• Jan 12, 2026

भगवान शिव की दिव्य उपस्थिति और देवभूमि उत्तराखंड की प्राकृतिक सुंदरता के पर्याय गढवाल हिमालय की शोभा श्रद्धालुओ को झंकृत करती हुई पंच केदार मंदिरों की अनोखी और पवित्रमय यात्रा पर ले जाती है। पंच केदार भगवान शिव के रूप का वर्णन करते हैं जिनमे उनकी आभामय मौजूदगी भक्तों को सुहावने मौसम के साथ आराधना और भक्ति के नए अध्यायों से परिचित कराती है। अगर आप भी पंच केदार यात्रा करने की प्लानिंग बना रहें हैं तो यहां हम आपको पंच केदार की आध्यात्मिक यात्रा से जुड़ी जरूरी जानकारियां प्रदान करेंगे जिससे आपकी पंच केदार यात्रा सुगम और सहज तरह से संपन्न हो जाएगी। 

पंच केदारः एक परिचय

पंच केदार गढवाल हिमालय में अवस्थित पांच पावन शिव मंदिरो को कहते हैं- केदारनाथ, तुंगनाथ, मध्यमहेश्वर, रूद्रनाथ और कल्पेश्वर। ये परम पुनीत स्थल गर्मियों की ऋतु में खुलते हैं और शीतकाल समय के आने पर इनके कपाट बंद हो जाते हैं क्योंकि भारी बर्फबारी, भूस्खलन और हिमपात की समस्या के रहते यहां पहुचंना असंभव हो जाता है। 

इनमें से चार मंदिरों के अलावा सिर्फ की ही मंदिर है जो वर्ष भर खुला रहता है। पंच केदारों में कल्पेश्वर मंदिर ही वर्ष भर खुला रहता है, जहां आप सर्दियों की ऋतु में भी दर्शन हेतु जा सकते हैं। 

पंच केदारों से जुड़ा पौराणिक उत्पत्ति इतिहास

पंच केदारों की पौराणिक उत्पत्ति के बारे में बताया जाता है कि इनकी अवस्थिति पांडवों से सबंधित है। इस क्षेत्र में भगवान शिव और पंच केदार मंदिरों से जुड़ी कई लोक कथाएं सुनने को मिलती है। 

पंच केदार के बारें में लोककथा हिंदू महाकाव्य महाभारत के नायक पांडवों से जु़ड़ी हुई इस प्रकार है जब पांडवों ने कुरूक्षेत्र युद्ध में कौरवों की मृत्यु के बाद उन पर भातृहत्या यानी गोत्रहत्या और ब्राहम्ण हत्या यानी पुरोहित वर्ग की हत्या से हुए पापों का प्रायश्चित करने के लिए प्रयासरत थे। तब भगवान श्रीकृष्ण की सलाह पर उन्होंने भगवान शिव की खोज और उनसे क्षमा मांगने के लिए चल पड़े। भगवान शिव को ढूंढते हुए वे पहले काशी पहुंचे जो उनका प्रिय शहर है। भगवान शिव पांडवों की परीक्षा लेने के लिए बैल यानी नंदी रूप धारण कर अन्तर्धान हो गए। 

वाराणसी में भगवान शिव को न देखकर पांडव गढवाल हिमालय चले गए। पांचों पांडवों ने उन्हें वहां ढूंढना शुरू कर दिया तब भीम ने उन्हें दो पहाड़ों के बीच खड़े होकर ढूंढना शुरू कर दिया। तब उन्हें गुप्तकाशी जिसे भगवान शिव के छिपे होने के कारण ही इस नाम से जाना जाता है, वहां भगवान शिव बैल रूप मे चरते हुए दिखाई दिए। जिन्हें भीम ने पहचान लिया, भीम ने बैल को उनकी पूंछ और पिछले पैरो से पकड़ लिया। लेकिन बैल रूप में भगवान शिव धरती में समा गए और केदार क्षेत्र के पांच स्थान पर अलग अलग बैल के अंगो के साथ प्रकट हुए। केदारनाथ में कूबड़, तुंगनाथ में भुजाएं, रूद्रनाथ में चेहरा, मध्यमहेश्वर में नाभि और कल्पेश्वर में बाल दिखाई दिए। इन्हीं पंच केदारों के निर्माण के बाद पांडवों ने केदारनाथ मे बैठकर शिव आराधना की और मोक्ष प्राप्त किया।

