- Jan 09, 2026
भगवान श्री कृष्ण संपूर्ण भारत ही नहीं वरन् अनंत ब्रहमांड के सर्वेश्वर हैं। भारत के दक्षिणी भाग में इनके कई प्रमुख तीर्थ स्थल हैं जहां सांस्कृतिक और वास्तुकला आकर्षणों के साथ इन मंदिरों की छटा अद्भुत और निराली है। भगवान श्री कृष्ण के प्रमुख मंदिरों की रौनक और विशेषताएं हमेशा से श्रद्धालुओं के लिए भक्ति आस्था और विश्वास के साथ आश्चर्य का केंद्र रही हैं, इन मंदिरो के पौराणिक ऐतिहासिक मान्यताएं और इस धरती पर हज़ारों सालों से स्थापित इन मंदिरों की मौजूदगी ईश्वरीय सत्ता का साक्षात् स्वरूप और उदाहरण हैं- आइए ठाकुर जी से जुड़े दक्षिण भारतीय प्रमुख मंदिरों के बारें में विस्तार से जानते हैं।
1. मैसूर वेणुगोपालस्वामी मंदिर, मैसूर, कर्नाटकः
दक्षिण भारतीय धरती पर अवस्थित इस मंदिर की विशेषताओं के कारण इसे तैरते हुए मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। 12वीं सदी में बना होयसल वास्तुकला की शानदार कृति मैसूर जिले के चेन्नकेशव मंदिर के समान है, जो अद्भुत शिल्पकला और समृद्ध इतिहास का धनी है। मान्यता है कि मूल वेणुगोपाला स्वामी मंदिर कन्नमबाड़ी गांव में स्थित था जो के एस बांध बनने के समय बाढ में समूल रूप से डूब गया था और भविष्य में सूखे की स्थिति होने पर इस मंदिर की झलक सामने आती है और यह घटना आश्चर्य की सीमा से परे मानी जाती है, इसके बाद मंदिर की पुनःस्थापना के लिए योजना तैयार की गई। मौलिक संरचना और प्रयुक्त पत्थरों का विस्तार से अध्ययन शोध किया गया, उन्हें अलग अलग कर दोबारा से कुशल कारीगरों द्वारा ऊंचे स्थान पर दोबारा से स्थापित किया गया। वर्तमान में यह मंदिर अपनी ऐतिहासिकता मान्यता और संकल्पशक्ति के जीवंत प्रमाण के रूप में जाना जाता है। यह मंदिर तकरीबन 70 सालों तक पानी में ही डूबा रहा जिसे वर्ष 2000 के आसपास ईश्वरीय प्रेरणा से दोबारा बचाया गया है। मंदिर में सुबह 9 बजे और शाम 6 बजे महापूजा का अनुष्ठान संपन्न किया जाता है जो मंदिर के खुलने और बंद होने का क्रमशः समय है।
वास्तुकला आकर्षण : प्रवेश द्वार से पहले स्तंभों वाले बरामदों की मौजूदगी और बाहरी महाद्वार आपको भीतर मुख्य गर्भग्रह के साथ यज्ञशाला और रसोई के साथ दूसरे महाद्वार और यहां से मुख्य गर्भग्रह तक ले जाता है, जो मंदिर के केंद्र में स्थित है। यहां प्रतिष्ठित श्री वेणुगोपाल स्वामी की मूर्ति भगवान कृष्ण के सबसे मंत्रमुग्ध करते ग्वाले स्वरूप और बांसुरी बजाते हुए हैं। गर्भग्रह से पूर्व स्थित कक्ष में भक्त दर्शन के लिए अपनी बारी का इंतजार और भजन ध्यान आदि करते हैं।
कैसे पहुंचे :
हवाई मार्ग से
- नजदीकी एयरपोर्ट मैसूर हवाई अड्डा है जिसकी दूरी यहां से करीब मात्र 8 किमी है, जहां से स्थानीय ऑटो टैक्सी रिक्शा की मदद से वेणुगोपाल स्वामी मंदिर दर्शन के लिए पहुंच सकते हैं।
रेल मार्ग से
- मंदिर से नजदीकी रेलवे स्टेशन मैसूर जंक्शन है, जहां से मंदिर की दूरी लगभग 2 किमी है। स्टेशन से मंदिर की दूरी आप चाहें तो पैदल, रिक्शा या टैक्सी से तय कर सकते हैं।
सड़क मार्ग से
