• Nov 13, 2025

भारत के दक्षिण राज्य तमिलनाडु में बसे कन्याकुमारी के सबसे दक्षिणी भाग में अवस्थित सुचिन्द्रम या नारायणी शक्तिपीठ देवी सती के 51 शक्तिपीठों में से एक है जो देवी दुर्गा के नारायणी स्वरूप को समर्पित एवं पूजनीय है। इस मंदिर का नाम स्थानुमलयन जो मुख्य त्रिदेवताओं का संकेतक है और यहां देवराज इंद्र ने शुचिता यानी शुद्धि प्राप्त की थी इसलिए भी यह जगह सुचिन्द्रम नाम से जानी जाती है। सुचिन्द्रम यानी पवित्रता प्रदान करता यह स्थान देवी नारायणी की उपस्थिति से दिव्य आभा लिए विशेष और शानदार प्रतीत होता है, आइए इस शक्तिपीठ के बारें में और भी अधिक विस्तार से जानते हैं। 

समस्त शक्तिपीठों की स्थापना से जुड़ा पौराणिक इतिहास

देवी सती ने भगवान शिव से अपनी इच्छानुसार विवाह किया था जो उनके पिता प्रजापति दक्ष को नापसंद था क्योंकि भगवान शिव की जीवन शैली राजसी सुख से विलग थी। एक बार प्रजापति दक्ष ने विशाल यज्ञ का अनुष्ठान करवाया जिसमें संसार के समस्त देवी देवताओं को आमंत्रित किया लेकिन भगवान शिव और अपनी पुत्री सती को नहीं बुलाया। इस बात से दुखी सती बिना बुलाए ही कारण जानने के उद्देश्य से भरी सभा में पहुंच गईं। जहां उन्हें घोर अपमान और तिरस्कार झेलना पड़ा इसके अलावा भगवान शिव के प्रति कटु शब्दों को सुनना पड़ा। इतना सब सहन न कर पाने के कारण उन्होंने यज्ञ कुंड में बैठकर अपने प्राणों की आहुति देकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। 

भगवान शिव तक जब यह बात पहुंची तो वे अत्यधिक क्रोध के वशीभूत होकर सुध बुध खो बैठे और देवी सती के मृत शरीर को लेकर समस्त लोकों में विचरण करने लगे। इस घटना से उबरने के लिए भगवान विष्णु ने देवी सती के शव को अपने सुदर्शन चक्र से विभाजित कर भारतीय उपमहाद्वीप में बिखेर दिया ऐसे में जहां भी माता सती के अंग, आभूषण या वस्त्र गिरे वहां पर दिव्य शक्तिपीठों की स्थापना हो गई जहां भगवान शिव के भैरव रूप की उपस्थिति प्रत्येक शक्तिपीठ में देखने को मिलती है। 

नारायणी शक्तिपीठ की उत्पत्ति और जुड़ी ऐतिहासिक कथा 

मान्यता है कि भगवान विष्णु जब सुदर्शन चक्र से देवी सती के अंगो को विभाजित कर बिखेर रहे थे तब इस स्थान पर देवी सती के ऊपरी दाँत गिरे थे। कन्याकुमारी की सुचिन्द्रम जगह पर देवी सती का यह स्थान सुचिन्द्रम नारायणी शक्तिपीठ नाम से मशहूर हुआ।

सुचिन्द्रम स्थान पर देवों के राजा इन्द्र को उनके किये हुए अपराध के लिए मिले श्राप से मुक्ति मिली थी। दरअसल राजा इंद्र ने गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या पर कुदृष्टि डाली थी इसलिए गौतम ऋषि ने उन्हें श्राप दिया था। तब राजा इंद्र ने इसी स्थान पर भगवान शिव की आराधना कर शुद्धि प्राप्त की थी, तब से यह स्थान शुचिन्द्रम नाम से जाना गया। इससे पहले यह जगह ज्ञान अरण्य नाम से प्रचलित हुआ करता था। 

