- Nov 13, 2025
पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित आध्यात्मिक और धार्मिक रूप से समृद्धशाली सैंथिया शहर में नंदिकेश्वरी शक्ति पीठ ऊर्जा के सर्वोच्च रूपों के प्रतीक रूप में स्थापित है जहां स्त्री के शक्तिशाली पक्ष की झलक मिलती है। देवी सती के ऐतिहासिक 51 शक्तिपीठों में से एक इस स्थान पर माता सती के आभूषण गले के हार का अवतरण हुआ था, तभी से यह मंदिर नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है। विस्तार से जानते हैं इस शक्तिपीठ के बारें मे
समस्त शक्तिपीठों से जुड़ी पौराणिक कथा
भगवान शिव और देवी सती का विवाह होने से देवी सती के पिता प्रजापति दक्ष बिल्कुल भी खुश नहीं थे, क्योंकि उनकों लगता था कि भगवान शिव वैरागी प्रकृति के हैं। इस बात से नाराज़ होकर जब प्रजापति दक्ष ने अपने यहां विशाल यज्ञ समारोह का अनुष्ठान किया तो संसार के सभी देवी देवताओं को तो बुलाया लेकिन देवी सती और भगवान शिव को निमंत्रण नही दिया। इस बात से दुखी सती बिना बुलाए ही कारण जानने के लिए यज्ञ समारोह में चली गईं। वहां उन्हें घोर अपमान और निराशा का सामना करते हुए भगवान शिव के प्रति अनर्गल बातें सुननी पड़ी। इस घटना से आहत सती ने कड़ा कदम उठाते हुए यज्ञ कुंड की अग्नि में अपने प्राणों का त्याग कर दिया।
सती की मृत्यु की खबर पाकर भगवान शिव की क्रोधाग्नि चरम पर थी। वे इसी अवस्था में देवी सती के मृत शव को लेकर तांडव करने लगे। सृष्टि के कल्याण के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शरीर को कई भागों मे विभाजित कर दिया और भारतीय उपमहाद्वीप में बिखेर दिया। विभिन्न जगहो पर देवी सती के अंग, आभूषण या वस्त्र गिरने से वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई जिनकी रक्षा स्वयं महादेव अपने भैरव स्वरूप में करते हैं इसलिए प्रत्येक शक्तिपीठ में भगवान शिव के अंश भैरव भगवान की उपस्थिति देखने को मिलती है।
नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ की उत्पत्ति से जुड़ी ऐतिहासिक कहानी
नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ का नाम नंदिकेश्वरी भगवान शिव के वाहन बैल नंदी पर रखा गया है। नंदिकेश्वरी का अर्थ है ‘नंदी की देवी’ जो माता भगवती और दिव्य वाहन नंदी के आत्मिक व गहरे संबंध को दर्शाता है। जो भक्त और भगवान के अटूट प्रेम और विश्वास को भी दर्शाता है। शक्ति का पर्याय देवी का सम्मान करता यह शक्तिपीठ रवींद्रनाथ टैगोर के आश्रम शांतिनिकेतन के निकट ही है। मयूराक्षी नदी के किनारे पर बसा यह स्थान आधुनिक रूप से सन् 1913 में बनवाया गया था।
नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ की वास्तुकला एवं संस्कृति
नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ में मूर्ति काले पत्थर की है जो वर्तमान में लगभग लाल हो गई है। इसका कारण है कि यहां इनकी पूजा मूर्ति पर सिंदूर लगाकर की जाती है। मैया नंदिकेश्वरी की प्रतिमा चांदी के मुकुट और तीन स्वर्ण नेत्रों से शोभाएमान है। इस शक्तिपीठ में और भी कई मंदिर है जैसे राम सीता मंदिर, शिव मंदिर, महासरस्वती, महालक्ष्मी-गणेश मंदिर, राधा गोविंद मंदिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर, हनुमान जी का मंदिर और भैरव रूप में भैरव नंदिकेश्वरी मंदिर स्थापित है। मंदिर में विशाल बरगद का पेड़ स्थापित है, जिसके बारें मे मान्यता है कि इसमे मन्नत मांगने के लिए इस पर लाल और पीले धागों को बांधते हैं।
इस मंदिर की बनावट साधारण लेकिन दिव्यता से भरपूर है जो अपनी पवित्रता और आध्यात्मिकता से शक्ति के सजीव अवतरण को साकार करता हुआ जीवंत अनुभव प्रदान करता है। देवी को सिंदूर, फूल और चूड़ियां अर्पित की जाती हैं।
नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ में दर्शन समय
- प्रातःकालीन खुलने का समयः सुबह 6 बजे
- रात्रिकालीन मंदिर बंद होने का समय रात 8 बजे
नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ में मनाए जाने वाले उत्सव व्रत और अनुष्ठान
नवरात्रिः नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ में देवी का नौ दिवसीय अनुष्ठान बेहद श्रद्धा और भव्यता के साथ संपन्न किया जाता है। हवन, पूजा पाठ, जागरण और कीर्तन भजन कर मैया को प्रसन्न किया जाता है।
दीपावलीः अक्टूबर या नवम्बर में मनाई जाने वाली दीवाली पर्व पश्चिम बंगाल में काली पूजा के रूप मे मनाया जाता है जिसमें रात्रि जागरण कर मां की पूजा अर्चना की जाती है। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ में दीवाली के समय जगमग करते दीपों की कतारें और विशेष पूजाएं इस पर्व की रौनक को और भी ज्यादा बढा देती हैं।
दुर्गा पूजाः आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में मनाया जाने वाला नवरात्रि त्यौहार इस शक्तिपीठ में बेहद श्रद्धा भाव के साथ मनाया जाता है। नौ दिवसीय शारदीय नवरात्रि पर्व से सुशोभित यह शक्तिपीठ इस समय अपनी ऊर्जा के उच्च स्तर पर होता है।
दशहराः शारदीय नवरात्रि के नवे या दसवें दिन दशहरे पर्व का आयोजन यहां बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। इस त्यौहार पर यहां भव्य मेला लगता है। जिसमें भक्तो की भारी भीड़ देखने को मिलती है।
राम नवमीः चैत्र नवरात्रि की नवमी तिथि को भगवान राम का जन्मोत्सव मनाया जाता है। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ में मौजूद राम सीता मंदिर में इस दिन पुष्पों की भव्य सजावट और स्वादिष्ट भोग को अर्पित किया जाता है।
महाशिवरात्रिः फरवरी या मार्च में मनाया जाने वाला यह त्यौहार भगवान शिव के सबसे प्रमुख त्यौहारों में से एक है। इस दिन भक्तगण भोर से ही भगवान शंकर को पंचामृत से अभिषेक करते हैं। गुणगान, भजन कीर्तन और जयकारों से पूरा वातावरण गुंजाएमान रहता है। महाशिवरात्रि पर नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ में भव्य उत्सव का आयोजन किया जाता है।
नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ से जुड़े रोचक तथ्य
इस शक्तिपीठ में मां सती के गले का हार गिरा था इसके अलावा इस शक्तिपीठ का नाम भगवान शिव के वाहन नंदी बैल पर रखा गया है।
नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ में मनोकामना पूर्ति के लिए प्राचीन बरगद के पेड़ पर मन्नत का लाल या पीला धागा बांधते हैं।
नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ में मां नंदिकेश्वरी को श्रृंगार का सामान अर्पित करने की परंपरा है जो आसानी से मंदिर के बाहर मिल जाता है।
नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ के आसपास घूमने वाले स्थान
तारापीठः पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के रामपुरहाट के पास यह छोटा सा मंदिर है जो अपनी विशेषताओं की वजह से खासा आकर्षित करता है। मुख्य रूप से यह मंदिर अपनी तांत्रिक प्रतिष्ठा और निकट में ही स्थित महाश्मशान के लिए विश्व प्रसिद्ध है। तारापीठ मां तारा को समर्पित मंदिर है जो मुख्य रूप से तांत्रिकांं की देवी कहलाती हैं। तारापीठ के साधक बामाखेपा अवधूत या पागल संत के नाम से प्रसिद्ध रहें हैं जिनका पूरा जीवन मां तारा की पूजा में और निवास श्मशान में रहा है। तारा शक्तिपीठ की गिनती देवी सती के 51 शक्तिपीठों में होती है। मुख्य रूप से देवी तारा मां काली का प्रतिविम्ब प्रतीत होती हैं।
कंकालीतालाः कंकालीताला भी देवी के 51 शक्तिपीठों में स्थान रखता है। यह वह स्थान है जहां मां सती का कंकाल गिरा था। मंदिर को देवगर्भा और महादेव के भैरव स्वरूप को रूरू कहा जाता है। कोपाई नदी के तट पर स्थित यह मंदिर नबनी दास बाउल का स्थान है जो खियापा बाउल के नाम से भी मशहूर है, इन्होनें इस क्षेत्र में अपनी साधना की थी जो अवधूत भी कहलाए। देवी की प्रतिमा किसी के कंकाल की तरह ही प्रतीत भी होती है।
