- Dec 29, 2025
देवी भगवती के पवित्र पावन और शक्तिशाली ऊर्जा के स्त्रोत में प्रसिद्ध यह शक्तिपीठ मध्यप्रदेश के अमरकंटक में स्थित है जहां मां नर्मदा रूप में इनकी स्तुति और वंदना की जाती है। प्राकृतिक विहंगम दृश्यों से शोभाएमान यह क्षेत्र सतपुड़ा और विंध्य पर्वतमाला की लहराती पहाड़ियों और घाटियों के मनोरम परिदृश्यों और नीचे बहती सोन नदी की शानदार प्रवाह से तन मन को भाव विभोर करता यह दिव्य तीर्थस्थल देवी सती के 51 शक्तिपीठों में से एक है। आइए, मां नर्मदा शक्तिपीठ के बारें में विस्तार से चर्चा करते हैं।
समस्त शक्तिपीठों से जुड़ी पौराणिक कथा
देवी सती प्रजापति दक्ष की पुत्री थी जिन्होंने भगवान शंकर से अपनी इच्छानुसार विवाह किया था। भगवान शंकर राजसी भोगों से विरक्त रहते थे इसलिए प्रजापति दक्ष उन्हें नापसंद करते थे। एक बार प्रजापति दक्ष ने विशाल यज्ञ समारोह का आयोजन कराया जिसमें संसार के समस्त देवी देवताओं को बुलाया लेकिन भगवान श्ांकर और पुत्री सती को निमंत्रण नहीं भेजा। इस बात से दुखी सती कारण जानने के लिए जब यज्ञ समारोह में बिना बुलाए ही पहुंच गईं तब उन्हे वहां तिरस्कार और अपमान होने के साथ ही अपने पति भगवान शंकर के लिए अपशब्द सुनने पड़े जो उनके लिए असहनीय थे। इस घटना से आहत देवी सती ने यज्ञ कुंड में बैठकर अपने प्राणों की आहुति देकर जीवनलीला समाप्त कर ली।
इस बात के बारें मे जब भगवान शिव को पता चला तो उनके क्रोध की सीमा नही रही और देवी सती के शव को लेकर उन्होंने तांडवीय नृत्य करना शुरू कर दिया। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के मृत शरीर को कई भागों में विभाजित कर भारतीय उपमहाद्वीप में बिखेर दिया। जहां भी देवी सती के अंग, आभूषण या वस़्त्र गिरे वहां पर देवी शक्तिपीठों की भव्य स्थापना हुई। प्रत्येक शक्तिपीठ में महादेव का भैरव स्वरूप विराजमान है जो इन शक्तिपीठों के संरक्षक की तरह प्रतिष्ठित हैं।
मां नर्मदा शक्तिपीठ की उत्पत्ति से जुड़ी ऐतिहासिक कहानी
नर्मदा शक्तिपीठ लगभग 6000 साल पुराना है जहां मां भगवती देवी नर्मदा के नाम से जानी जाती हैं और भगवान शिव को बदरसेन, भद्रसेन या वादरसेन कहा जाता है। देवी अमरकंटक क्षेत्र में अवस्थित जिसका संस्कृत में अर्थ अमर और कंटक यानी बाधा से है, अर्थात् जहां बाधाओं से मुक्ति और मोक्ष रूपी अमरता प्राप्त होती है। ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना 10वीं शताब्दी ईस्वी में हुई थी। सफेद संगमरमर और उच्च शिखर के साथ इस मंदिर से जुड़ी एक और कथा सुनने को मिलती है।
जब भगवान शिव ने तीन नगरों को नष्ट किया तब कुछ राख कैलाश पर, कुछ अमरकंटक क्षेत्र पर गिरी और बची हुई राख को भगवान ने स्वर्ग मे ंसुरक्षित कर लिया। मान्यता है कि अमरकंटक में जो राख गिरी, वो राख करोड़ों शिवलिंगों में परिवर्तित हो गई लेकिन यहां ज्वालेश्वर में हम सिर्फ एक ही शिवलिंग के दर्शन कर पाते हैं। ऐसा कहते हैं कि पवित्र राख के कारण ही जो भक्त नर्मदा मंदिर में प्रवेश करते हैं, उनका तन-मन भौतिक ओर आध्यात्मिक रूप से शुद्ध व पवित्र हो जाता है।
नर्मदा मंदिर के पास से ही नर्मदा नदी का उद्गम हुआ है। जिसे हिंदू पौराणिक कथाओं में इस नदी के निर्माण को लेकर कहा जाता है कि यह भगवान शिव के त्रिशूल से पर्वतों को भेदकर इसे बनाया गया है।
मां नर्मदा शक्तिपीठ की वास्तुकला एवं संस्कृति
इस मंदिर का निर्माण मध्य भारत के चंदेल शासकों द्वारा कराया गया है। समय के साथ इस मंदिर में कई बार जीर्णोद्धार और मरम्मत कार्य हुए है। स्थापत्य कला का शानदार प्रदर्शन करते इस मंदिर की दावारें, स्तम्भ जटिल नक्काशी, प्रतिमाओं और अलंकृत सजावट की विशेषताएं आकर्षित करती है।