- मैसूर की लक्ष्मीपुरम सड़क पर स्थित यह मंदिर मैसूर बस स्टैंड से ज्यादा दूरी पर नहीं है। बस स्टैंड से कैब, ऑटो लेकर मंदिर पहुंच सकते हैं। कर्नाटक और आसपास के राज्यों के प्रमुख शहरों से आसानी से मैसूर पहुंच सकते हैं।
2. अरुल्मिगु श्री पार्थ सारथी मंदिर त्रिपेलीकेन, चेन्नई, तमिलनाडु:
भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित भगवान विष्णु के 108 दिव्य देशों में एक स्थान 6वीं शताब्दी में बने इस मंदिर का भी है जो चेन्नई के ट्रिप्लिकेन में स्थित है। भगवान श्रीकृष्ण की पूजा यहां अर्जुन के सारथी के रूप में की जाती है जिन्हें यहां पार्थसारथी नाम से जाना जाता है। मौलिक संरचना का निर्माण पल्लव साम्राज्य के राजा नरसिम्हवर्मन प्रथम ने कराया था। भगवान पार्थसारथी के अलावा यहां भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार, प्रभु श्रीराम, वराह और कृष्णरूप के मंदिर हैं जिनमें से भगवान पार्थसारथी और नरसिम्हा के जिनके प्रवेश द्वार अलग अलग हैं। वैष्णव संप्रदाय के प्रमुख संतों की दिव्य सूक्ष्म उपस्थिति को साकार करते इस मंदिर में रामानुजम, स्वामी मनवला मामुनिगल, श्री वेदवल्ली थयार, श्री रंगनाथ, श्री राम, श्री गंजेद्र वरदराज स्वामी, श्री अंडाल, श्री अंजनेय, अलवर और वेदांत दर्शन के आचर्यों के प्रमुख मंदिर दर्शन करने को मिलता है। हिंदू पौराणिक कथाओं में जब कौरव पाण्डेय का महाभारत युद्ध हा रहा था तब भगवान श्री कृष्ण ने पांडव युद्ध में शस्त्र न उठाने का प्रण लिया था और उन्होंने अर्जुन का रथ हांका था। इस मंदिर से जुड़ी किंवदती है कि जब अर्जुन और भीष्म के बीच युद्ध चल रहा था तब भीष्म का बाण भगवान श्रीकृष्ण को लगने से वे घायल हो गए थे। मंदिर में स्थापित मूर्ति इसी घटना का प्रतीक है और यह स्थान अलिकेनी नाम से जाना जाता है। अन्य कथा अनुसार यह स्थान कभी तुलसी का वन था, जहां चोल महाराजाओं ने ऋषि अत्रि के निर्देश पर पूजा की थी।
वास्तुकला आकर्षण : दक्षिण भारतीय वास्तुकला का उत्कृष्ट प्रतीक है, यहां तिरूवायमोली मंडप की तरह कई छोटे मंदिरों के समूह और स्तंभो वाले मंडप हैं। द्रविड़ शैली का प्रतिनिधित्व करता यह स्थान भव्य प्रवेश द्वार ( गोपुरम ) व यहां भगवान कृष्ण की बिना शस्त्र व मूंछो वाली मूर्ति है जिसके तिलक में नीलम रत्न सुशोभित होता है। शानदार और जीवंत नक्काशी, विशाल परिसर में बने इस मंदिर में कई ऐतिहासिक शिलालेख है जो इसके ऐतिहासिक महत्व और भव्यता को प्रदर्शित करते हैं। मंदिर प्रांगण में एक परम पावन कुंड भी है जिसके चारों ओर इंद्र, सोम, अग्नि, मीन और विष्णु नामक पंच तीर्थ हैं और इस तालाब की तुलना गंगा जल से की जाती है। वास्तुकला, मूर्तिकला और दंतकथाओं से संपन्न इस मंदिर की अवस्थिति तनमन को भाव ऊर्जा से प्रसन्न करती है।
कैसे पहुंचे
हवाई मार्ग से
- मंदिर से नजदीकी हवाई अड्डा चेन्नई इंटरनेशनल एयरपोर्ट है जिसकी दूरी तकरीबन 19 किमी है, इसे आप टैक्सी या बस से तय कर जा सकते हैं।
रेल मार्ग से
