- Dec 29, 2025
राजस्थान के विराटनगर कस्बे में अवस्थित यह अंबिका शक्तिपीठ हिंदू धर्म के लोगों के लिए प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक यह शक्तिपीठ भरतपुर के पास ही है, जिसे राजस्थान के लौहगढ़ या पूर्वी प्रवेश द्वार के रूप में जानते हैं। कला, स्थापत्य और संस्कृति की धनी राजस्थानी धरती दिव्य तीर्थस्थान के लिए भी मशहूर है। आइए जानते हैं इस शक्तिपीठ के बारें मे और भी अधिक विस्तार से।
समस्त शक्तिपीठों से जुड़ी ऐतिहासिक कहानी
दिव्य शक्तिशाली इन स्थानों की कहानी भगवान शिव और उनकी भार्या देवी सती से जुड़ी हुई है। प्रजापति दक्ष देवी सती के पिता थे जिन्होंने एक बार विशाल यज्ञ समारोह का आयोजन किया जिसमें उन्होंने संसार के समस्त देवी देवताओं को बुलाया लेकिन अपनी पुत्री देवी सती और जामाता भगवान शिव को निमंत्रण नहीं दिया क्योंकि वे भगवान शिव के वैरागी स्वभाव के कारण इन्हें नापसंद करते थे। न बुलाने से देवी सती को बहुत कष्ट हुआ और इस बात का कारण जानने के लिए वे अकेले बिन बुलाए ही यज्ञ समारोह में चली गईं जहां उन्हे अपमान तिरस्कार का सामना करते हुए भगवान शिव के प्रति कठोर सहन करने पड़े। ऐसी स्थिति में उन्होंने स्वयं को यज्ञ कुंड में आहुत कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली।
इस घटना की जानकारी जब भगवान शिव को हुई तो उनके क्रोध का पारावर नहीं रहा। अत्यंत गुस्से मेंं आकर उन्होनेंं प्रजापति दक्ष को दंडित किया और बाद में क्षमा भी कर दिया। फिर भी देवी सती के वियोग से व्याकुल होकर उनके मृत शरीर को लेकर समस्त लोकों में विचरण करने लगे। सृष्टि का संतुलन बिगड़ते देखकर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शव को 51 भागों में विभाजित कर भारतीय उपमहाद्वीप में बिखेर दिया। जहां भी यह टुकडे गिरे वहां पर शक्तिपीठों की अलौकिक स्थापना हुई। समस्त शक्तिपीठों में भगवान शिव की उपस्थिति उनके भैरव अवतार के रूप में देखने को मिलती है।
श्री अम्बिका शक्तिपीठ की उत्पत्ति से जुड़ी पौराणिक कहानी
श्री विराट अम्बिका शक्तिपीठ में देवी सती के बाएं पैर का अगूंठा या उंगलिया गिरी थी जिनकी उपस्थिति देवी अंबिका के रूप में वंदनीय और पूजनीय है। यहां भगवान शिव के भैरव रूप अमृतेश्वर की पूजा की जाती है। पौराणिक कथाओं में इस स्थान को बेहद विशेष बताया गया है। ऐतिहासिक कहानियों के अनुसार मानते हैं कि इस शक्तिस्थान की स्थापना ऋषि मार्कंडेय ने की थी जो देवी दुर्गा के परम साधक और दुर्गा सप्तशती रचना करने वाले प्रकांड विद्वान थे। इस मंदिर की स्थापना देवी दुर्गा के स्वरूप अंबिका माता के रूप में की गई है जिन्हें विश्व का भरण पोषण करने वाली बताया जाता है।
माना जाता है कि सबसे पहले इस मंदिर का निर्माण 9वीं शताब्दी के आसपास हुआ था। इस मदिर के बारें में 12वीं शताब्दी के ब्रहमधर्म पुराण में भी लिखा है। 16वीं शताब्दी के आसपास मुगला राजा अकबर और 20वीं शताब्दी के आसपास राजपूत राजा सवाई जय सिंह ने इस मंदिर में जीर्णोद्धार कराया था। 20वीं शताब्दी के समय इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराते समय इसमें स्वर्ण छत बनवाई गई है।
इस मंदिर मे जीर्णोद्धार और पुननिर्माण, विस्तार का काम कई बार हो चुका है। अपनी आकर्षक वास्तुकला और सुंदरता की वजह से यह शक्तिपीठ भारत ही नहीं बल्कि विश्व में भी हिदुओें का मुख्य स्थान है।
श्री अम्बिका शक्तिपीठ की वास्तुकला एवं संस्कृति