पंच केदारों में पांच केदार मंदिर इस प्रकार है।

1. केदारनाथ मंदिर (पहला पंचकेदार)ः मंदाकिनी नदी घाटी में स्थित केदारनाथ मंदिर को पंच केदार मंदिरों में से सबसे पहला स्थान माना जाता है, जिसकी गिनती चार धाम तीर्थयात्रा के संबंध में भी महत्वपूर्ण है। करीब 3,583 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह स्थान शंक्वाकार है जो भगवान शिव के कूबड़ का प्रतीक है। उत्तर भारतीय वास्तुकला की नागर शैली में निर्मित यह तीर्थस्थल प्रसिद्ध 12 ज्योतिर्लिंगो में से भी एक है, जिसे विश्व के 275 पाडल पेट्रा स्थलम मंदिरो में से सबसे ज्यादा प्रभावशाली और शक्तिसंपन्न माना जाता है। मंदिर अक्षय तृतीया तिथि, अप्रैल से लेकर कार्तिक पूर्णिमा, नवंबर तक खुला रहता है। सर्दियो के दिनों में यहां विशेष पूजा की जाती है। केदारनाथ का सर्वप्रथम जिक्र स्कंद पुराण में 7वीं और 8वीं शताब्दी में देखने को मिलता है। केदार का अर्थ उस स्थान से माना जाता है कि भगवान शिव ने अपनी जटाओं से पावनी गंगा नदी को छोड़ा था। यहां मंदिर जीर्णोद्धार निर्माण का कार्य 8वीं शताब्दी में आदि गुरू शंकराचार्य ने करवाया था। कहते हैं इस मंदिर को पांडवो द्वारा तैयार कराया गया था। केदारनाथ के मुख्य पुजारी को रावल और जगद्गुरू कहा जाता है। सर्दियों के दिनों में बर्फबारी के कारण जब मंदिर के मार्ग दुर्गम हो जाते है तब केदारनाथ भगवान की पवित्र प्रतीकात्मक शिव मूर्ति की पूजा उखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में की जाती है। 

2. मध्यमहेश्वर मंदिर (दूसरा पंचकेदार) : उत्तराखंड के गढवाल हिमालय के बीच रूद्रप्रयाग जिले में एक गांव गौंडार में स्थित है जो करीब 3,497 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है जो पंचकेदार तीर्थयात्रा सर्किट में दूसरे नंबर पर गिना जाता है। यहां भगवान शिव के मध्य या पेट या नाभि की पूजा संपन्न की जाती है। यहां पहुंचने के लिए अकटोलीधार या रांसी गांव से लगभग 16-18 किमी की ट्रेक के माध्यम से पहुंचा जा सकता है, जो रूद्रप्रयाग जिले में उखीमठ के पास ही है। इस मंदिर की वास्तुकला उत्तर भारतीय हिमालयी शैली में एक ऊंचे टीले के ठीक नीचे हरे भरे घास के मैदान में स्थित है। मंदिर के गर्भग्रह में काले पत्थर का नाभि आकार में बना शिवलिंग स्थापित हैं जहां दो अन्य छोटे मंदिर भी स्थापित है, जिनमें से एक मां पार्वती और दूसरा मंदिर इनके संयुक्त रूप अर्धनारीश्वर को समर्पित है। मध्यमहेश्वर मंदिर का निर्माण भीम द्वारा किया गया। यहां पर एक पुराना मंदिर है जिसे वृद्ध मदमहेश्वर कहते है जो काले रंग का है और इसके सामने चौखंभा चोटियां बहुत आकर्षित करती है। मुख्य मंदिर के दाईं ओर एक छोटा मंदिर है जिसके गर्भग्रह में देवी सरस्वती की छवि विराजमान है। 

मध्यमहेश्वर मंदिर में पाए जाने वाला जल बेहद पवित्र माना जाता है जिसके संबंध में बताया जाता है कि स्नान जल में इसकी कुछ बूंदे मिल जाने पर भी वह गंगाजल जैसा पवित्र और खास बन जाता है। सर्दियों के दिनों में भगवान की प्रतीकात्मक मूर्ति की पूजा उखीमठ में की जाती है। इस मंदिर की पूजा वीरशैव संप्रदाय के लोगों द्वारा की जाती है जो दक्षिण भारत कर्नाटक के मैसूर से आते हैं और इन्हें जंगम कहा जाता है। 