- पार्थसारथी मंदिर से निकटतम रेलवे स्टेशन चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन है जहां से दूरी लगभग 4 किमी है। रेलवे स्टेशन से ऑटो, लोकल बस या टैक्सी कैब की मदद से आप त्रिप्लिकन आराम से पहुंच सकते हैं।
सड़क मार्ग से
- चेन्नई स्थित इस मंदिर में तमिलनाडु और आसपास के राज्यों के प्रमुख शहरों से सीधी बसे चलती हैं इसके अलावा स्वयं की कार से भी आप चेन्नई का सफर तय कर पहुंच सकते हैं।
3. राजगोपालस्वामी मंदिर, मन्नारगुडी, तिरूवरूर , तमिलनाडु
तमिलनाडु, दक्षिण का यह प्रसिद्ध मंदिर प्रभुश्री कृष्ण के द्वारका स्वरूप को समर्पित होने के कारण दक्षिण की द्वारका के नाम से जाना जाता है। यहां भगवान श्री कृष्ण और देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है जिन्हें सेंगमाला थायर कहा जाता है। मौलिक संरचना का निर्माण 10वीं शताब्दी में कुलुथंगा चोल प्रथम ने कराया था जिसे अन्य चोल राजाओं ने बाद में और ज्यादा विस्तारित किया। यहां नौ जलतीर्थ हरिद्रानाधि, दुर्वासा तीर्थ, थिरूप्पारकादल, गोपिका तीर्थम, रूक्मिणी तीर्थम, संघू तीर्थम, चक्र तीर्थम, अग्निकुंड तीर्थम और कृष्ण तीर्थम हैं। मान्यता है कि पुंडरीकाक्षन ने ऋषि गोपिलर और गोप्रलयार को श्रीकृष्ण रूप में दर्शन दिए थे।
वास्तुकला आकर्षणः तकरीबन 23 एकड़ क्षेत्रफल में बने इस मंदिर में प्राचीन शिलालेख है जहां मंदिर के चारों ओर ग्रेनाइट की दीवारें है। इस मंदिर की विशेषता है कि यहां नौ जल निकाए स्थित है जिसमें से सात ग्रेनाइट पत्थर से घिरे हुए है, जिसे स्थानीय लोग मन्नारगुडी मथिल अलागु कहते हैं। मंदिर का भव्य प्रवेश द्वार राजगोपुरम नाम से जाना जाता है जिसकी ऊंचाई करीब 47 मीटर है। मन्नारगुडी में बने इस मंदिर में मुख्य देवता की कांस्य प्रतिमा 156 इंच ऊंची है, जिनके दोनों ओर उनकी पत्नियां देवी रूक्मिणी और सत्यभामा विराजमान है। इस मंदिर में 16 प्रवेश द्वार, 7 बाहरी प्रांगण, 24 मंदिर और 9 कुंड और 7 मंडपम कक्ष है। मंदिर में स्थित सबसे बड़ा तालाब हरिद्रा नदी से जाना जाता है जो भारत के सबसे बड़े तालाबों मे जाना जाता है। गर्भग्रह के चारों ओर दूसरे परिसर मे 1000 स्तंभो वाला हॉल यहां का मुख्य आकर्षण हैं।
कैसे पहुंचे
हवाई मार्ग से
- मन्नारगुडी से करीब 95 किमी दूरी पर नजदीकी एयरपोर्ट तिरूचिरापल्ली है जहां से आप बस या टैक्सी से मंदिर पहुंच सकते हैं।
रेल मार्ग से
- मन्नारगुड़ी रेलवे स्टेशन मंदिर के पास ही है जहां आप चेन्नई, तंजावुर, तिरूचि, मदुरै शहरों से लोकल सफर या तिरूवरूर नजदीकी रेलवे स्टेशन भारत के किसी भी प्रमुख रेलवे स्टेशन से यहां पहुंचकर स्थानीय वाहनों से दर्शन के लिए यहां पहुंच सकते हो।
सड़क मार्ग से
- तमिलनाडु के सभी प्रमुख शहरो से मन्नारगुडी के लिए सीधी बसें चलती हैं जहां पहुंचना आसान और सुगम है।
4. गुरूवायूर श्री कृष्ण मंदिर, केरल