श्री अंबिका शक्तिपीठ अपनी वास्तुकला और जटिल संपन्न नक्काशी के लिए समृद्धशाली माना जाता है। इस मंदिर की राजस्थानी शैली अपनी खासयित और विशिष्टता के लिए जानी जाती है, जहां एक ऊंचा शिखर और प्रभावशाली प्रवेश द्वार है। मां अम्बिका की उपस्थिति के साथ ही यहां अन्य देवी देवताओं की स्थापना भी रोचक है, जिनके छोटे छोटे मंदिर आकर्षक और सुंदर प्रतीत होते हैं।
मुख्य गर्भग्रह मे मां अंबिका की कृष्ण रंग की प्रतिमा मनमोहक है जो भव्य आभूषणों और रंगीन वस्त्रो सें शोभाएमान प्रतीत होते हुए मंदिर के गौरव को और भी ज्यादा बढाती है। मंदिर परिसर में यज्ञशाला भी अवस्थित है जिसमें समय समय पर हवनादि धार्मिक अनुष्ठान संपर्क किए जाते हैं।
मंदिर परिसर मे विशाल बगीचा भी है जहां आप परिवार या अकेले आकर पारिवारिक ट्रिप प्लान कर सकते है। पेड़ पौधों की सघनता और ताजी हवा की बात ही निराली है। इस वजह से इसकी आध्यात्मिक महत्ता के साथ ही पर्यटन की दृष्टि से भी यह स्थान अनोखा और ख़ास है।
श्री अम्बिका शक्तिपीठ में दर्शन समय
मंदिर खुलने का प्रातःकालीन समयः सुबह 5ः30 बजे
मंदिर बंद होने का रात्रिकालीन समयः रात 8.00 बजे।
श्री अम्बिका शक्तिपीठ में मनाए जाने वाले व्रत अनुष्ठान एवं त्यौहार
नवरात्रिः चैत्र और आश्विन मास में आने वाला नवरात्रि पर्व नौ दिवसीय त्यौहार है जो माता रानी को समर्पित है। इन दिनों देवी मां के व्रत, अनुष्ठान आयोजित किए जाते है जिसमें हवन, पूजा पाठ और जागरण आदि होते हैं। इस दौरान अंबिका शक्तिपीठ में भव्य मेले की शोभा और भी ज्यादा विशेष प्रतीत होती हैं।
दीपावलीः हिंदू धर्म के मुख्य त्यौहारों में से एक यह पर्व जगमगाती दीपों की श्रृंखला और चारों ओर खुशहाली की रौनक को बयां करता है जिसकी चमक श्री अंबिका शक्तिपीठ में और भी ज्यादा बढ जाती है। आज के दिन मैया रानी को सुंदर वस्त्र आभूषण समर्पित करते हुए रात्रिकालीन पूजा का अनुष्ठान संपन्न किया जाता है।
महाशिवरात्रिः अमृतेश्वर भगवान के लिए महाशिवरात्रि पर्व बेहद प्रिय है, जिसमें भक्त महादेव को सुबह से शिवालयों में पंचोपक्षार पूजन करते हुए जलाभिषेक करते हैं। दूध, दही, घी, शहद से भगवान भोलेनाथ का अभिष्ोंक किया जाता है। श्री अंबिका शक्तिपीठ में भोर से ही अपार भीड़ होने लगती है। इस दिन यहां शानदार मेला भी लगता है जिसकी छटा देखते बनती है।
श्री अम्बिका शक्तिपीठ से जुड़े रोचक रहस्य
मंदिर की अवस्थिति राजस्थान की राजधानी जयपुर से करीब 90 किमी है जो भरतपुर के पास ही है। भरतपुर को अपनी खासियतों और विशेषताओं के कारण राजस्थानी गौरव और श्रद्धा के लिए जाना जाता है।
इस मंदिर मे मां सती की प्रतिमा मां अंबिका के लिए जानी जाती है और भगवान अपने भैरववातार अमृतेश्वर के लिए जाना जाता है।
यह मंदिर मां अंबिका के राक्षस वध करने और धरती को खुशहाल सपन्न करने के लिए जाना जाता है, जहा अर्जी लगाने से मनुष्य की सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।
इस मंदिर मे सजीव उत्सवों और त्यौहारों की रौनक देखते बनती है जहा दर्शन मात्र कर लेने से जीवन सफल हो जाता है। साथ ही जीवन की मुश्किलों को पार करने की हिम्मत प्राप्त होती है।
श्री अम्बिका शक्तिपीठ के आसपास घूमने वाले स्थान
भरतपुर राष्ट्रीय उद्यानः भरतपुर स्थित केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में पक्षियों की विस्तृत श्रृंखला देखने को मिलती है। यहां पक्षी प्रजातियों के दुर्लभ और विलुप्त प्राणियों के आकर्षक परिदृश्यों को निहार सकते हैं। अब तक यहां कम से कम 230 प्रजातियों के पक्षी अपना निवास स्थान बना चुके हैं। सर्दियों के समय यहां कई सारे प्रवासी पक्षियों की रौनक देखने को मिलती है। यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल में शामिल यह राष्ट्रीय उद्यान अपनी तरह का प्रसिद्ध पक्षी विहार है।