3. तुंगनाथ मंदिर (तीसरा पंचकेदार)ः इस मंदिर को दुनिया के सबसे ऊंचे शिव मंदिरों में माना जाता है जो करीब 3,680 मीटर की ऊंचाई पर और चंद्रशिला की चोटी के ठीक नीचे स्थित है। इस स्थान को तीसरे पंचकेदार के रूप में पूजा जाता है जिसकी अवस्थिति यहां भगवान शिव के बैल रूपी स्वरूप की भुजाएं गिरने से है। उत्तरी भारतीय हिमालयी मंदिर कत्यूरी वास्तुकला का श्रेष्ठ उदाहरण लिए तुंगनाथ मंदिर के बारें में कहा जाता है कि यहां भगवान श्रीराम और लंका नरेश रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के उद्ेदश्य से यहां तपस्या की थी। 

इस मंदिर में मक्कुमठ गांव के स्थानीय ब्राहम्ण पूजा करते हैं जबकि अन्य केदार मंदिरो में पुजारी दक्षिण भारत क्षेत्र से हैं। सर्दियों के दिनों में मक्कूमठ गांव के मार्कंडेश्वर मंदिर में प्रतीकात्मक रूप से रखा जाता है और पूजा अर्चना की जाती है। तुंगनाथ उस रिज की चोटी पर अवस्थित है जो मंदाकिनी नदी के जल को अलंकनदा के पानी से अलग करती है और ये चोटी तीन झरनों का आकर्षक परिदृश्य तैयार करती है। 

4. रूद्रनाथ मंदिर (चौथा पंचकेदार)ः उत्तराखंड के गढवाल हिमालय पर्वतमाला में स्थित यह मंदिर भगवान शिव के बैलस्वरूप में तीसरे पंचकेदार के रूप में स्थापित है जहां इनके चेहरे की पूजा की जाती है। इसकी ऊंचाई लगभग 3600 मीटर है। सर्दियो की ऋतु में प्रतीकात्मक रूप से रूद्रनाथ की पूजा गोपेश्वर के गोपीनाथ मंदिर में की जाती है। इसकी डोली यात्रा गोपेश्वर सागर से होते हुए शुरू होती है। इस मंदिर में हिंदू माह श्रावण जुलाई अगस्त की पूर्णिमा के दिन वार्षिक मेला लगाया जाता हैं जिस दिन रक्षाबंधन त्यौहार मनाया जाता है। इस मंदिर में पुजारी कार्य गोपेश्वर के भट्ट व तिवारी करते हैं। 

यहां आने के मार्ग पर नंदीकुंड, 2,439 मीटर की ऊंचाई पर श्रद्धालुगण चट्टानों से निकली पुरानी ऐतिहासिक तलवारों की पूजा करते हैं, जिनके बारे में किंवदंती है कि ये तलवारें पांडवों की हैं। इस मंदिर के पास कई पवित्र जल टैंक है जिनमें सूर्यकुंड, चंद्रकुंड, ताराकुंड और मनकुंड आदि शामिल हैं। मंदिर की पृष्ठभूमि पर नंदा देवी, त्रिशूल और नंदा घुंटी लोकप्रिय चोटियों के दृश्य दिखाई देते हैं। यहां पर वैतरणी की पावन धारा है जो रूद्रगंगा मंदिर के पास बहती है। इस नदी के बारें में किंवंदती है कि मरने के बाद आत्मा को इसी नदी को पार करना होता है, इसलिए इसे मोक्ष की नदी कहा जाता है। यहां पर मृतकों के परिवारीजन अनुष्ठान करने के उद्देश्य से आते हैं जहां वे पिंडदान करते हैं। कहा जाता है कि इस स्थान पर किया गया पिंडदान, गया में किये गये सौ मिलियन पिंडदान के बराबर है। 

5. कल्पेश्वर मंदिर (पांचवां पंचकेदार)ः उत्तराखंड की उर्गम घाटी में करीब 2,200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर पांचवें केदार के रूप में जाना जाता है। अन्य केदार क्षेत्रों के मंदिरों की पूजा गढवाल हिमालय में के केदार क्षेत्र में है जबकि कल्पेश्वर पूरे साल में सुलभ पंच केदार तीर्थस्थल है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए गुफा मार्ग से जाना होता है जहां भगवान शिव की जटाओं की पूजा की जाती है। इस मंदिर के पुजारी दशनामी और गोसाईं हैं जो आदि शंकाराचार्य के शिष्य हैं। इनकी नियुक्ति आदि शंकराचार्य द्वारा ही कई गई थी