भारत के सबसे चौथे बड़े मंदिर के रूप में प्रसिद्ध यह मंदिर केरल राज्य के गुरूवायुर में स्थित है। इस मंदिर के बारें में प्रसिद्ध और रोचक कथा सुनने में आती है- जब भगवान श्रीकृष्ण को पता चला कि द्वारका समुद्र्र में समा जाएगी तब उन्होने गुरू और वायु को ऐसा पवित्र व अद्वितीय स्थान खोजने का आदेश दिया जहां भगवान श्री हरि विष्णु की प्रतिमा को स्थापित की जा सके। कुछ लोग गुरूवायुर को केरल की सांस्कृतिक कैपिटल से कम नहीं मानते जहां एक या दो नहीं वरन् कई शानदार और अनगिनत मंदिर स्थापित हैं। भगवान विष्णु के 108 दिव्य देशो में यह पवित्र मंदिर गिना जाता है जिसका निर्माण 16वीं शताब्दी में कराया गया था। देवगुरू बृहस्पति और पवन देव ने इसी स्थान पर भगवान विष्णु की दिव्य साक्षात प्रतिमा को स्थापित किया था, जिनकी पूजा भगवान श्री कृष्ण के द्वारक महल में सभी के द्वारा की जाती थी। कहते हैं यहां पहले एक मूल शिव मंदिर था, ऐसे में भगवान विष्णु की मूर्ति यहां स्थापित करने के उद्देश्य से गुरू बृहस्पति और वायु देव ने भगवान शिव से दूसरी जगह स्थानंतरित होने का अनुरोध किया। इसलिए गुरूवायुर में यात्रा तब तक पूरी नहीं मानी जाती जब तक कि मूल शिव मंदिर के दर्शन न कर लिए जाएं जो मम्मियूर में स्थापित किए गए थे।
वास्तुकला आकर्षण : मंदिर की विशिष्ट स्थापत्य कला केरल शैली से प्रभावित है जिसमें लकड़ी, पत्थर के काम के साथ तांबे की चादरों से ढकी ढलान वाली छतें आकर्षित करती है। मुख्य गर्भग्रह के चारों ओर कई उप मंदिर स्थापित हैं। इस मंदिर में दो प्रमुख गोपुरम प्रवेश द्वार है। गर्भग्रह में दो भाग है जहां एक भाग भगवान श्री कृष्ण के बालस्वरूप को समर्पित है और दूसरा रूप गुरूवायुरप्पन की प्रतिमा को समर्पित है। मंदिर की दीवारों और स्तंभों पर हिंदू धर्म और ब्रहमांड से जुड़ी घटनाओं की सुदंर नक्काशी और प्रतिमाओं के आकर्षण देखने को मिलता है।
कैसे पहुंचे
हवाई मार्ग से
- गुरूवायुर मंदिर पहुंचने के लिए नजदीकी एयरपोर्ट कोच्चि इंटरनेशनल एयरपोर्ट है जिसकी दूरी लगभग 80 किमी है। जहां से टैक्सी कैब बस सुविधा के माध्यम से गुरूवायुर मंदिर पहुंच सकते हैं।
रेल मार्ग से
- गुरूवायुर रेलवे स्टेशन मंदिर के पास ही है जहां से आप रिक्शा या पैदल ही मंदिर की यात्रा कर सकते हैं।
सड़क मार्ग से
- केरल और आसपास के राज्यों के प्रमुख शहरों से आप सीधी बसों या टैक्सी के माध्यम से गुरूवायुर पहुंच सकते हैं।
5. त्रिचंबरम मंदिर, थालिपरम्बा, केरल:
कुन्नूर जिले में स्थित यह मंदिर संस्कृति और धार्मिक मान्यता का अद्भुत सम्मिश्रण प्रस्तुत करता है। इस मंदिर में प्रतिष्ठित भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा उनके रौद्र स्वरूप को समर्पित है, जिसकी उपस्थिति अभिमान क्षेत्रों में गिना जाता है। वैष्णव तीर्थस्थलों में गणनीय इस मंदिर के बारें में 11वीं शताब्दी के संस्कृत काव्य मूषिकवंश में भी मिलता है, इससे अनुमान लगाया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 11वीं सदी में हुआ था। उत्सवों के दौरान यहां हाथियों की अनुपस्थिति इसे दक्षिण मंदिरों में विशेष और अद्वितीय बनाती है, यहां पूरी तरह हाथियों का प्रवेश वर्जित है।