नारायणी या सुचिन्द्रम शक्तिपीठ की वास्तुकला एवं संस्कृति 

दक्षिणी भारतीय संस्कृति को प्रदर्शित करता आकर्षक विशाल श्वेत गोपुरम और सात भण्डारों के दृश्य अति अनुपम प्रतीत होते हैं। मंदिर निर्माण लगभग 17वीं शताब्दी के दौरान हुआ है जहां हिंदू देवी देवताओं की सुंदर और जीवंत मूर्तियां स्थापित हैं। शाक्त संप्रदाय के लोगों के साथ ही यह मंदिर शैव और वैष्णव संप्रदाय के लिए भी मुख्य तीर्थ के रूप में जाना जाता है। जिसमें से शाक्त देवी नारायणी, शैव स्थानु भगवान और अयन रूप विष्णु भगवान के अनुयायियों के लिए पूजनीय है। 

मंदिर का प्रवेश द्वार अति विशाल और भव्य है जिसकी ऊंचाई लगभग 24 फीट है, जिसकी शानदार छवि यहां बनी भव्य मूतिर्यों की वजह से और भी ज्यादा आकर्षक दिखाई देती है। मंदिर परिसर में कई सारे देवी देवताओं के लगभग 30 से ज्यादा मंदिर हैं, जहां भगवान शिव का विशाल और भव्य स्थानु लिंगम, मलय रूप में भगवान ब्रहमा और अयन छवि लिए भगवान विष्णु विराजित हैं। उत्तर दिशा के गलियारे में भगवान हनुमान की विशेष और भव्य प्रतिमा स्थापित हैं। इस मंदिर में हिंदू धर्म के लगभग सभी देवी देवताओं की प्रतिमाएं और मंदिर दर्शनों हेतु आकर्षित करते हैं। 

नारायणी शक्तिपीठ में मंदिर दर्शन समय 

  • प्रातःकालीन दर्शन समयः सुबह 4ः30 बजे से दोपहर 1ः00 बजे तक 
  • संध्याकालीन दर्शन समयः शाम 4ः00 बजे से रात 8ः00 बजे तक 

नारायणी शक्तिपीठ में मनाए जाने वाले व्रत अनुष्ठान एवं त्यौहार 

रथ यात्राः आषाढ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाए जाने वाला यह पर्व सुचिन्द्रम शक्तिपीठ में त्रिदेवताओं के स्थानुमलयन रूप को समर्पित किया जाता है। इस दिन से जुड़ी कई ऐतिहासिक कहानियां और तथ्य हैं जो इस दिन की महत्ता और ज्यादा समझाने के उद्देश्य से मनाया जाता है। 

सुचिन्द्रम मार्गा जी त्यौहारः मार्गशीर्ष यानी अगहन महीने की पूर्णिमासी तिथि को मनाया जाने वाला यह त्यौहार नारायणी शक्तिपीठ में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है जहां मां नारायणी भगवान नारायण यानी विष्णु जी की पत्नी हैं। मार्गशीर्ष महीनों को सभी महीनों मे सबसे पवित्र और भगवान श्री कृष्ण की संज्ञा दी जाती है। इस बात का उल्लेख स्वंय गीता में भी पढने को मिलता है। 

नवरात्रिः चैत्र माह यानी मार्च अप्रैल में मनाए जाने वाला पर्व नवरात्रि नौ दिवसीय अनुष्ठान है जिसमें देवी भगवती के नौ स्वरूपों की पूजा अर्चना और आराधना संपन्न की जाती है। इन दिनों सुचिन्द्रम शक्तिपीठ की रौनक और आध्यात्मिकता की विशिष्ट चमक दिखाई देती है। 