कल्पेश्वर मंदिर हिमालय पर्वत चोटियों की उर्गम घाटी के उर्गम गांव के पास स्थित है। उर्गम घाटी एक सघन वन क्षेत्र है जहां सेब के बाग और सीढीदार खेत है जिसमें आलू की खेती वृहद क्षेत्रफल पर की जाती है। ऋषिकेश बद्रीनाथ मार्ग पर देवग्राम गांव तक जाता है जहां से मात्र 300 मीटर की पैदल यात्रा करके दर्शन कर सकते हैं। बारिश के अलावा यह सड़क साइकिल और छोटी कारों के लिए भी सुविधाजनक है। उर्गम गांव में ध्यान ब्रदी मंदिर भी दिखता है जो सप्त मंदिरो मे से एक है।

क्यों जाएं पंच केदार

पौराणिक और आध्यात्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध यह पंच केदार मंदिर मानव को मोक्ष और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए जाने जाते हैं, यहां जाने से ईश्वर के श्री चरणों मे स्थान प्राप्त होता है और इस लोक में रहते हुए उनकी कृपा प्राप्त होती है। 

अगर आप एडवेंचर प्रेमी हैं तो यह स्थान आपको ट्रेकिंग साहसिक गतिविधि का रोमांचक अनुभव प्रदान करते हैं। यहां आप घने जंगलों, क्रिस्टल क्लियर नदियों और पर्वतीय हिमालयी श्रृंखलाओं के मध्य से होते हुए रास्तों की खोज पर निकलते हैं। 

उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों मे गढवाली स्थानीय संस्कृतियों और यहां के निवासियों के रहन सहन और पांरपरिक लोकधुनों और जीवन शैली का आनंद ले सकते हैं। इसके अलावा स्थानीय व्यंजनो का आनंद ले सकते हैं। 

उत्तराखंड और हिमालयी पर्वत श्रृंखलाओं के नजारें प्राकृतिक खूबसूरती से सराबोर जीवंत और मार्मिक स्पर्श के साथ यादगार अनुभव प्रदान करता है। यहां की शानदार वादियों में मौन शांति और सुकून का एहसास होता है जहां आध्यात्मिक आभा के साथ ही नैसर्गिक सुदंरता का एहसास भी मिलता है। 

घूमने का सबसे अच्छा समय 

ग्रीष्म ऋतुः इस समय यहां घूमने का सबसे आदर्श समय माना जाता है जब आसमान साफ और ट्रेकिंग गतिविधियो के लिए उपयुक्त समय रहता है।

वर्षा ऋतुः इस समय वातावरण की हरियाली और शोभा अपने चरम आकर्षण पर होती है लेकिन कभी कभार भूस्खलन का डर भी रहता है। 

शीत ऋतुः मौसम में सर्द एहसास, कहीं कहीं अत्यधिक ठंड, भीड़ कम और सुरम्य परिवेश और प्रसिद्ध आकर्षणों की उत्कृष्ट श्रृंखला। 

पंचकेदार के दौरान ट्रेकिंग की दूरी

सड़क/वाहन यात्रा मार्ग   यात्रा की दूरी और लगने वाला अनुमानित समय 
ऋषिकेश/हरिद्वार से सोनप्रयाग 240 किमी, 7-8 घंटे 
सोनप्रयाग से उखीमठ 60 किमी, 1-2 घंटे
उखीमठ से रांसी/अक्तोलीधर 21 किमी, 1-2 घंटे 
रांसी/अक्तोलीधर से चोपता 50 किमी, 2-2.5 घंटे 
चोपता से गोपेश्वर - सागर गांव 70 किमी, 5-6 घंटे 
सागर गांव से जोशीमठ 70 किमी, 2-3 घंटे 
जोशीमठ से उर्गम गांव - कल्पेश्वर 30 किमी, लगभग 2 घंटे 
जोशीमठ से बद्रीनाथ दर्शन और वापसी 45 किमी, 3-4 घंटे 
जोशीमठ से ऋषिकेश/हरिद्वार  270 किमी, 7-8 घंटे 