वास्तुकला आकर्षण : इस मंदिर में दो मंजिला गर्भग्रह और पिरामिडनुमा छत पर चार उथले हुए छज्जों की शोभा आकर्षित करती है। भले ही मंदिर देखने में छोटा हो लेकिन केरल के शानदार मंदिरों में से एक इस मंदिर में मुख्य मंदिर के अंदर भगवान कृष्ण के मुख की ओर मुख किए हुए देवी दुर्गा की हाथ में कमल लिए हुए शानदार प्रतिमा स्थापित है। यहां भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा कंसवध करने के समय की है जो उनके क्रोधित स्वरूप को दर्शाती है।
कैसे पहुंचे
हवाई मार्ग से
- त्रिचंबरम मंदिर से नजदीकी एयरपोर्ट कालीकट इंटरनेशनल हवाई अड्डा है, (दूरी लगभग 140 किमी) जहां से आप बस या टैक्सी की मदद से त्रिचंबरम मंदिर पहुंच सकते हैं।
रेल मार्ग से
- मंदिर पहुंचने के लिए करीबी रेलवे स्टेशन कन्नूर रेलवे स्टेशन है, जो मंदिर से तकरीबन 20 किमी दूरी पर है।
सड़क मार्ग से
- केरल और प्रमुख शहरो ंसे सड़क माध्यम से पहुंचने के लिए आप मंदिर से नजदीक तालिपारम्बा बस स्टैंड पहुंचकर ऑटो या रिक्शे से त्रिचंबरम मंदिर पहुंच सकते हैं।
6. उडुपी श्री कृष्ण मंदिर, कर्नाटक
कृष्ण और द्वैत मत को समर्पित प्रसिद्ध हिंदू मंदिर शानदार आकर्षण हैं जहां इनके भक्तो की भारी भीड़ और भक्तिभाव आश्रम को जीवंतता प्रदान करता है। उडुपी में भगवान श्री कृष्ण के प्रमुख मंदिर के चारों ओर कई मंदिर है जिनमें कई मंदिर हजारों सालों से अपनी उपस्थिति से अभिभूत कर रहे हैं। माना जाता है कि संत माधवाचार्य को भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति गोपीचंदन के बड़े गोले में मिली थी, इसी के बाद तकरीबन 13वीं सदी में बने इस मठ की स्थापना वैष्णव संत माधवाचार्य ने की थी जो वेदांत के द्वैत संप्रदाय के संस्थापक भी रहे हैं। उडुपी के इस मंदिर से जुड़ी प्रसिद्ध घटना सभी के लिए विशेषतः आकर्षित करती है- कहते हैं मंदिर में प्रतिष्ठित प्रतिमा पहले पूर्वाभिमुख थी जो अपने भक्त कनकदास के कारण पश्चिमाभिमुख हो गई थी, दरअसल भक्त कनकदास भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे जिन्हे ब्राह्मण न होने के कारण उस समय उक्त मंदिर में प्रवेश नहीं मिला और वे मंदिर के पीछे बहती नदी की दूसरी ओर जाकर बैठ और प्रभु के ध्यान में व्याकुल होकर गायन कर रहे थे, तभी भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा पूरी तरह घूम गई, पृष्ठीय दीवार भी टूट गई और भक्त कनकदास को दर्शन प्राप्त हुए।
वास्तुकला आकर्षण : इस मंदिर की शैली द्रविड़ वास्तुकला का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें प्रवेश द्वार भव्य और जटिल नक्काशी युक्त है। मंदिर में एक छोटी सी कनक खिड़की है जहां से भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन किए जा सकते हैं, जो भक्त कनकदास के लिए बनवाई गई थी, इसे नवग्रह किंदी भी कहते हैं। मंदिर में प्रतिष्ठित मूर्ति कई बहुमूल्य रत्नों, सोने के रथ और भीतरी आंतरिक सजावट से बेहद सुरम्य और शानदार हो जाता है। मंदिर का जमीनी फर्श काले काड्डपा पत्थरो से बनाया गया है। इस मंदिर का संचालन प्रबंधन अष्ट मठों द्वारा किया जाता है।