गंगा मंदिरः महाराजा बलवंत सिंह द्वारा सन् 1845 में मंदिर कार्य आरंभ कराया था जिसको बनने में करीब नौ दशक तक का समय लगा है। इस मंदिर के निर्माण में वहां के सभी धनिक वर्गों और जनता से भी इस मंदिर को बनवाने में योगदान देने की अपेक्षा की गई थी। इस मंदिर के तैयार होने के बाद महाराजा बलवंत सिंह की पाँचवी पीढी बृजेन्द्र सिंह ने इसमें देवी गंगा की सुंदर सी मूर्ति स्थापित की थी। इस मंदिर की खासियत है कि यह दक्षिण, भारतीय, राजपूत और मुगल शैलियों के सम्मिश्रण से बनी है। बलुआ पत्थर की संरचना से बनी यह संरचना अपनी खूबसूरती के कारण किसी नवशास्त्री फ्रांसीसी महल से कम नहीं लगती। गंगा दशहरा और गंगा सप्तमी के दिन इस मदिर में विशेष दर्शनार्थी आते हैं। श्वेत संगमरमर से बनी यह मूर्तियां जिसमें गंगा मां, कृष्ण भगवान, भगवान शिव, पार्वती और लक्ष्मी और नारायण की भव्य मनमोहक प्रतिमाएं स्थापित हैं।
लक्ष्मण मंदिरः राजस्थानी शैली पर बना यह लक्ष्मण मंदिर नागा बाबा के वंशजो की देखरेख में रहता है। लगभग 400 साल पहले इस मंदिर की स्थापना किसी नागा संत द्वारा ही संपन्न की गई थी। इस मंदिर के पास ही एक और मंदिर है जो भगवान लक्ष्मण को ही समर्पित है। भरतपुर शहर के संस्थापक बलदेव सिंह द्वारा ही इस मंदिर का निर्माण कराया गया था। अष्टधातु से बनी भगवान लक्ष्मण और उनकी पत्नी देवी उर्मिला की प्रतिमाएं लगभग तीन शताब्दी प्राचीन है। मान्यता है कि युद्ध में जीतने की अभिलाषा से यहां के राजा ने इस मंदिर का निर्माण कराया था जहां वे प्रतिदिन दर्शनों हेतु आया करते थे।
बांके बिहारी मंदिरः भरतपुर के पास वृन्दावन में बांके बिहारी मंदिर का अवलोकन कर सकते हैं जहां स्वामी हरिदास के तप से प्रसन्न श्री कृष्ण त्रिभंग मुद्रा में अवस्थित हैं। वृन्दावन में बिहारी जी के कई प्रसिद्ध मंदिर हैं जहां आप अवलोकन कर उन्हें निहार सकते हैं।
भरतपुर पैलेस और संग्रहालयः हेरिटेज होटल और संग्रहालय के रूप में यह पैलेस लक्ष्मी निवास पैलेस के नाम से भी जाना जाता है। इस महल का निर्माण 18वीं शताब्दी के दौरान हुआ था जहां जाट शासक सत्ता में थे। भव्य महल और शाही जीवनशैली के वैभव को दर्शाता यह पैलेस अपनी विशेषताओं के कारण अति प्रिय आकर्षणों में से एक है।
श्री अम्बिका शक्तिपीठ कैसे पहुंचे?
हवाई मार्ग से
- श्री अंबिका शक्तिपीठ की पावन यात्रा करने के लिए नजदीकी एयरपोर्ट जयपुर का इंटरनेशनल एयरपोर्ट है। जहां से आप राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के माध्यम से श्री अंबिका शक्तिपीठ की यात्रा करने के लिए करीब 90 किमी का सफर तय कर पहुंच सकते हैं।
रेल मार्ग से
- श्री अंबिका शक्तिपीठ के लिए नजदीकी रेलवे स्टेशन भरतपुर है, जहां से आप स्थानीय वाहनों के जरिए इस शक्तिपीठ में पहुंच सकते हैं।
सड़क मार्ग से
- राजस्थान अपने पड़ोसी राज्यो से भली भांति जुड़ा हुआ है जहां आप आराम से बस या अपने वाहन की मदद से ड्राइव कर पहुंच सकते हैं। भरतपुर होते हुए आप श्री अंबिका शक्तिपीठ की सड़क यात्रा संपन्न कर सकते हैं।
निष्कर्ष
श्री अंबिका शक्तिपीठ मां सती और भगवान शिव की साक्षात् आशीर्वाद प्रदान करता दिव्य स्थान है। राजस्थान के इस स्थान की महिमा अवर्णनीय है जहां इन शक्तिशाली ऊर्जा स्थानों की दिव्यता और पारलौकिक अनुभूति तन मन को रंग और उमंगों से जीवंत वातावरण का निर्माण करती है। मन मस्तिष्क और आत्मा को देवी दुर्गा के समस्त रूपों का आभास कराता यह पवित्र स्थान सभी को मां के आशीर्वाद और कृपा से अभिसिंचित करता हुआ अलौकिक देवस्थान है। जय माता दी!
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