शक्तिपीठ का निर्माण श्वेत पत्थरों से हुआ है जो चारों ओर से तालाब से घिरा हुआ बेहद शानदार दृश्य प्रदान करते हैं। श्वेत रंग से सजे इस शक्तिपीठ में मा नर्मदा के मुख्य मंदिर के अलावा कई और भी मंदिर है जिनमे अ्रन्य देवी देवताओ के दर्शन होते हैं। श्वेत रंग से दीप्तिमान मंदिर परिसर उत्तर भारतीय शैली लिए विहंगम नजारों से विशेष प्रतीत होता है। मंदिर गुंबदनुमा बने हुए हैं जिसमें उच्च शिखरों पर कलश स्थापित होने के साथ ही पताका फहरा रही हैं। देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक इस स्थान पर माता सती का वक्ष गिरा था।
मंदिर परिसर के मध्य में मुख्य देवी नर्मदा का मंदिर स्थापित है जिसमें मां नर्मदा की प्रतिमा स्वर्ण मुकुट धारण किए हुए हैं और इनके दोनों ओर कई और देवियों की स्थापना देखने को मिलती है। मां नर्मदा जिस मंच पर विराजमान है, वह चांदी से बना हुआ है।
मां नर्मदा शक्तिपीठ का दर्शन समय
मां नर्मदा शक्तिपीठ वर्ष भर दर्शनो के लिए खुला रहता है जहां मंदिर के खुलने और बंद होने का समय इस प्रकार है
प्रातःकालीन दर्शन समयः सुबह 6 बजे से दोपहर 12 बजे तक
संध्याकालीन दर्शन समयः शाम 4 बजे से रात 8 बजे तक
मां नर्मदा शक्तिपीठ में मनाए जाने वाले उत्सव, व्रत और अनुष्ठान
चैत्र नवरात्रिः मार्च या अप्रैल में मनाया जाने वाला पर्व नवरात्रि देवी भगवती का नौ दिवसीय विशेष अनुष्ठान की तरह मनाया जाता है। इस दौरान मैया की पूजा अर्चना साधना और आराधना बहुत ही श्रद्धा और भक्ति भाव से की जाती है। हवन, रात्रि जागरण और भजन संध्या से मैया नर्मदा को मनाया जाता है।
महाशिवरात्रिः भगवान शिव के भद्रेश्वर स्वरूप की पूजा महाशिवरात्रि के दिन बहुत भक्ति भाव के साथ की जाती है। बोल बम के जयकारों से गुंजाएमान वातावरण और महादेव के भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है जहां रात्रि में भी भगवान शिव की पूजा अर्चना की जाती है। महाशिवरात्रि पर भव्य मेला लगता है, जिसमें बड़ी दूर से लोग शामिल होते हैं।
दुर्गा पूजाः आश्विन मास यानी सितम्बर अक्टूबर में आने वाला यह पर्व देवी भगवती के प्रिय त्यौहारों में से एक है। इन नौ दिनों में देवी नर्मदा की दिव्य साधना और भक्ति करने का आनंद ही विशेष होता है। विशाल मेले, दिन-रात होने वाली साधना मन मस्तिष्क में देवी मां के प्रति अनूठी श्रद्धा और भक्ति को और भी ज्यादा बढा देते हैं।
सोमवती अमावस्याः वर्ष में जो भी अमावस्या तिथि सोमवार के दिन आती है उसे सोमवती अमावस्या कहते हैं। इस दिन मां नर्मदा के मंदिर की परिक्रमा करना और भगवान शिव पर जल अर्पित करना श्रेष्ठ और शुभ फलदायी माना जाता है।
शरद पूर्णिमाः आश्विन पूर्णिमासी या कोजागरी तिथि से मशहूर यह दिन और भी कई सारे नामों से जाना जाता हे। इस दिन की मान्यता है कि आज की रात्रि में धरती पर अमृत की बूदे गिरती है। जिसकी झिलमिल रौनक इस मंदिर की छवि को और भी ज्यादा रोशनी से बिखेर देती है। इस दिन यहां दर्शन करना आकर्षक एहसास प्रदान करता है।
दीपावलीः कार्तिक मास की अमावस्या वर्ष की सबसे बड़ी अमावस्या होती है जब प्रज्वलित दीपों की कतारों से वातावरण और भी ज्यादा आकर्षक और दीप्तिमान हो जाता है। नर्मदा शक्तिपीठ में दीपावली की शोभा बेहद खास और भव्यता प्रदान करती है।
राम नवमीः चैत्र नवरात्रि के नवें दिन भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव मनाया जाता है। इस दिन शंख घड़ियाल और घंटों से भगवान राम की आरती और भोग समर्पित किया जाता है। राम नवमी को भगवान राम और उनकी वंदना करने से मन को शांति और सुकून प्राप्त होता है।