कैसे पहुंचे
हवाई मार्ग से
- मंदिर से लगभग 60 किमी दूरी पर स्थित नजदीकी एयरपोर्ट मेंगलुरू इंटरनेशनल हवाई अड्डा है। यहां से आप टैक्सी या बस लेकर पहुंच सकते हैं।
रेल मार्ग से
- उडुपी रेलवे स्टेशन करीबी है जहां से आप ऑटो रिक्शा, टैक्सी या लोकल बस से मंदिर पहुंच सकते हैं।
सड़क मार्ग से
- उडुपी जाने के लिए कर्नाटक परिवहन बस सेवा के माध्यम से आप देश के प्रमुख शहरों से आसानी से पहुंच सकते हैं।
7. वर्कला जर्नादन स्वामी मंदिर, केरल
इस परम पावन मंदिर को दक्षिणी गया उपनाम से भी जाना जाता है, इसका उल्लेख भागवत और महाभारत में किया है - इस स्थान का दर्शन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम ने भी किया था। इस मंदिर की विशेषता है कि यहां सच्चे मन से पूजा प्रार्थना और पास मौजूद पापनाशम समुद्र तट पर स्नान करने से पाप धुल जाते हैं। इसे दक्षिणा काशी भी कहते है क्योंकि यहां पितृकर्म संपन्न कराए जाते हैं। समुद्रीय मंत्रमुग्ध करते परिदृश्य और नहरों के माध्यम से बैकवाटर के खूबसूरत भ्रमण पर निकल सकते हैं। माना जाता है कि मंदिर के पास बहती नहर में औषधीय गुणों का समावेश है।
वास्तुकला आकर्षण : इस मंदिर में प्रमुख देवता जनार्दन स्वामी पूर्व दिशा की ओर मुख किए प्रतिष्ठित हैं जिनका दाहिना हाथ आचमन मुद्रा में मुख की ओर है। माना जाता है कि उनका हाथ जब उनके मुख की ओर पहुंच जाएगा तब दुनिया समाप्त हो जाएगी जो अनुमानित तौर पर कलयुग के अंत की घटना मानी जाती है। समुद्रीय पठार पर स्थित इस मंदिर में सीढियों की विस्तृत श्रृंंखला है जहां भीतरी गर्भग्रह के प्रवेश द्वार की दोनों ओर श्री हनुमान और गरूड़ की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मुख्य गर्भग्रह में भगवान की पत्नियों श्री देवी और भूदेवी की मूर्तियां स्वामी जनार्दन के साथ स्थापित हैं। तांबे की चादरों से बने शंक्वाकार गुबंद से सुशोभित वृत्ताकारीय छतें और बलि पीठ हॉल आकर्षित करता है।
कैसे पहुंचे
हवाई मार्ग से
- वर्कला जर्नादन स्वामी मंदिर पहुंचने के लिए नजदीकी हवाई अड्डा तिरूवनंतपुरम एयरपोर्ट है जिसकी उडुपी से दूरी लगभग 45 किमी है। एयरपोर्ट से बस, टैक्सी या कैब से आप वर्कला और मंदिर पहुंच सकते हैं।
रेल मार्ग से
- मंदिर से करीबी वर्कला शिवगिरी रेलवे स्टेशन है जो लगभग 3 किमी दूरी पर है, जहां स्थानीय वाहन आसानी से मिल जाते हैं।
सड़क मार्ग से
- यहां पहुंचने के लिए पहले तिरूवनंतपुरम पहुंचना होगा जो केरल की राजधानी के रूप में जानी जाती है और राष्ट्रीय राजमार्ग 66 पर स्थित है, यहां से वर्कला तक जाने के लिए राज्य या निजी तौर पर बसें संचालित होती है जहां आप वर्कला बस स्टैंड से मंदिर के लिए स्थानीय वाहन से पहुंच सकते हैं।
8. बालकृष्ण मंदिर, हम्पी
