के लिए ही नहीं बल्कि बौद्ध और जैन धर्म के अनुयायियों के लिए भी विशेष पूज्य स्थान माना जाता है। 

कर्नाटक के प्रसिद्ध सिद्ध संत श्री स्वामी कालेश्वर का कहना है कि भगवान शिव ने अपने पवित्र त्रिशूल और डमरू को स्वयं ही मानसरोवर झील की गहाराई में छिपा दिया है, इससे इस क्षेत्र की आध्यात्मिक और सकरात्मक ऊर्जा के साथ ही यहां का समग्र प्रभाव बहुत प्रभावशाली है। 

मानसरोवर झील की उत्पत्ति के बारें में बताया जाता है कि बहुत समय पहले ब्रह्मा ने अपने तपस्या कर रहे पुत्रों की सुविधा के लिए इस झील का निर्माण किया था जहां उनके तपस्वी पुत्र कैलाश पर्वत पर तपस्या करने से पहले स्नान किया करते थे। 

मानसरोवर झील के जल में उपचारात्मक शक्तियां हैं जिसे स्पर्श करने से रोग और व्याधियां ठीक होती हैं। 

मानसरोवर झील का जल गंगा नदी की तरह समस्त पापों को नष्ट करने वाला जल है जिससे तन और मन पवित्र होते हैं। 

दाक्षायनी शक्तिपीठ के आसपास घूमने वाले स्थान 

गौरीकुंडः उत्तप्रराखंड के पिथौरागढ जिले में स्थित पवित्र कुंड जो कैलाश मानसरोवर यात्रा के पास ही स्थित है। इस कुंड को गौरीकुंड कहने के पीछे कारण है कि यह माता पार्वती का निवास स्थान माना जाता है। प्राकृतिक खूबसूरती को और भी ज्यादा बढाता यह स्थान समुद्री तल से करीब 3,600 मीटर की ऊंचाई पर है, जो लगभग 50 मीटर लंबा और 30 मीटर चौड़ा है। इस कुंड का स्वच्छ पानी और नीला रंग आकर्षित करता है। गौरीकुंड से जुड़ी एक पौराणिक कहानी सुनने को मिलती है- जो माता पार्वती और पुत्र गणेश से जुड़ी है, जब भगवान गणेश के अंदर जाने को लेकर कई बार मना करने से भगवान शिव ने गणेश जी के सिर को धड़ से अलग कर दिया था। और भूल का एहसास होने पर भगवान गणेश को हाथी का सिर जोड़ा था। इस घटना का साक्षी यह स्थान बेहद शांत और सुरम्य वातावरण का निर्माण करता है। 

राक्षस तालः कुछ लोग इसे राकस ताल भी कहते हैं जो तिब्बत में स्थित विशाल झील है जो कैलाश मानसरोवर पर्वत के पास उसके पश्चिम दिशा में अवस्थित है। यह ताल अपने नाम के अनुरूप किसी भी धर्म यानी हिंदू और बौद्ध लोगों के लिए पवित्र और पूजनीय नहीं माना जाता है। लगभग 225 वर्ग किमी क्षेत्रफल में बना यह ताल लगभग 84 वर्ग किमी की परिधि में मौजूद है। आश्चर्य की बात है कि इस ताल में कोई जलीय जीव या मछली भी नही ंपाई जाती है क्योंकि इसका पानी खारा है और मानसरोवर झील का पानी मीठा है। 

नंदी पर्वतः नदी पर्वत उत्तराखंड राज्य के पिथौरागढ में स्थित पर्वतीय स्थान है जो भगवान शिव के वाहन नंदी बैल का निवास स्थान माना जाता है। जो समुद्र तल से करीब 5500 मीटर की ऊंचाई पर है। हैरानी की बात है कि इसका आकार भी एक बैल जैसा है। 

दाक्षायनी शक्तिपीठ कैसे पहुंचे 

हवाई मार्ग से 

  • कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए नजदीकी हवाई अड्डा जम्मू है। 

रेल मार्ग से

  • रेल मार्ग उपलब्ध नहीं है।

सड़क मार्ग से 

  • आप यदि दिल्ली से सड़क मार्ग से कैलाश मानसरोवर तक जाना चाहते हैं तो आप कार से जा सकते हैं। उत्तराखंड से धारचूला, तवाघाट, लिपुलेख दर्रा और जोहार घाटियों को पार करते हुए कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जा सकते हैं। कैलाश मानसरोवर की यात्रा में पैदल बहुत चलना पड़ता है, यहां की यात्रा कुमाऊं से शुरू होती है जो 24 दिनों तक चलती है। इस यात्रा के दौरान आप नारायण आश्रम और पाताल भुवनेश्वर जैसी जगहों का भ्रमण भी कर सकते हैं। 

दाक्षायनी शक्तिपीठ यात्रा में अपनाने योग्य सावधानियां 

दाक्षायनी शक्तिपीठ कैलाश मानसरोवर झील के पास देवी की आराधना का स्थान है जहां जाने से पहले कुछ विशेष बातों का ख़्याल रखना जरूरी है। 

कैलाश मानसरोवर यात्रा परमिटः कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए यात्रा परमिट होना बहुत जरूरी है बिना इसके आप यात्रा नहीं कर सकते हैं। 

वैध भारतीय पासपोर्टः कैलाश मानसरोवर की यात्रा सिर्फ भारतीय सिटीजन के लिए ही अनुमन्य है इसलिए आपके पास लीगल इंडियन पासपोर्ट होना अति आवश्यक है।

स्वास्थ्यः पहले स्वास्थ्य का ध्यान रखें और सेहतमंद होने के साथ ही यात्रा आरंभ करें क्योंकि यह कोई आसान यात्रा नहीं है

पैकिंग सुझावः जलवायु परिवर्तन तेजी से होने के साथ आपको समस्या का सामना न करना पड़े इसलिए मौसम की अपेक्षा कपड़ों और अन्य एसेसरीज का ध्यान रखें। 

निष्कर्ष 

दाक्षायनी शक्तिपीठ, जिसे मनसा शक्तिपीठ भी कहा जाता है। आध्यात्मिक सुख शांति के चरमोत्कर्ष को प्रदान करता यह स्थान वेदों पुराणों और ग्रंथों में सर्वोच्च स्थान रखता है। दाक्षायनी शक्तिपीठ की धार्मिक यात्रा मानव जीवन में विशेष है, जहां ईश्वर की उपस्थिति का साक्षात् प्रमाण मिलता है। कैलाश मानसरोवर यात्रा भले ही अल्प समय के लिए होती हो लेकिन इसको करने की लालसा कई वर्षोंं पुरानी होती है। यह तब ही पूरी होती है जब स्वयं दैवीय कृपा और आशीर्वाद प्राप्त हो। 

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