मां नर्मदा शक्तिपीठ से जुड़े रोचक तथ्य
नर्मदा शक्तिपीठ जिसे शोन्देश शक्तिपीठ के नाम से भी जानते हैं। शोन्देश बंगाली लोगों में एक पसंदीदा मिठाई कही जाती है, जो मां नर्मदा को बेहद पसंद है इसलिए इसे शोन्देश शक्तिपीठ के नाम से भी जानते हैं। शोन्देश मेवा और खोवे से बनी स्पेशल मिठाई होती है।
मां नर्मदा को यहां शोनाक्षी नाम से पूजा जाता है। शक्तिपीठो में भगवान शिव पाहनलिंग के रूप में अवतरित हुए हैं जो भक्तों का कल्याण करते हैं।
देवी सती के वक्ष गिरने से बना यह नर्मदा शक्तिपीठ शानदार व भव्य आदर्श प्रतीत होता है जिसकी छवि के साथ यहां बने कुंड की शोभा देखते बनती है।
अमरकंटक नर्मदा नदी के उद्गम के साथ ही सोन नदी के उद्गम के लिए भी जाना जाता है।
अमरकंटक के बारें में कहते हैं कि यहां भगवान निवास करते थे, लेकिन रूद्रगणों की बाधाओ से व्यथित हो गए थे।
मां नर्मदा शक्तिपीठ के आसपास घूमने वाले स्थान
कपिलधारा जलप्रपातः अमरकंटक में स्थित यह जलप्रपात नर्मदा नदी पर बना पहला है जहां कपिला और एरडी नदी भी नर्मदा नदी में मिल जाती है। लगभग 100 फीट की ऊचाई से गिरता यह झरना प्रसिद्ध ऋषि कपिल मुनि के नाम से जाना जाता है जिन्होनें इसी स्थान पर कई हजार वर्षों तक घोर तपस्या की थी और उन्हें यहां दिव्य पुंज प्राप्त हुआ था। कपिल मुनि ने गणित पर वैज्ञानिक ग्रंथ सांख्यदर्शन भी लिखा था। शाही पहाड़ियो, घने वनों और घाटियों के बीच स्थित यह झरना पर्यटकों को रिझाता है।
सोनमुंडा अमरकंटकः अमरकंटक के घने जंगलों के बीच स्थित यह स्थान सोनभ्रद नदी या सोन नदी का उद्गम स्थान है। सोन नदी और भद्रा तालाब से मिलकर बनी सोनभद्र यहीं से मिलकर बहते हैं। यही से एक पतली धारा आगे बढकर लगभग 300 फीट ऊंचे झरने का रूप ले लेती है। कई दार्शनिक यात्रियों के अनुसार सोन नदी में कभी सोने की धूल पाई जाती थी। घनी हरियाली और पेड़ों की भव्य ऊंचाई खूबसूरत लगती है।
श्री ज्वालेश्वर महादेव मंदिरः पुराणो में इस स्थान को महा रूद्र मेरू कहा गया है जो केवल दो ही जगह है, वाराणसी और अमरकंटक। कहते हैं इस स्थान पर स्वयं भगवान शिव ने शिवलिंग स्थापित की थी और मैकाल पर्वत पर करोड़ों अन्य शिवलिग भी बिखरे थे। अमरकंटक बस स्टैंड से यह करीब 9 किमी की दूरी पर स्थापित है।
मां नर्मदा शक्तिपीठ कैसे पहुंचे
हवाई मार्ग से
- अमरकंटक के इस शक्तिपीठ जाने के लिए सबसे प्रमुख और करीबी हवाई अड्डा जबलपुर में है जहां से आप कैब या बस के माध्यम से यहां पहुंच सकते हैं।
रेल मार्ग से
- अमरकंटक के सबसे नजदीक में अनूपपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन स्थित है, यहां से स्थानीय वाहनों से नर्मदा शक्तिपीठ की यात्रा संपन्न कर सकते हैं। पेंड्रा छत्तीसगढ का रेलवे स्टेशन है जिसकी अमरकंटक से दूरी करीब 17 किमी है।
सड़क मार्ग से
- मध्य प्रदेश के इस शक्तिपीठ में पहुंचने के लिए आप प्रमुख शहरों से आसानी से पहुंच सकते हैं जहां जबलपुर, शहडोल, उमरिया, अनूपपुर, पेंड्रां रोड या बिलासपुर नजदीकी शहरों से आसानी से इस मंदिर की सैर कर सकते हैं।
निष्कर्ष
नर्मदा शोण शक्तिपीठ अपनी दिव्य उपस्थिति और कलात्मक विशेषताओ के कारण अत्यधिक प्रसिद्ध है जो प्राकृतिक नजारो के बीच बसा अलौकिक दैवीय धाम है। मनमोहक परिदश्ृय और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम प्रदर्शित करता यह स्थान देवी भगवती के मुख्य स्थलों में से एक हैं। मां नर्मदा की ममतामयी प्रतिमा और अन्य देवी देवताओ की सूक्ष्म उपस्थिति से तनमन को प्रफुल्लित और सुख शांति प्रदान करता है।
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