महाशिवरात्रिः फरवरी या मार्च में मनाया जाने वाला महाशिवरात्रि त्यौहार सुचिन्द्रम शक्तिपीठ में स्थानु रूप में भगवान शिव की आराधना के लिए पवित्र स्थल के रूप में जाना जाता है। स्थानुमलयन नाम से लोकप्रिय इस शक्तिपीठ की शोभा और मेलों की भव्यता से पूरा मंदिर परिसर और आसपास का क्षेत्र भक्तिमय व उल्लसित हो जाता है। 

दुर्गा पूजाः आश्विन मास में आने वाली नवरात्रि जो सितम्बर या अक्टूबर में मनाई जाती है, इसे दुर्गा पूजा नाम से भी जानते हैं। जिसमें नवें या दसवें दिन दशहरे का त्यौहार मनाया जाता है। इन नौ दिनों को मां की पूजा का पर्याय माना जाता है जहां चारो ओर वातावरण में देवी नारायणी की साधना की ही गूंज सुनाई देती है। 

चैत्र पूर्णिमाः चैत्र माह की पूर्णिमा को मनाए जाने वाला यह पर्व नारायणी शक्तिपीठ में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। मंदिर परिसर को सुगिंधत पुष्पों और इत्रो से सजाया जाता है और मंदिर दर्शन के लिए हजारों लोग पहुंचते हैं। 

रज पर्वः यह त्यौहार देवी नारायणी जो भगवान विष्णु की भार्या हैं उनके मासिक धर्म के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। मां नारायणी के इस स्वरूप के बारें में माना जाता है कि ये त्योहार के पहले तीन दिनों तक मासिक धर्म से में होती है। चौथे दिन यहां वसुमती स्नान या भूमि का औपचारिक स्नान संपन्न किया जाता है। रज पर्व में रज शब्द रजस यानी मासिक धर्म से लिया गया है। नारीत्व की खूबसूरत देन का यह विशाल और राजसी त्यौहारों में से एक है, इसे मिथुन संक्रांति भी कहते हैं। 

नारायणी शक्तिपीठ से जुड़े रोचक तथ्य 

नारायणी शक्तिपीठ में मां नारायणी देवी लक्ष्मी यानी भगवान विष्णु की पत्नी के रूप में प्रतिष्ठित हैं जो अन्य शक्तिपीठों से भिन्न है। 

यहां भगवान भैरव के रूप में स्थानु शिवलिंग स्थापित है जिसमें मल अयन के रूप में विष्णु और ब्रहमा जी भी विराजित हैं, यानी स्थानुमलयन शिव, ब्रहमा और विष्णु तीनों ही एक रूप में बसे हुए है। 

लगभग 30 छोटे बड़े मंदिरों के इस परिसर की जगह बहुत विशाल है जहां श्वेत रंग से सजे गोपुरम आकर्षक प्रतीत होते हैं।

देवराज इंद्र को भगवान शिव के आशीर्वाद से शुद्धता प्राप्त हुई थी, इस वजह से यह स्थान आज भी पवित्रता प्रदान करने के लिए प्रसिद्ध है जहां और भी कई सारे देवी देवताओं का आशीर्वाद सहज ही मिल जाता है। 

आध्यात्मिक प्रतिष्ठा और आशीर्वाद की महिमा देखने और महसूस करने के लिए दूर दूर से भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है। 

नारायणी शक्तिपीठ के आसपास घूमने वाले स्थान 

वटकोट्टई किलाः त्रावणकोर साम्राज्य में बना यह किला समुद्री तट पर बना हुआ शानदार दिखाई देता है। इसका निर्माण 18वीं शताब्दी के समय हुआ था जो कन्याकुमारी घूमने आए पर्यटकों के लिए प्रसिद्ध आकर्षण की तरह जाना जाता है। इस किले को संरक्षित स्थल के रूप में शामिल किया गया है। बेमिसाल वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व प्रदर्शित करता यह किला लगभग 3.5 एकड़ क्षेत्रफल में फैला हुआ है, जहां से समुद्री नजारों की खूबसूरती अद्भुत और आकर्षक लगती है। इन किलो ंके पास ही अद्भुत काली रेत के आकर्षण तट भी मौजूद हैं। 