विस्तृत यात्रा कार्यक्रम रूपरेखा

पंचकेदार यात्रा करने के बाद बद्रीनाथ दर्शन करने के लिए कहा जाता है क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि पंच केदार दर्शन के बाद बद्रीनाथ दर्शन न किए जाएं तो यात्रा अधूरी मानी जाती है। हम आपको पंच केदार यात्रा की विस्तृत रूपरेखा बताने जा रहे हैं। 

1. पंचकेदार यात्रा की शुरूआत हरिद्वार/ऋषिकेश से शुरू करते हुए रूद्रप्रयाग सड़क मार्ग तक पहुंच सकते हैं। 

2. रूद्र्रप्रयाग से केदारनाथ की दूरी तय करने के लिए गुप्तकाशी होते हुए गौरीकुंड पहुंचना है जहां गौरीकुंड से आप 16 किमी की दूरी पैदल चल कर केदारनाथ दर्शन हेतु पहुंच सकते हैं। 

3. केदारनाथ से गौरीकुंड होते हुए आपको वापस गुप्तकाशी तक आना है। इसके बाद गुप्तकाशी से सड़क मार्ग से उखीमठ होते हुए उनियाना गांव गौंडर पहुंचना है। उनियाना गांव से 21 किमी की पैदल दूरी तय कर आप मध्यमहेश्वर दर्शन कर सकते हैं। 

4. मध्यमहेश्वर से वापस उनियाना होते हुए उखीमठ आना है जहां आप उखीमठ से सड़क मार्ग द्वारा चोपता पहुंच सकते हैं। चोपता से लगभग 3.5 किमी पैदल ट्रेक करते हुए तुंगनाथ दर्शन किए जा सकते हैं। अगर आपके पास समय और इच्छा की कमी नहीं है तो आप चंद्रशिला के दर्शन लगभग 1.5 किमी की पैदल दूरी तय करते हुए कर सकते हैं। 

5. तुंगनाथ से चोपता पहुंचने के बाद आपको सड़क मार्ग से मंडल गांव होते हुए सागर गांव तक आना है। चोपता से सागर गांव की सड़क मार्ग से लगभग 99 किमी है। सागर गांव पहुंचने के बाद रूद्रनाथ की यात्रा पैदल मार्ग से कर सकते हैं जो करीब 23 किमी लंबा रास्ता है। 

6. रूद्रनाथ दर्शन करने के पश्चात आपको फिर से सागर गांव आना है और सागर गांव से गोपेश्वर के रास्ते से होते हुए हेलंग गावं पहुंचना है। सागर और हेलंग की दूरी तकरीबन 60 किमी है। हेलंग गांव पहुंचने के बाद आपको लगभग 3 किमी पैदल यात्रा करने के बाद कल्पेश्वर दर्शन कर पंच केदार दर्शन कर सकते हैं। 

7. कल्पेश्वर दर्शन करने के बाद आपको हेलन गांव तक वापस आना है जहां से आप जोशीमठ और हेमकुंड होते हुए बद्रीनाथ दर्शन कर सकते हैं। बद्रीनाथ दर्शन कर आप हरिद्वार या ऋषिकेश के रास्ते होते हुए घर वापसी कर सकते हैं। 

बद्रीनाथ, संक्षिप्त परिचयः

बद्रीनाथ मंदिर जिसे बद्रीनारायण मंदिर भी कहते हैं, यह उत्तराखंड के चमोली जिले के बद्रीनाथ शहर में स्थित है जहां भगवान विष्णु की पूजा आराधना बद्रीविशाल रूप में की जाती है। अलकनंदा नदी के किनारे गढवाल हिमालय में करीब 3133 मीटर ऊंचाई पर स्थित वैष्णव धर्म के अनुयायियो ंके साथ ही शैव धर्म के लोगो के लिए भी यह आस्था का केंद्र है क्योंकि पंच केदार यात्रा करने के बाद जब तक बद्रीनाथ दर्शन नहीं हो जाते, यात्रा अधूरी और असफल मानी जाती है। इस मंदिर में सबसे अधिक श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। चार धामों में से एक यह तीर्थस्थल ईश्वर बद्रीनारायण की 1 फीट ऊंची काले शालिग्राम पत्थर की मूर्ति है, जहां इसे स्वयंभू देवताओं में गिना जाता है। इस मंदिर का उल्लेख विष्णु पुराण और स्कंद पुराण में भी मिलता है। 