फुलारा शक्तिपीठः बीरभूम जिले के मध्य में स्थित लाभपुर बोलपुर उपखंड में स्थित है जिसकी गिनती देवी के 51 शक्तिपीठों में शुमार है। यह मंदिर दैवीय शक्तिपीठ होने के साथ ही अपनी चिकित्सीय और उपचारात्मक शक्तियों के लिए जाना जाता है। फुलारा माता भक्तो की कई तरह की शारीरिक और मानसिक बीमारियों से राहत प्रदान करती हैं। फुलारा माता का यह स्थान लाभपुर में है जहां दलदली झील के कारण भी यह पर्यटकों को आकर्षित करता है। फुलारा शक्तिपीठ में हर साल लगने वाला वार्षिक मेला बहुत प्रसिद्ध है, जो माघ पूर्णिमा के दौरान लगातार 10 दिनों तक लगता है। मेले में भक्त मां की विशेष कृपा और आध्यात्मिक संपन्नता पाने के लिए उनकी आराधना करने के उद्देश्य से मंदिर जाते हैं। इसके अलावा भक्ति संगीत, विभिन्न तरह के स्वादिष्ट व्यंजन और पांरपरिक रीति रिवाजों की उत्कृष्ट झलक देख सकते हैं।
शांतिनिकेतनः रवींद्रनाथ टैगोर का यह आश्रम बेहद शांति और सुकून प्रदान करता गहन चिंतन करने योग्य स्थान है जिसकी शीतल छांव में मन शांत और सुख की अनुभूति करता है। इस आश्रम की स्थापना रवींद्रनाथ टैगोर के पिता देवेंद्र नाथ टैगोर ने की थी।
एकचक्रा धामः पश्चिम बंगाल के बीरभूम के सुरम्य जिले में स्थित एकचक्रा धाम अपनी भव्य बनावट और नाम से ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है। यह स्थान महाभारत महाकाव्य के अनुसार पांडवों से जुड़ा हुआ स्थान है, जहां उन्होंने अपने वनवास काल का महत्वपूर्ण समय बिताया था। एकचक्रा का अर्थ है एक पहिया से है जिसके पीछे कहानी है कि इस स्थान पर पांडव भीम ने बकासुर राक्षस का अंत किया था। भगवान कृष्ण को समर्पित यह मंदिर पवित्र झील की शोभा के साथ और भी ज्यादा सुंदर प्रतीत होता है। एकादशी और जन्माष्टमी तिथि पर यहां विशेष आकर्षण देखने को मिलता है।
मामा भगाने पहाड़ः बीरभूम जिले के धरती पर प्राकृतिक खूबसूरती को दर्शाते मामा भगाने पहाड़ किसी आश्चर्य से कम नहीं है। यह स्थान ऊंचाई पर स्थित होने के साथ ही गोलाकार चट्टान के दूसरे पर स्थित होने से असामान्य तरह से अपने संतुलन बनाने के लिए पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करती है। भू वैज्ञानिकों के लिए यह स्थान बेहद खास है जो इनके बारें में रिसर्च कर इसके पौराणिक महत्व को भी उजागर करते हैं।
नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ कैसे पहुंचे
हवाई मार्ग से
- नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ के नजदीक में नेताजी सुभाष चंद्र बोस इंटरनेशनल एयरपोर्ट है जो इस शक्तिपीठ से करीब 220 किमी दूरी पर हैं। एयरपोर्ट से सड़क मार्ग के माध्यम से इस शक्तिपीठ की दूरी तय कर पहुंच सकते हैं।
रेल मार्ग से
- नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ से कुछ दूरी पर रेल मार्ग के माध्यम से पहुंचने के लिए नजदीकी रेलवे स्टेशन सैंथिया जंक्शन है जहां से आप स्थानीय वाहनों की मदद से मंदिर की यात्रा संपन्न कर सकते हैं।
सड़क मार्ग से
- सैंथिया में स्थित नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ पहुंचने के लिए सड़क की स्थिति बेहतर है जहां आप कोलकाता या आसपास के राज्यों से अपनी कार या सार्वजनिक परिवहन के माध्यम से मंदिर पहुंच सकते हैं। सैंथिया राष्ट्रीय राजमार्ग 114 पर स्थित है।
निष्कर्ष
नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल का प्रसिद्ध शक्तिपीठ है जहां भक्तों की मनोकामनाएं मां नंदिकेश्वरी अवश्य पूरी करती हैं। सादगी और संपन्नता का अनोखा मेल जाहिर करता यह दिव्य शक्तिपीठ अपने आप में बेहद खास है जहां बह रही मयूराक्षी नदी की शोभा इस मंदिर को और भी ज्यादा वैभवशाली बनाती है। भगवान शिव के वाहन नंदी की देवी के रूप मे ंशोभनीय मां नंदिकेश्वरी श्रेष्ठ धार्मिकता और कुदरत की नैसर्गिक सुंदरता के साथ पारंपरिक रीति रिवाजों और आस्थाओं का साक्षात् प्रमाण प्रस्तुत करती हुई गहन केंद्रीय अनुभव प्रदान करती हैं।
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