कन्याकुमारी समुद्री तटः कन्याकुमारी भारत देश का सबसे दक्षिणी इलाका है, जिसकी सीमा समुद्र से लगती है। यहां से समुद्र के अनोखे और शांति प्रदान करते परिदृश्यों की श्रृंखलाएं मंत्रमुग्ध करती हुई बेमिसाल अनुभव प्रदान करती है। 

सर्वाणी कन्याश्रम शक्तिपीठः कन्याकुमारी शक्तिपीठ के नाम से भी यह जगह प्रसिद्ध है जहां देवी भगवती के कुमारी स्वरूप की पूजा होती है जिन्होंने अंधकासुर राक्षस के प्राप्त वरदान अनुसार ही उसका अंत किया है। सर्वाणी कन्याश्रम शक्तिपीठ मे देवी की नाक की नथ के हीरे की भव्य चमक के कारण ही नियत प्रवेश द्वार को बंद रखकर दूसरी दिशा के प्रवेश द्वार को प्रवेश के लिए खोला जाता है। 

सनसेट प्वाइंट, कन्याकुमारीः कन्याकुमारी की इस जगह से सूर्यास्त के नजारें को देखने का अनुभव बेहद रोमांचक और लुभावना है। यहां के व्यू टॉवर से मध्धम लाल रंग की लालिमा लिए सूर्य की छवि यादगार अनुभव प्रदान करती है। 

नारायणी शक्तिपीठ कैसे पहुंचे 

हवाई मार्ग से 

  • कन्याकुमारी में स्थित इस मंदिर तक पहुंचने के लिए तिरूअनंतपुरम हवाई अड्डा लगभग 90 किमी की दूरी पर स्थित है जहां से आप स्थानीय टैक्सी या बस के साथ आसानी से सुचिन्द्रम शक्तिपीठ की यात्रा संपन्न कर सकते हैं। 

रेल मार्ग से 

  • रेल मार्ग से सुचिन्द्रम शक्तिपीठ की यात्रा करने के लिए कन्याकुमारी रेलवे स्टेशन की दूरी करीब 3.2 किमी ही है जहां से आप आराम से स्थानीय रिक्शा या अन्य वाहन से मंदिर पहुंच सकते हैं। 

सड़क मार्ग से 

  • सुचिन्द्रम कन्याकुमारी में स्थित है जहां से सरकारी या प्राइवेट बसों की बेहतर आवाजाही रहती है। मंदिर पहुंचने के लिए आसपास के प्रमुख शहरों से बस या टैक्सी बुक कर दर्शन किए जा सकते हैं। देश के कई मुख्य शहरों से कन्याकुमारी के लिए सीधे बसों का संचालन होता रहता है। 

निष्कर्ष

सुचिन्द्रम नारायणी शक्तिपीठ, सिर्फ एक शक्तिपीठ नहीं वरन् आध्यात्मिक साधना के लिए श्रेष्ठ स्थानों में से एक है जहां धार्मिक उन्नति पाना और भी ज्यादा सरल हो जाता है। हिंदू देवी देवताओं की भव्य और समग्र उपस्थिति से प्रदीप्तिमान होता यह शक्तिपीठ भारत की गौरवशाली परंपराओं, रीति रिवाजों और स्थानीय विशेषताओं का संपूर्ण चित्रण करता हुआ आदर्श स्थान है। दक्षिणी संस्कृति, गोपुरम् वास्तुकलाएं और ऐतिहासिक गाथाएं इस स्थान की शांति, पवित्रता और समरसता में कई गुना इज़ाफा कर देती हैं। ऐसे दिव्य स्थानों पर देवी शक्तिपीठ की गरिमापूर्ण उपस्थिति इसके महत्व को बढाते हुए भक्तों को अपने आशीर्वाद और स्नेह से अभिसिंचित करती है। 

हमसे संपर्क करें
यात्रा विशेषज्ञबुकिंग की पुष्टिरद्द करना