किंवदंतियों के अनुसार भगवान विष्णु इस स्थान पर ध्यान में बैठे थे तब उन्हें सर्दी के मौसम का एहसास नहीं हुआ क्योंकि यहां उनकी पत्नी श्री लक्ष्मी मां बद्री वृक्ष यानी बेर के पेड़ के रूप में छत्र बनकर उनकी रक्षा की। देवी लक्ष्मी की भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने इस स्थान का नाम बद्रीनाथ रख दिया। बद्रीनाथ मे भगवान विष्णु की प्रतिमा पद्मासन अवस्था में विराजमान हैं। 

पंच केदार और बद्रीनाथ यात्रा करने में लगभग 10 से 15 दिन का समय लग सकता है। केदारनाथ, मध्यमहेश्वर और रूद्रनाथ दर्शन करने में सबसे अधिक समय लगता है, बाकी समय आपकी शारीरिक क्षमता पर निर्भर करता है कि आप एक दिन में कितने किमी दूरी तय कर पा रहे हैं। तुंगनाथ और कल्पेश्वर मंदिर की यात्रा एक एक दिन में ही पूरी की जा सकती है। 

पंच केदार यात्रा करते समय स्थानीय और प्रशासन की जारी की गई गाइडलाइन का पालन अवश्य करें जिससे आपको अनावश्यक दिक्कत का सामना न करना पड़े।

यात्रा सुझाव

पंचकेदार यात्रा आसान नहीं होती क्योंकि यात्रा के दौरान पहाड़ो में कई किमी तक लगातार पैदल चलना होता है इसलिए इनकी यात्रा करते समय आपको शारीरिक रूप से सुदृढ़ होना जरूरी है। यात्रा से कुछ महीनों पहले कार्डियों और शारीरिक क्षमता बढाने के लिए एक्सरसाइज और योगाभ्यास करें। 

पैदल यात्रा करते समय आवश्यक जरूरी वस्तुओ की पैकिंग करें जिसमें दवाएं, गरम कंबल व कपड़े, मोबाइल पूरी तरह चार्ज हो, कैमरा टॉर्च वगैरह में एक्स्ट्रा बैटरी रखना समझदारी है। इसके अलावा खाने पीने का सामान, ट्रेकिंग शूज, बारिश से बचने के लिए पोचों व छतरी रख सकते हैं। सामान को बेहतरी से ले जाने के लिए आप जलरोधी बैग्स में पैकिंग करेंगे तो सुविधाजनक रहता है।

यात्रा की शुरूआत सुबह जल्दी ही शुरू करें जिससे कि आप सही समय पर मंदिर दर्शन कर सकें। 

मंदिर के आसपास धर्मशाला वगैरह बने हुए है जहां आप रात में विश्राम कर सकते हैं या फिर रात में रूकने के लिए कैंपिग वगैरह भी कर सकते हैं, इसके लिए कैंपिग सामान जरूर साथ रखें। 

मंदिर बहुत ऊंचाईयों पर स्थित है इसलिए सेहत संबंधी समस्या होने पर आपातकालीन चिकित्सा का संपर्क नंबर जरूर साथ रखें और अपने साथ प्राथमिक सुरक्षा किट रखें। 

अत्यधिक ऊंचाई और सर्द वातावरण के चलते प्यास कम लगती है इसलिए स्वयं को हाइड्रेटेड रखे और थोड़ी थोड़ी देर में ब्रेक लेते रहें। सांस की समस्या से परेशान न होना पड़े इसलिए ऑक्सीजन सिलिंडर भी कैरी करें। 

दर्शनीय स्थलों में यात्रा करते समय मर्यादा का विशेष ध्यान रखें और कोई भी गन्दगी या अनावश्यक सामान कहीं पर यूं ही न फेंके।

आवश्यकता पड़ने पर ट्रेकिंग गाइड की मदद लें और परमिट भी प्राप्त करें। 

बजट यात्रा करने के लिए पालकी टट्टू या बैगेज शुल्क से परहेज करें 

व्यक्तिगत और अनावश्यक खर्चों से बचाव करें, इसके अलावा यदि यात्रा बीमा करवाया है तो पैकेज का अवलोकन अच्छे से कर लें। 

बुकिंग कैसे करें

पंचकेदार यात्रा सकुशल संपन्न करने के लिए आप किसी ट्रैवलिंग कंपनी से पैकेज सुविधा, अनुभवी गाइड और उच्च गुणवत्ता की बेहतर सेवाओं की सुविधा प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए आपको इन कंपनीज से संपर्क करना जरूरी है। 