भगवान श्री कृष्ण के बालस्वरूप को समर्पित यह मंदिर यूनेस्को वैश्विक धरोहरो में शामिल हैं। विजयनगर साम्राज्य की कलात्मक विशेषता को दर्शाता यह मंदिर स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना रहा है। दुनिया भर से श्रद्धालुओ की भारी संख्या में भीड़ दर्शन के लिए आती है। विजयनगर साम्राज्य के प्रतापी राजा कृष्णदेवराय ने इस मंदिर का निर्माण अपने विजय उत्सव को मनाने के उपलक्ष्य में करवाया था। इस मंदिर से जुड़ी जानकारी यहां मौजूद शिलालेखों में दर्ज है। यहां बताया गया है कि इस मंदिर परिसर में स्थापित प्रतिमा उदयगिरी यानी वर्तमान ओडिशा से लाई गई थी। इस समय यह मूर्ति चेन्नई के एग्मोर स्थित सरकारी संग्रहालय में प्रदर्शित है। इस प्रतिमा में श्रीकृष्ण जी की बालप्रतिमा बैठे हुए स्वरूप में है जिसका बायां पैर आसन पर और दायां पैर लटका हुआ है। दुर्भाग्य से हाथ गायब है, बालों का जूडा लगा हुआ है। माथे पर चंदन का लेप सुशोभित है।
वास्तुकला आकर्षणः मंदिर की वास्तुकला दक्षिण शैली का द्योतक है जहां दो संकेद्रित दीवारों का घेराव मुख्य मंदिर, सहायक मंदिर, मंडप और अन्य संरचनाओं को संरक्षण प्रदान करती है। मंदिर आयताकार परिसर में है जहां मुख्य गर्भग्रह, परिक्रमा मार्ग से घिरे आरित्रकक्ष और स्तंभो वाले हॉल से व महामंडप यानी स्तंभों वाले विशाल नाले से शोभाएमान है। स्तंभो वाले हॉल को रंगमंडप कहते हैं जहा कई देवी देवताओं और हिंदू धार्मिक ग्रंथों का चित्रण आकर्षित करता है। मंदिर में चारदीवारी वाली रसोई और दो मंडप है जहां वृहद चट्टान को तराशकर बनाई गई बड़ी सी आयताकार आकृति है जिसमे प्रयुक्त छिद्र की वजह से यह दानपेटी आकार में जान पड़ती है, जहां श्रद्धालु दान दिया करते थे। मंदिर की पूर्वी दिशा में मुख्य मीनार की अवस्थिति विजयनगर शैली का उत्कृष्ट चित्रण करती है जहां बारीक नक्काशियों में कई सारी आकृतियों जैसे ढाल लिए सैनिक, बलशाली अश्व और गजों की भव्य संरचनाएं उकेर कर बनाई गई हैं।
कैसे पहुंचे
हवाई मार्ग से
- नजदीकी एयरपोर्ट हुबली एयरपोर्ट या बेंगलुरू एयरपोर्ट से भी बस या टैक्सी की मदद से हम्पी स्थित मंदिर पहुंच सकते हैं।
रेल मार्ग से
- हम्पी से नजदीकी रेलवे स्टेशन हॉस्पेट जंक्शन है जिसकी दूरी लगभग 13 किमी है। बस या टैक्सी मंदिर के लिए आसानी से मिल जाती हैं।
सड़क मार्ग से
- कर्नाटक के प्रमुख शहरों जैसे बेंगलुरू, अन्य मुख्य जगहों जैसे गोवा, मुंबई से हम्पी के लिए सीधी बसें चलती हैं जिनके माध्यम से आप पहुंच सकते हैं। चाहें तो अपनी स्वयं ड्राइविंग कर भी पहुंच सकते हैं।
निष्कर्ष
दक्षिण भारत अपनी संस्कृति और पारंपरिक रीति रिवाजों के कारण हमेशा ही श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा है। कृष्ण भक्ति के लिए यहां अनेक विश्व प्रसिद्ध मंदिर अपनी अद्भुत छटा और दर्शनो से भक्तो को लाभान्वित कर रहे हैं। भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित इन मंदिरों से जुड़ी रोचक किंवदंतियां और विशाल परिसरो में फैली बारीक नक्काशी से सजे गोपुरम और गर्भग्रहों की दिव्यता न सिर्फ तन मन को बल्कि आत्मिक रूप से भी मानव को एकाकार करती हुई लौकिक रूप से ईश्वरीय परम सत्ता का अविस्मरणीय अनुभव प्रदान करती है।
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