निष्कर्ष

भगवान शिव और उनके पंचकेदार मंदिरों की महिमा अद्भुत और अतुलनीय है। कलरव करते पक्षियो के मधुर स्वर, और प्रकृति की सुरम्यता के बीच बहती नदियों की स्वच्छ उपस्थिति, हरी भरी हरियाली और विशाल पहाड़ों की भव्यता ऐसे शानदार परिवेश में कुदरत के नायाब तोहफों का वरदान प्रदान करते ये पंचकेदार बहुत ही पवित्र पावन तीर्थस्थल है, इनकी श्रेष्ठ और आश्चर्यजनक वास्तुकला हर किसी को हैरत में डाल देती है, इतनी ऊंचाईयांं पर बने इन मंदिरों की दिव्य अवस्थिति आम जनमानस को भगवान शिव की साक्षात् मौजूदगी और चमत्कारिक प्रमाणों की श्रृंखला प्रदान करती हुई मोक्ष और आत्मसंतुष्टि का वरदान देती है। 

पंच केदार यात्रा करते समय अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न उत्तर

प्रश्नः पंच केदार कहां हैं?

उत्तरः पंच केदार उत्तराखंड के रूद्रप्रयाग और चमोली जिले में गढवाल हिमालय रेंज पर अवस्थित है। तुंगनाथ में भगवान शिव की भुजाओं, रूद्रनाथ में चेहरा, मध्यमहेश्वर में नाभि हिस्सा, जटाएं कल्पेश्वर मे और बैल के कूब़ड़ के रूप में केदारनाथ में स्थित है।

प्रश्नः सबसे ऊंचा पंच केदार कौन सा है?

उत्तरः भगवान शिव के पंचकेदारों में से सबसे ऊंचा पंच केदार तुंगनाथ में है जो दुनिया भर में भगवान शिव की सर्वाधिक ऊंचाई वाला मंदिर है। इसकी समुद्री तल से लगभग 12083 फीट ऊंचाई है।

प्रश्नः पंचकेदार में सबसे पहले कौन सा केदार है?

उत्तरः पंचकेदारों में सबसे पहले नंबर पर केदारनाथ का नाम आता है जहां भगवान शिव की पूजा बैल के कूबड़ रूप में की जाती है।

प्रश्नः पंचकेदार मंदिर वर्ष भर खुले रहते है?

उत्तरः पंच केदार मंदिरों में से सिर्फ एक मंदिर वर्ष भर खुला रहता है जो कल्पेश्वर है। अन्य सभी केदारनाथ, तुंगनाथ, मध्यमहेश्वर, रूद्रनाथ शीत ऋतु में अत्यधिक ठंड के कारण बंद कर दिये जाते हैं।

प्रश्नः तुंगनाथ में क्या खास है?

उत्तरः तुंगनाथ में भगवान शिव की भुजाआेंं की पूजा होती है जो सर्वाधिक ऊंचाई पर है। इसके अलावा यहां की खासियत है कि तुंगनाथ मंदिर से ऊपर की तरफ चंद्रशिला पहाड़़ी है जहां भगवान राम और लंकापति रावण ने भगवान शिव की तपस्या की थी। 

प्रश्नः पंच केदारों की यात्रा करने में तकरीबन कितना समय लग सकता है?

उत्तरः पंच केदारों की यात्रा करने मे तकरीबन 10 से 15 दिन का समय लग सकता है। वैसे यह बात आपकी शारीरिक क्षमता और स्थिति पर भी निर्भर करती है।

प्रश्नः कल्पेश्वर मंदिर में किसकी पूजा होती है?

उत्तर कल्पेश्वर मंदिर में भगवान शिव की जटाओं की पूजा की जाती है।

प्रश्नः पंच केदार मंदिरों का निर्माण किसने करवाया था?

उत्तरः पंच केदार मंदिरों का निर्माण पांडवों ने करवाया था, जिसका जीर्णोद्धार आदि शंकराचार्य द्वारा कराया गया।

प्रश्नः चौथे केदार के रूप मे किसकी पूजा की जाती है?

उत्तरः पंचकेदारों में चौथा केदार रूद्रनाथ है जो करीब 2286 मीटर पर स्थित है जहां भगवान शिव के चेहरे की पूजा की जाती है।

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